भारत को खुलना होगा

 

भारत को खुलना होगा

दिलीप बीदावत

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एससीए एसटी एक्ट में बादलाव का निर्णय ऐसे समय में आना, जब देश  में आम चुनाव के दिन नजदीक हों, सरकारी कामकाज में राजनीतिक दखल का संदेह उत्पन्न तो करता है। दो अप्रेल को सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयानुसार एससी, एसटी एक्ट में किए गए बदलाव के विरोध में भारतीय दलित समुदाय द्वारा भारत बंद के एलान के साथ दलितों और गैर दलितों के बीच सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों से शुरू हुआ वाक् युद्ध हिंसा में बदल गया। दस अप्रेल को समानता में  विश्वास  नहीं रखने वाले वर्गों ने भी भारत बंद का ऐलान किया है। ऐसा लगता है, आजादी से पहले तक तो भारत वैचारिक और बोद्धिकता के स्तर बंद था ही, जिसकेे चलते विदेशी  शासकों ने बड़े आराम से देश  को लूटा और राज किया। अब घटित हो रही या होने जा रही घटनाओं ने यह साबित कर दिया कि बराबरी और मानवीयता के विषय में वैचारिक और बोद्धिकता के स्तर पर तो भारत बंद ही है। वर्तमान में धर्म और जाति के आधार पर लगाई जा रही आग इस देश  को किस मुहाने पर ले जाकर खड़ा करेगी, इस पर सोचने के लिए भारत को खुलना होगा। वर्तमान में घटित हो रही घटनाएं, उभर रहे जातीय और सांप्रदायिक आंदोलनों ने भारतीय समाज और राजनीतिक स्तर पर अनेकों ऐसे सवाल छोड़ें हैं, जो वर्तमान बदलते सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिदृष्य में सकारात्मक सोच के साथ विचार करने की मांग करते है। देश  ही नहीं पूरी दुनिया में गरीबी और अमीरी की चैड़ी होती खाई से उत्पन्न होने वाले संघर्ष को धर्म और जातियों के झगड़े में उलझाने और दौलत बटोरते जाने की साजिश  को समझे बिना बंद भारत को बंद कराना किसी मुद्दे का वास्तविक हल तो नहीं है, हां साजिश  कारियों की साजिश  की सफलता तो है।
क्या देश  सचमुच अनेकता में एकता है। दो अप्रेल की घटना ही नहीं, अनेकों ऐसे आंदोलन और घटनाएं घटित हुई हैं, जो बताती हैं कि महसूस करने तक तो विविधता में एकता ठीक है, लेकिन भौतिक रूप से नहीं है। जिस देश  में जातीयता के नाम पर गैर बराबरी और उत्पीड़न की व्यवस्था हो, जो संविधान के प्रावधानों में भी दिखता है, वर्जना और भेदभाव की यह स्थिति सरकारी सेवा स्थलों पर बनी हो, स्कूलों में दलित बच्चों के खाने के बर्तन अलग रखे जाते हों, उनको कक्षाकक्ष में गैर दलित बच्चों से दूर, सबसे पीछे बिठाने की प्रथा हो, पानी के बर्तनों को छूने की मनाही, सरकारी योजनाओं और कार्यक्रमों से दलित वर्ग को जानबूझ कर वंचित रखने की सेवाकर्मियों की मानसिकता जैसी व्यवस्था आज भी कायम हो, वहां भारत को महान कहने में संकोच तो पैदा होना चाहिए। दलित समुदाय के दुल्हे के घोड़ी पर चढ़ जाने से जिस देश  की सामाजिक व्यवस्था बिगड़ जाती है, उस देश  को क्या खोलना है और क्या बंद करना। इस संघर्ष को एक कुंआ और एक श्मशान जैसेे छद्म और खोखले नारों या दलितों को भाई कह कर छलने वाले नारों से खत्म नहीं किया जा सकता। ना ही यह प्रतिकार से समाप्त होने वाला है। सामाजिक समावेशन मात्र एक रास्ता है, जिसकेे जरिए विविधता में एकता दिख सकती है और इसकेे लिए भारत को खुलना होगा।
दो अप्रेल की घटना में एससी, एसटी कानून में बदलाव तो मात्र एक बहाना रहा है। देश  में ऐसा पहलीबार हुआ है जब सभी दलित जातियां संगठित रूप से अपने भीतर के सदियों से झेले जा रहे जातिगत अमानवीय व्यवहार के खिलाफ उठ खड़ हुई हैं। जो लोग इस आंदोलन के हिंसक रूप को देखकर कानून व्यवस्था और संविधान की दुहाई दे रहे हैं वे शायद भूल गए या अनजान बने हुए हैं कि भारत में ऐसे हिंसक आंदोलन पहली बार नहीं हुए हैं। रानीति से प्रेरित इससे भी हिंसक आंदोलन और बड़े-बड़े नरसंहार हुए हैं। लोगों को जिंदा जलाया गया है या काटा गया है। बस्तियां उजाड़ी गई है। महिलाओं की अस्मत लूटी गई है। मां के पेट में पल रहे बच्चों तक को काटा गया है। व्यवस्थाएं जब हितसाधकों की पैरवी में चेतनाशून्य और बहरी होे जाती है, फूट डालो और राज करो की नीति पर अंधी होकर समाज व इन्सान को वोट देने वाली मशीन  और धनकुबेर इसी हिंसा की आग से अपनी संपत्ति को दो-चार गुना करने की साजिश  करते हैं, और देश  का मानव संसाधन इन साजिशों की कतपुतली बन कर नाचता हो, समस्या मूलतः न केवल बनी रहेगी, और अधिक गहरी होगी।
इस विरोध के पीछे एक और बड़ा करण रहा है, आरक्षण व्यवस्था को समाप्त और जारी रखने की मांग। रोजगार चाहिए या आरक्षण को समाप्त अथवा जारी रखा जाए, दोनों अलग-अलग मुद्दे है। सभी को रोजगार की मांग सरकार के गले की घंटी है और आरक्षण के लिए लड़ना-झगड़ना, सुविधाजनक स्थिति। सरकारी नौकरियों में एससी, एसटी और अन्य पिछड़ी जातियों को समाज की मुख्यधारा में बराबरी केे स्तर पर लाने के लिए संविधान में आरक्षण की व्यवस्था की गई। जिन दलित समुदायों ने इस व्यवस्था को अवसर के रूप में देखा उन्होंने इसका उपयोग किया और अपने जीवन स्तर में (सामाजिक और आर्थिक स्तर की बराबरी में नहीं) सुधार ला पाए। यह अवसर उन लोगों को दिया गया था जिनको सदियों सेे ज्ञान और संसाधनों से वंचित रखा गया था। अब सवाल उठता है इसके पक्ष और विरोध का। क्या सचमुच बेरोजगारी का कारण आरक्षण है ? इस सवाल पर विचार करना जरूरी है। क्या आरक्षण के बावजूद सरकारी नौकरियों में सभी खाली पद भर लिए गए हैं, और पदोन्नतियां भी अपेक्षानुरूप दी गई हैं ? और आरक्षण की व्यवस्था समाप्त करने से क्या कतार में खड़े सभी वर्गों के बेरोजगारों को सरकारी नौकरियां मिल जाएंगी ? असल बात तोे यह है कि सरकारी और प्राइवेट दोनों ही क्षेत्रों में नौकरियां पैदा ही नहीं होे रही है। इसी लिए हमारे प्रधान मंत्री जी ने पकोड़ा रोजगार (स्वरोजगार) की सलाह देकर सरकार के गले से घंटी उतारने का प्रयास किया है। होना तोे यह चाहिए कि बेरोजागरों को एक होकर रोजगार की गारंटी (चाहे प्राइवेट सैक्टर होे, या सरकारी) की मांग करनी चाहिए। काॅर्पोरेट सैक्टर की नौकरियां देने और उचित पगार देने की जवाबदेहिता सुनिश्चित ग सभी वर्गों को पुरजोर उठानी चाहिए जिससे सरकार की जवाबदेहिता भी बढ़ेगी।
एससी, एसटी एक्ट में बदलाव को इस आधार पर किया गया है कि निर्दोश  लोेगों को सजा से बचाना है। 1990 में कष्मीर को छोड़ कर समूचे देश  में लागू किए गए इस कानून को बनाने के पीछे कुछ तो कारण रहे होंगे। और ऐसा नहीं है कि अब एका-एक स्थितियां बदल गईं। एक रिपोर्ट बताती है कि पिछले एक दशक में दलितों पर उत्पीड़न केे मामलों में 51 प्रतिशत  की वृद्धि इस कानून के वजूद में होने के बावजूद हुई है। कानून का विरोध करने वालों का मानना है कि इस कानून का दुरूपयोग कर गैर दलितों को झूठे मामलों में फंसाया जाता है। ऐसी प्रतिक्रियाएं दलितों और महिलाओं के उत्पीड़न कोे रोकने वाले कानूनों व विशेष । लेकिन झूठे मामलों की ठीक से जांच नहीं की जाती है। इनमें अधिकांश  मामले ऐसे होते हैं, जब दबंगों द्वारा पीड़ितों कोे हर तरह सेे दबाया जाकर मामला वापस लेने का दबाव बनाया जाता है और पुलिस जांच स्तर पर अथवा कोर्ट में समझौते के नाम पर पीड़ित यह कहता है कि मैंने आवेश  में आकर ऐसा किया था या जिन व्यक्तियों ने उत्पीड़न किया, उन्हें में पहचानता नहीं। और ऐसे में सरकारी और कानून की भाषा और रिकाॅर्ड में फ्राॅड या झूठे गिने जाते हैं। आज तक उत्पीड़क द्वारा समझौते में कभी ऐसा नहीं लिखा गया कि मैंने आवेश  में आकर उपराध किया है और अब हम दोनों पक्ष राजीनामा करते हैं। कानून में ऐसी भाषा होती नहीं है। ठीक से समीक्षा की जाए तो बदले की भावना अथवा सबक सिखाने की नियत से दर्ज कराए गए झूठे केसों की संख्या 10 से 15  प्रतिशत  से अधिक नहीं है। और इस आधार पर यह कहा जाना कि झूठे केस अधिक हो रहे हैं, निर्दोष लोगों के साथ अन्याय ना हो, इस लिए कानून को ढीला किया जाना गलत है। अगर कानून के विशेष  प्रावधान जिसमें अग्रिम जमानत का प्रावधान नहीं है, के बावजूद दलितों के उत्पीड़न केे मामलों में सरकारी रिकाॅर्ड के अनुसार वृद्धि हो रही है, तो उसे ढीला या कमजोर करने पर एक बड़े तबके पर क्या असर होगा, इस पर विचार जरूरी है। इस कानून केे लागू होने गैर दलितों पर उत्पीड़न करने से पूर्व हजार बार सोचने के दबाव ने उत्पीड़न को कम करने में कोर्ट में सजा पाएं लोगों से कहीं अधिक असर किया है। इस कानून की मूलभावना सजा दिलाना ही नहीं है, बल्कि समाज में ऐसा दबाव बनाना भी है कि जातीय भेदभाव के कारण हो रहे उत्पीड़न को रोके जाने का दबाव बने। इन ज्वलंत सवालों पर देश  हित में, देश  को  विश्व  गुरू और आर्थिक शक्ति के रूप में उभारने, अनेकता में एकता की अवधारणा को जीवित रखने के लिए  निष्पक्ष विचार करने की जरूरता है।

 

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