कर संग्रह व घरेलू क्षमताओं के विकास की राह पर भारत

सुनील अमर –

संयुक्त राष्ट्र संघ यानी यूएनओ का लक्ष्य संख्या 17 दुनिया के देशों से सतत तरक्की के लिए अपने संसाधनों के विकास और उनके समुचित उपयोग की बात करता है। यूएनओ का मानना है कि वैश्विक संगठनों द्वारा विकासशील देशों को दी जाने वाली आर्थिक सहायता तब तक कारगर नहीं होगी जब तक ये देश अपने संसाधनों और क्रियान्वयन के तौर तरीकों को विकास की दिशा के अनुरुप सुव्यवस्थित नहीं कर लेते। यूएनओ के विषय विशेषज्ञ समय-समय पर विकासशील देशों को तत्सम्बन्धित सुझाव भी देते रहते हैं। जीएसटी के सम्बन्ध में इसे समझा जा सकता है जिसे लागू कराने के लिए यूएनओ ने काफी सख्ती बना रखी है। यद्धपि दुनिया में सबसे पहले फ्रांस ने जीएसटी लागू की थी लेकिन भारत ने गतवर्ष जीएसटी लागू करते समय कनाडा के द्विस्तरीय जीएसटी मॉडल को अपनाया है। हालॉकि अधूरी तैयारी के साथ हड़बड़ी में लागू किए जाने के कारण जीएसटी में बार-बार फेरबदल किया जा रहा है जिसके कारण अब यह कनाडा के बजाय भारत का स्वयंभू बहुस्तरीय जीएसटी मॉडल बनकर रह गया है।

यूएनओ विकास के लिए ग्लोबल पार्टनरशिप की बात करता है ताकि विकसित औेर विकाशील देशों के बीच न सिर्फ आर्थिक संसाधनों, बल्कि आधुनिक टेक्नालॉजी का भी आदान-प्रदान हो सके। यह यूएनओ के प्रयासों का फल है कि वर्ष 2000 से 2014 के बीच उसकी विकास सहायता राशि में 66 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई थी। इसी कालावधि में विकासशील देशों से विकसित देशों में आयात किए गए ड्यूटी फ्री सामान व वस्तुओं की मात्रा 65 प्रतिशत से बढ़कर 79 प्रतिशत हो गई। परस्पर सहयोग के कारण मोबाइल फोन के प्रयोग व इन्टरनेट के इस्तेमाल में 10 गुना से भी अधिक वृद्धि हुई है। विकासशील देशों के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा उनके उपर लदा हुआ कर्ज होता है जिसमें उन्हें अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा ब्याज और किश्त के रुप में देना रहता है। वर्ष 2000 में विकसित देशों पर लदा हुआ कर्ज लगभग 12 प्रतिशत था जो वर्ष 2013 तक घटकर 3.1प्रतिशत पर आ गया। इसमें सबसे बड़ा रोल व्यापार में बढ़ोत्तरी,  कर्ज की राशि का बेहतर प्रबन्धन, अति निर्धन देशों को दी गई कर्ज से मुक्ति तथा अन्तर्राष्ट्रीय बाजारों में इन देशों के लिए अपना सामान बेचने की बेहतर सुविधाओं का रहा।

वैश्विक भागीदारी के सन्दर्भ में भी भारत का रिकार्ड प्रशंसनीय रहा है। लगभग 95 करोड़ टेलीफोन कनेक्शन के साथ भारत विश्व में दूसरा सबसे बड़ा टेलीफोन नेटवर्क है। इनमें से लगभग 39 करोड़ कनेक्शन देश के ग्रामीण इलाकों में हैं। इसी का नतीजा है कि भारत ने इन्टरनेट के क्षेत्र में तेजी से प्रगति की है। वर्ष 2018 के इंटरनेट और मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (आईएएमएआई) के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार देश में कुल 50 करोड़ इन्टरनेट उपभोक्ता हैं। वैश्वीकरण की प्रक्रिया में तथा वैश्विक आर्थिक प्रगति की दौड़ में भागीदार होते हुए भारत एक बड़े विकास-सहयोगी देश के तौर पर उभरा है तथा दुनिया के बहुत से विकासशील और विकसित देशों को भारत ने तकनीकी-आर्थिक तथा बौद्धिक सहायता प्रदान की है और लगातार कर रहा है। भारत की आईसीटी इन्डस्ट्री तथा आईटी ने इन क्षेत्रों में दुनिया के दिग्गजों से हाथ मिलाया है। इसी प्रकार विकास-सहयोगी गतिविधियों के हिस्सेदार के तौर पर भारत ने विकासशील देशों को तकनीकी सहयोग तथा क्षमता विस्तार कार्यक्रमों में सहयोग और आर्थिक सहयोग के अलावा पिछड़े देशों की अन्तर्राष्ट्रीय  बाजारों में प्रवेश की सुगमता सुनिश्चित की है।

भारतीय अर्थव्यवस्था के सम्बन्ध में घरेलू संसाधनों को गतिशील बनाने का मामला खासा पेचीदा है। गतिशील का मतलब है कि संसाधन तो हमारे पास हैं लेकिन उनका दोहन नहीं किया जा रहा है और वे सरकारी खजाने में नहीं पहुंच रहे हैं। संसाधनों के दोहन के लिए एक निर्धारित व्यवस्था का होना आवश्यक होता है। ऐसे में संसाधनों की पहचान कर उन्हें कर के दायरे में लाना होता है। यूएनओ का बैंक ग्रुप विकासशील देशों में टैक्स सिस्टम को आधुनिक और ज्यादा प्रासंगिक करने में मदद करता है जैसे भारत में हाल ही में नयी कर पद्धति जीएसटी को लागू कराया गया है। भारत के सम्बन्ध में बात करें तो यहां दो प्रकार के संसाधन उपलब्ध हैं- एक तो प्राकृतिक जैसे कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, पानी तथा स्पेक्ट्रम आदि, और दूसरे, मानव संसाधन है जैसे काम करने वाले श्रमिक आदि तथा बौद्धिक वर्ग। इन दोनों प्रकार के संसाधनों के समुचित दोहन से ही बचत, कर तथा निवेश जैसे वास्तविक आर्थिक संसाधन उत्पन्न होते हैं। लेकिन बिडम्बना यह है कि देश में उचित और कार्यकारी व्यवस्थाओं के अभाव में प्राकृतिक और मानवीय संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है। भारत के पास दुनिया का सबसे विशाल कार्यकारी मानव बल है लेकिन उसका तीव्र विकास के लिए उपयोग नहीं हो पा रहा है। देश के पास उपलब्ध कमजोर मानव बल जिसमें खासकर महिलाएं, बच्चे, अनुसूचित, जनजाति और अन्य दलित जातियों के समूह हैं, इन्हें मुख्यधारा में लाया जाना बहुत जरुरी है क्योंकि इससे आर्थिक प्रगति को गति मिलेगी।

देश में युवाओं की बहुत बड़ी फौज ऐसी है जिसे कौशल विकास का प्रशिक्षण देकर उत्पादक कार्यों में लगाया जा सकता है। यद्यपि सरकार इस तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रम चला भी रही है लेकिन प्रगति और निष्पादन के लिहाज से यह पर्याप्त नहीं है। देश को तेजी से प्रगति के पथ पर ले जाने के लिए कृषि तथा उद्योग धन्धों में निवेश के लिए लोगों को प्रोत्साहित किया जाना जरुरी है और इसके लिए भरोसेमंद नियम-कानून बनाये जाने चाहिए। इसी प्रकार उत्पादन के लिए जरुरी चार प्रमुख तत्त्वों – जमीन, श्रमिक, पूंजी और संगठन को एक माहौल बनाकर इकठ्ठा करना सरकार का काम होता है ताकि विकास और निवेश की भरोसेमन्द स्थिति बन सके। अल्प आय वाले देशों में जहां गरीबी बहुत ज्यादा होती है वहां घरेलू संसाधनों को गतिशील बनाना बहुत चैलेन्जिंग होता है। ऐसे में गरीब देशों को प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, विदेशी सहायता, अन्तर्राष्ट्रीय  सहायता तथा निर्यात से होने वाली आय पर निर्भर रहना पड़ता है। इसमें प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में निवेशक के अपने आर्थिक स्वार्थ होते हैं तो विदेशी सहायता में बहुत ज्यादा प्रतिबन्ध और शर्ते होती हैं जो किसी भी संप्रभु राष्ट्र के विकास में बाधक होती हैं। इसलिए अपने घरेलू संसाधनों को विकसित करना ही श्रेयस्कर होता है।

यूएनओ भारत के टैक्स सिस्टम को ‘नोटोरियस’ और बहुत जटिल कहता है और मानता है कि भारत में आसान टैक्स सिस्टम को लागू कर घरेलू संसाधनों का ठीक से दोहन किया जा सकता है जो कि देश में विकास को गति देने और गरीबी को दूर करने में तेजी से काम करेगा।

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