कामवासना की अमूल्य ऊर्जा

कामवासना की अमूल्य ऊर्जा-१
आधुनिक समाज, चिकित्सकों और वैज्ञानिकों में यह विचार गहरी जड़े जमा चुका है कि शुक्र रक्षा या ब्रह्मचर्य का पालन करना शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लियें हानिकारक है। वीर्य रक्षा तथा ब्रह्मचर्य अज्ञानता है, धार्मिक अंधविश्वास है और पिछड़ेपन की बात है। आधुनिकता से इस पिछड़े अंधकार युग के विचारों का कोई वास्ता नहीं।
कुछ तथाकथित यौन रोग विशेषज्ञों या सेक्स विशेषज्ञों ने इस विचार का दुरुपयोग अपने व्यापारिक स्वार्थों के लिये करना शुरू कर दिया। उन्होंने शुक्र रक्षा और ब्रह्मचर्य के बारे में झूठी धारणाओं को खूब प्रचारित किया है। वीर्य रक्षा या ब्रह्मचर्य से मानसिक तनाव, अनेक मानसिक रोग होते हैं , कई शारिरिक रोग भी होते ही हैं; यह झूठ सारे संसार में फैला दिया गया। चिकिस्तक और मनोवैज्ञानिक झूठी मान्यताओं के कारण युवाओं को सलाह देते हैं कि कामवासना से पैदा मानासिक व शारीरिक रोगों से बचना है तो वीर्य स्खलन करो। चाहे वेश्यालय में जाओ। यहाँ तक कहा जाता है वेश्याओं से मिलने वाले यौन रोग उन रोगों से कम खतरनाक हैं जो कामवासना को सन्तुष्ट न करने से पैदा होते हैं। करोड़ो युवा इस सलाह को मानकर अपना जीवन अंधकारमय बना रहे हैं।
वासना का व्यापार और बाजार अरबों-खरबों रूपये का है। विश्व स्तर के वासना बाजार के व्यापरियों ने ब्रह्मचर्य तथा वीर्य रक्षा के विचारों को बदनाम करके अपने रास्ते की loveरुकावटों को दूर कर दिया है। सबसे बड़ी कमाल की बात यह है कि उनके झूठ के पक्ष में एक भी वैज्ञानिक प्रमाण  नहीं है। फिर भी वे बड़ी कुशलता व सफलता से असत्य को प्रचारित कर रहे हैं।
एक और कमाल यह है कि मीडिया भी इस झूठ को  उजागर नहीं कर रहा, जिसके कारण एक बहुत बड़ा असत्य, सत्य बनकर अनगिनत लोगों के जीवन को खोखला, दुःखी और रोग ग्रस्त बना रहा है। समाज में तेजी से बढ़ रहे व्यभिचार का एक बड़ा कारण यह झूठ भी हैं।
ब्रह्मचर्य और शुक्र रक्षा के प्रभावों पर विश्व स्तर के अनेक शोध चिकित्सा-विज्ञान जगत में हो चुके हैं। हैरानि की बात यह है कि इतना होने पर भी वे शोध मीडिया के माध्यम से कभी सामने नहीं लाए गए। केवल भारत ही नहीं सारे संसार को एक बहुत बड़े असत्य के अंधेरे में बड़ी चालाकी और निर्ममता पूर्वक धकेल दिया गया है।
करोड़ो लोगों, विशेष कर युवाओं का जीवन इस असत्य के कारण अंधकारमय बनचुका और आगे भी बन रहा है। इसीलिये इस विषय को उजागर करना, सत्य को सामने लाने का प्रयास करना आधुनिक युवा की बहुत बड़ी जरूरत है।
एक आश्चर्य की बात यह भी है की विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी सक्षम ऐजेन्सियाँ एड्ज़ के नाम पर, पाठशालाओं में एड्‍ज़ से सुरक्षा के नाम पर कामवासना के प्रचार कों बढ़ावा देने पर अकूत धन खर्च कर रही हैं, पर स्वास्थ्य रक्षा के स्वर्णिम सूत्र ‘ब्रह्मचर्य’ के वैज्ञानिक रूप से बार-बार प्रमाणित ज्ञान को बताने, सिखाने की बात कभी नहीं करतीं। केवल मुठ्ठी भर विचारक और संगठन भारत में इस विचार के (ब्रह्मयर्य व चरित्र रक्षा) के बारे में अपनी आवाज उठा रहे हैं जिन्हे ये काम-वासना का प्रचार करने वाले ‘पिछड़े और पोंगापंथी’ कह कर नकार देते हैं।
इन वैज्ञानिक संगठनो के चारित्र रक्षा विरोधी व्यवहार से स्वाभाविक सन्देह होता है कि वे भी वासना का बाजार फैलाने व चलाने वाली शक्तियों के सहायक बने हुए हैं। भारतीय शासन तंत्र विदेशी शक्तियों  द्वारा बार-बार इस्तेमाल होजाने का अनुभव हम अनेकों बार कर ही चुके हैं। मीडिया भी किन्हीं विदेशी शक्तियों की मुठ्ठी में होने के कारण इस सत्य पर पर्दे डाल रहा है, यह अनुमान आसानी से लग जाता है।
अतः अपने प्रयासों से यह जानना जरूरी है कि वीर्य रक्षा और ब्रह्मचर्य के पालन के अदभुत परिणामो के बारे में आधुनिक विज्ञान व वैज्ञानिक क्या कहते हैं।
आधुनिक समाज के लिये सूचनाओं का सबसे सरल साधन इंटरनैट बन चुका है।

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कामवासना की अमूल्य ऊर्जा-२

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में ब्रह्मचर्य और शुक्र रक्षा का महत्व

अनेक आधुनिक चिकित्सा वैज्ञानिकों और खोज कर्ताओं के अनुसार वीर्य नाश के कारण अनेकों शारीरिक और मानसिक रोग पैदा होते हैं। ब्रह्मचर्य का पालन करने से रोग होने के कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिले हैं।
हमारे स्नायु कोषों (Brain cells)  का निर्माण जिन तत्वों से होता है वे तत्त्व यथा फास्फोरस, लेसीथिन, कॉलेस्ट्राल आदि वीर्य में निकलजाने पर मानसिक रोग तनाव आदि होना स्वाभाविक है। वीर्य स्राव से मानसिक तनाव कम होने की बात पूरी तरह से नीराधार और अवैज्ञानिक है।
प्रजनन तंत्र से सम्बंधित अन्तःस्रावीग्रंथियों (ग्लैण्ड्‍ज) से निकले हुए रस या हार्मोन स्वास्थ्य रक्षा में बहुमूल्य योगदान करते है। वीर्य को शरीर में सुरक्षित रखने से इन हार्मोन मे उपस्थित लाभकारी तत्त्वों का लाभ मिलता है।
वीर्य रक्षा का सीधा अर्थ है सैक्स हार्मोनों की रक्षा और वीर्यनाश का साफ अर्थ है हार्मोन, बल तथा जीवनी शक्ति का विनाश। इन हार्मोनो की कमी से बुढ़ापा आने लगता है और इनके संरक्षण से उत्साह, शक्ति, स्वास्थ्य, प्रसन्नता, मानसिक क्षमता बहुत अधिक समय तक बनी रहती है। अतः रक्त में इन हार्मोनो की मात्रा अधिक रहे, इसके लिये जरूरी है कि वीर्य रक्षा हो। वीर्य क्षारीय (एल्कलाईन) तथा चिपचिपा एल्बुमिन तरल है। इसमे उत्तम प्रकार का पर्याप्त कैल्शियम, एलबूमिन, आँयरन, विटामिन-ई, न्युक्लियो प्रोटीन होते हैं।
वीर्य स्खलन में एक बार में लगभग बाईस करोड़ (22,00,00000) से अधिक स्पर्मैटोजोआ निकल जाते हैं। सैक्स हार्मोन निर्माण का मूल आधार कोलेस्ट्राल, लेसिथिन (फास्फोराईज्ड़ फैट्स), न्युक्लियो प्राटीन, आरन, कैल्शियम से हुआ है। वीर्य के शरीर से बाहर निकलने पर इन अमूल्य तत्वों की कमी होना स्वाभाविक है।
अनुमान है कि 1.8 ली. रक्त से 30 मि.ली. वीर्य बनता है अर्थात् एक बार के वीर्य स्राव में 600 मि.ली.के बराबर रक्त की हानि होती है। डॉ. फ्रेडरिक के अनुसार वीर्य में शक्ति है, पूर्वजों का यह विश्वास बिल्कुल सही है।
वीर्य में ऐसे अनेको तत्त्व हैं जो शरीर को बलवान बनाते हैं। मस्तिक और स्नायु कोषो (ब्रेन) की महत्वपूर्ण खुराक (न्युट्रिशन) इसमें हैं। स्त्री शरीर के प्रजनन अंगों की भीतरी परतें वीर्य को चूस कर, स्त्रियों के शरीर को बलवान और उर्जावान बनाती हैं। इसी प्रकार पुरुष के शरीर में सुरक्षित रहने पर भी यह वीर्य पुरुषों को तेजस्वी, बलवान, सुन्दर, स्वस्थ बनाता है।
अधिक भोग-विलास करने वालों की दुर्बलता, निराश, मानसिक अवसाद (डिप्रेशन), थकावट के इलाज के लिए चिकित्सा जगत में लेसीथिन का बहुत सफल प्रयोग होता है। हम जानते है कि प्राकृतिक लेसीथिन ‘वीर्य’ का महत्वपूर्ण घटक है। हम यह भी जानते होगे कि दवा के रूप लिये जाने वाले लेसीथिन के दुष्प्रभाव भी सम्भव हैं। स्नायू तंत्र की रासायनिक संरचना और वीर्य की संरचना में अद्भूत समानता है। दोनो में स्मृद्ध लेसीथिन, कोलेस्ट्रीन तथा फास्फोरस कम्पांउड हैं। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि जो धटक वीर्य में बाहर निकल जाते है, स्नायु कोषों व तन्तुओं (ब्रेन) के निर्माण के लिये उनकी जरूरत होती है। अतः जितना वीर्य शरीर से बाहर जाता है उतना अधिक शरीर और बुद्धि दुर्बल होती है।
वीर्यनाश होते ही दुर्बलता आती है। पर लगातार और बार-बार वीर्यनाश होने (बाहर निकलने) पर मानसिक व शारीरिक दुर्बलता बहुत बढ़ जाती है। परिणाम स्वरूप अनेकों शारीरिक और मानसिक रोग सरलता से होने लगते हैं। ‘सैक्सुअल न्युरेस्थीनिया’ नामक स्नायु तंत्र दुर्बलता – जैसे रोग हो ते है।
विशेषज्ञों के अनुसार ‘वीर्यरक्षा’ दिमाग के लिये सर्वोत्तम टॉनिक या खुराक है।
आधुनिक और प्राचीन काल के अनेकों महापुरूष हैं जिन्होंने ब्रह्मचर्य रक्षा से अद्भुत प्रतिभा और शक्ति प्राप्त की। विदेशियों में अरिस्टोटल, न्युटन, पाईथागोरस, प्लेटो, लियोनार्द द विन्सी, कैष्ट, हरबर्ट स्पैंसर आदि।
भारतीयों में गिनती करें तो स्वामी राम कृष्ण परमहंस, स्वामी योगा—, स्वामी राम तीर्थ, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयान्द, विनोबा भावे आदि।
महाभारत काल में भीष्मपितामह जैसे अनेक महापुरुष हुए हैं।
आज भी भारत में अनेकों ऐसे सच्चे साधक हैं जो ब्रह्मचर्य धर्म का पालन करके अद्भुत शक्तियों के स्वामी बने हैं। लाखों गृहस्थ हैं जो विवाहित जीवन में सयंम से रहते हुए, 50 साल की आयु के बाद ब्रह्मचर्य का पालन कर रहे हैं। विश्व में केवल भारत की परम्परा है जिसमें ब्रह्मचर्य की रक्षा के महत्त्व पर बहुत खोज व प्रयोग हुए हैं। ऐसे अनेक प्रमाण मिलते हैं कि अनेक कलाओं व ज्ञान के साथ ब्रह्मचर्य के महत्व का ज्ञान भी भारत से विश्व के अनेक देशों तक पहुंचा।

 

 

कामवासना की अमूल्य ऊर्जा-३
वीर्य के तत्त्वों के विश्लेषण और शरीर व बुद्धी पर होने वाले लाभदायक प्रभावों पर प्रो. ब्राऊन सिकवार्ड तथा प्रो. स्टीनैच ने बहुत काम किया है।
प्रो. स्टीनेच के अनुसार अंडकोष नाड़ी को बांधकर, वीर्य बाहर जाने के रास्ते को रोकर वीर्य रक्षा के स्वास्थ्य वर्धक प्रभावों पर उन्होने अध्ययन किया।
प्रो. स्टीनेच के अलावा विश्व के अनेक चिकित्सा विज्ञानियों ने इस विषय पर शोध किये हैं। शरीर विज्ञान, मूत्र रोग, विशेषज्ञ, यौन रोग व प्रजनन अंगो के विद्वान, मनोवैज्ञानिक, स्त्रि रोग विशेषज्ञ, एण्डोकाई-नोलोजिस्ट आदि अनेक विद्याओं के विद्वानो ने वीर्य रक्षा के महत्व को स्वीकार किया है। टाल्मी, मार्शल, क्रेपेलिन आदि अनेक प्रसिद्ध चिकित्सा विज्ञानी इस पर सहमत हैं।
डॉ. जैकोबसन ने लगभग 200 चिकित्सा विज्ञानियों को पत्र लिखकर वीर्यरक्षा के प्रभावों पर उनकी सम्मति माँगी। चन्द अपवाद सबने वीर रक्षा के लाभ दायक प्रभावों को माना।
कुछ विद्वानो ने दावा किया कि मानसिक अवसाद उनमे अधिक है जो अविवाहित हैं। अतःयह गलत है कि वीर्य के शरीर से बाहर जाने पर शरीर व बुद्धि रोगी बनते है। इस दावे की जाँच करने पर पाया गया कि ऐसे अविवाहितों के न्यूरैस्थीनिया जैसे मानसिक व शारीरिक रोगों का कारण वीर्यनाश था। वे अप्राकृतिक क्रियाओं से अपने शुक्र(वीर्य) को बाहर निकाल रहे थे। अतः उनके रोग का कारण अविवाहित होना नहीं, वीर्य का शरीर से बार-बार बाहर निकलना था।
लोवेनफील्ड नामक गयनाकोलोजिस्ट का कहना है कि आजीवन वीर्य रक्षा करने पर कोई बुरे प्रभावों की आशंका नहीं है. इल्लीनोस विश्वविद्यालय के प्रो. एफ.जी.लीडस्टोन एंडोकाईन तथा रति विशेषज्ञ हैं। उनका कहना है कि वीर्य रक्षा किसी प्रकार भी हानिकारक नहीं हो सकती। उल्टा यह परम बल बौद्धिक क्षमता को बढ़ाने वाला है।
रूगल्ज़ नामक विद्वान का मत है कि पूर्ण ब्रह्मचर्य पूर्ण स्वास्थ्य का साधन है। डॉ. पेरिएट का कहना है कि पूर्ण ब्रह्मचर्य पालन से हानि होने की बात निराधार व काल्पनिक है। वीर्य रक्षा से तो भुजाओं का बल और बुद्धि बढ़ती है, उनकी रक्षा होती है।
चैसाईग्नेक (Chassignac) नामक चिकित्सा विज्ञानी एक और रोचक तथ्य बतला रहे हैं। उनका कहना हैकि युवा अवस्था में पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करना अपेकृत सरल है। जो मानसिक रूप से विकार ग्रस्त और रोगी हैं, ब्रह्मचर्य का पालन करना उनको कठिन लगता है।
रॉयल कालेज – लंदन के प्रो. बीले (Beale) का कहना है ‘काम-संयम से किसी हानि होने की जानकारी आजतक किसी भी अध्ययन में नहीं मिली है।’
इसका अर्थ तो यह हुआ कि अनेक चिकित्सक रति विशेषज्ञ, मनोवैज्ञानिक, गायनाकोलोजिस्ट लोगों को जानबूझकर या मूर्खतावश गलत मार्गदर्शन दे रहे हैं कि वे ‘वीर्यपात’ किसी उपास से करते रहें तो मानसिक तनाव नहीं होगा।
वासनापूर्ण जीवन को बढ़ावा देने वाले कई झूठे, तोड़मरोड़कर बनाए शोध भी छापे जाते हैं। एक बार एक शोध छपा कि वृद्धावस्था में ‘कामक्रीड़ा’  या अप्राकृतिक उपायों से ‘वीर्यस्खलन’ करने से प्रोस्टेट कैंसर से बचाव होता। जबकि शोध और जीवन के प्रत्यक्ष अनुभव बतलाते हैं कि जो संयम से रहते हैं, वे स्वस्थ, प्रसन्न और लम्बे समय तक जीते हैं। इसके विपरीत जो बूढ़े वासनापूर्ण जीवन जीते हैं, वे रोगी, निस्तेज और दुःखी रहकर कम आयु में अनेक रोगों का शिकार होकर मरते हैं।
‘एक्टॅन’ नामक विश्वप्रसिद्ध चिकित्सा वैज्ञानिक का कहना है कि संयम पूर्ण जीवन जीने से नपुसंकता और जननांग का अविकसित होने की बात भी तथ्यों पर आधारित नहीं, एक भ्रम है।
गायनाकोलोजिस्ट ‘हीगर’ सैक्स को जरूरी मानने की बात गलत और गलतफहमी मानते हैं। एक ओर प्रसिद्ध गायनाकॉलोजिस्ट ‘रिबिंग’ (Ribbing) ब्रह्मचर्य की उपयोगिता व लाभ की प्रशंसा करते हैं।

 

 

 

कामवासना की अमूल्य ऊर्जा-४

जाने-माने विद्वान चिकित्सक ‘मार्शल’ अपनी पुस्तक ‘इट्रोडक्शन टू द फिजियोलॉजी’ में लिखते हैं कि प्रजनन अंगों के संयम से काम शक्ति की सुरक्षा द्वारा अनेक प्रसिद्ध प्रतिमाओं ने महान उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं। इन लोगों की अभूतपूर्व उपलब्धियों का कारण संयमपूर्ण जीवन था।
अमेरीका के एक जाने-माने न्यूरोलोजिस्ट डॉ. एल रोबीनोविच कहते है कि काम-संयम केवल हानि रहित ही नहीं लाभकारी भी है।
सन् 1906 में अमेरीका मैडिकल ऐसोसिएशन ने सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास किया कि संयम करना स्वास्थ्य के लिए बुरा नहीं है। इस प्रस्ताव को पास करने की जरूरत क्यो पड़ी? स्पष्ट है कि अमेरीकी समाज में भी यह झूठा प्रचार स्वार्थी या भ्रमित चिकित्सकों ने फैलाया हुआ है कि काम क्रिडाएं व भोग करते रहने से मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य में लाभ होता है और संयम से रोग लगते हैं। अमेरीकी समाज में चल रही बहस और दुविधा को दूर करने के लिये अमेरीकी संस्थाओं को यह प्रस्ताव इंटरनेशनल ब्रूलेल्ज— काँग्रेस ने भी प्रस्ताव किया कि संयम (या ब्रह्मचर्य) पूर्ण जीवन स्वास्थ्य विरोधी नहीं है और संयम संक्रमण से सुरक्षा देने वाला है। अपने शरीर को साफ शुद्ध रखने का उपाय है। क्रिस्टीनिया पुनिवर्सिटी की मैडिकल फैकल्टी ने भी वक्तव्य जारी किया कि संयम से हानि होने के पूर्वाग्रही विचार का कोई आधार नहीं। अनेक अध्ययनो से पता चलता है कि संयम व पवित्र जीवन से हानी नही हो सकती।
अमेरीकी समाज की दुर्दशा और विचित्र स्थिति का अनुमान वहाँ जाकर ही सही हो सकता है। उदाहरण के लिये, वहाँ के समाचार प्रत्र 5-10 पन्ने के नहीं 100-50 पृष्ठों के होते हैं। उनमें होता क्या है? 3/4 भाग वेश्याओं के विज्ञापनो व चित्रो से भरा होता है। मेरे शरीर का माप यह है आदि। भारत भी धीरे-धीरे इस दिशा में बढ़ाया जा रहा है।
मूत्र-इंद्री और स्तनों का आकार बढ़ाने, सन्तती निरोध के अश्लील विज्ञापन अखबारों, पत्रिकाओं व इलैक्ट्रोनिक मीडिया में बढ़ते जा रहे हैं। उसी मात्रा में बलात्कार, व्यभिचार, शारीरिक व मानसिक रोगी, चरित्रहीनता भी बढ़ती जा रही है। हमारे कर्णधार आजतक भारत की राजनैतिक, सामाजिक व साँस्कृतिक दिशा क्या व कैसी हो? यह नही समझ पाए हैं। उसी भटकाव के कारण हम अपनी सुसंस्कृति त्यागकर, विदेशी विकृतियों का शिकार हो रहे हैं। वह सब बरबादी कर रहे हैं आधुनिक और विकसित होने के नाम पर।
हैवलॉक ऐलिस ने ‘स्टडीज़ इन दि फिज़ियोलॉजी ऑफ सैक्स’ नामक पुस्तक किखी है। वे इस पुस्तक में डॉ. एफ. ब्री. फ्रेडरिक’ को उद्यृत करके कहते हैं कि-
जब घोड़ा (sta—-ion) पहली बार समागम करता है तो मृतक जैसे बेहोश होकर गिर पड़ता है। रोबिनसन ने
—- नशों के व्यापार के साथ वासना का भी बहुत विशाल बाजार युरोप, अमेरीका, आफ्रिका व एशिया में चलायां जा रहा है। वे ही व्यापारी लोग इन सब चीजों को बढ़ावा दे रहे हैं। पास करने की जरूरत पड़ी होगी —–
ब्रेन ऐनीमिया की अवस्था बतलाया है।
एक और घटना का वर्णन वे करते हैं। साँड गाय के साथ समागम के बाद सुस्त होकर कोने में कइ घण्टे पड़ा रहता है। ( भारतीय साँडो पर इतना प्रभाव होता नजर नहीं आता। अध्यय करने योग्य है।)
इसमे अपवाद केवल कुत्ते हैं। शायद लम्बे संसर्ग के कारण ऐसा होता हो? — तो मर ही जाते हैं।
डॉ. राबिनसन के ऐलिस लिखते है कि-
हम जानते है कि काम-क्रिड़ा में शरीर में अनेक प्रकार की जैविक, रासायनिक क्रियाएं होती हैं। हमारे मांसपेशियाँ व शरीर के सभी अंग कितने उत्तेजित हो जाते हैं। इससे हम समझ सकते है कि काम-क्रिया शरीर पर कितने गम्भीर प्रभाव होते हैं। धोड़े व सांड निस्तेज होकर पड़े रहते हैं, mare …. मर जाते हैं।

 

 

 

कामवासना की अमूल्य ऊर्जा-५

 

ब्रायन रॉबिनसन ने इस विषय पर गहन अध्ययन किया है। काम-क्रीड़ा तथा वीर्य स्राव से होने वाले गम्भीर प्रभावों का वर्णन उनके द्वारा किया गया है।
पहली बार समागम करने के बाद अनेकों युवा अचेत, निस्तेज, बार-बार मूत्र त्याग आदि कष्ठ पाते देखे गए। कुछ लोगों में सहवास के बाद मृगी के दौरे पडते भी देखे गए हैं।
अधिक आयु के लोगों में समागम के बाद अधरंग (Paralysis) होने की भी अनेक धटनाएं सामने आई हैं। वृद्धों में उत्तेजना से सक्त प्रवाह तेज होने को नाडियो सहन नहीं कर पाएं तो रक्तचाप बढ़ने और अधरंग होने जैसी दुर्धटनाएं घटती हैं।
अपरिचित या नई महिलाओं के साथ समागम के बाद अनेक लोगों के मरने की घटनाएं भी आम बात है। नई साथी होने के करण उत्तजना सामान्य से अधिक बढ़जाना इसका कारण है। अनेक युवा पत्नी या वेश्या की बाहों में समागम के बाद मर गए।
रूसी जनरल एक बदनाम लड़ली के साथ समागम करते हुए मर गए थे। डॉ. रॉबिन्सन ने एक न्यायधिश का वर्णन किया है जो एक वेश्या से संसर्ग करने के कुछ ही देर बाद मर गए। एक 70 साल के वृद्ध के बारे में वे लिखते हैं जो एक वेश्यालय में समागम करने के कुछ देर बाद मर गया। शिकागो के एक होटल में एक 48 साल का व्यक्ति एक विधवा के साथ सोया और मर गया। इसका वर्णन भी डॉ. रॉबिन्सन ने किया है। एक 60 साल के बूढ़े की घटना का वर्णन है जो एक अपरिचित औरत के साथ सोया और उठकर दरवाजे से बाहर निकलते समय मर गया।
ऐसी दुर्घटनाएं अधिकतर अधिक आयु के पुरुषों के साथ होती हैं। विशेषकर जब वे अपनी पत्नी के स्थान पर किसी अपरिचित या नई महिला के साथ सम्बन्ध बनाते हैं। अपरिचित या नई स्त्री के लिये उत्तेजना अधिक होने से और उस औरत की अधिक उत्तेजना के कारण ऐसी घटनाएं घटती हैं।
ऐक्टॉन नामक प्रसिद्ध चिकित्सकने ऐसी अनेक घटनाओं का वर्णन किया है जब पुरुष किसी स्त्री, वेश्या या अपनी पत्नी के साथ सैक्स करने के बाद मर गए। शरीर की शक्ति का भारी ह्रास वीर्यपात से होना इसका कारण है।
‘दि ऐवोल्यूशन ऑफ सेक्स’ नामक पुस्तक में थॉमसन और गीडेस ने वर्णन किया है कि मकड़ियाँ की कई जातियाँ ऐसी हैं जिनमें मकड़ा समागम के बाद मर जाता है। पतंगों में भी ऐसी कई प्रजातियाँ हैं।
वास्तव में प्रकृतिने अपने क्रम को चलाने के लिये विपरीत लिंगी आकर्षण बनाया है। इससे प्रजनन क्रम प्रजियों और वनस्पतियों में चलता है। प्राणियों में महप्रक्रिया समय, ऋतु, आयु के नियंत्रित होती है। हार्मोन स्रावइस प्रक्रिया को नियंत्रित करते हैं। मनुष्यों के इलावा सभी प्राणि प्रकृति की व्यवस्था के अधीन व्यवहार करते है। बौद्धिक क्षमता के कारण मनुष्य इसका अपवाद है। केवल वह हार्मोन स्रावों से उसका व्यवहार व आचरण नियंत्रित नहीं होता। वह अपनी बुद्धि का प्रयोग करके अधिक भोग करने में या भोगों को संयमित करने, नियंत्रित करने अथवा उनपर विजय पाने में सक्षम है।
मनुष्य की विडम्बना यह है कि आधुनिक मानव से अधिक भोगों को भोगना ही विकास तथा आधुनिकता की पहचान मानने लगा है। जीवन का उद्देश्य ही भोग भोगना बन गया है। परिणाम कैसे भयावह हैं, यह हम देख ही रहे हैं। बीमारियाँ, अपराध, नशे, व्यभिचार, अत्याचर, असुरक्षा, भय, अतंक, निर्धनता, अमानवीय व्यवस्थाएं, अमानविय शोषण आदि सभी का मूल कारण यह भोगोन्माद और कामोन्माद नहीं तो और क्या है?
हमारे सामने एक और आदर्श भी है जिसे हम भोगों की अंधी दौड़ में देख नहीं रहे। आजीवन संयम का पालन करने वाले विनोबा भावे, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द, श्रीमाँ, महर्षि अरविन्द जैसे अनेकों आदर्स जीवन हमारे सामने हैं जिन्होने संयम और मानवीय संवेदनाओं से अपने और दूसरों के जीवन को अविस्मरणीय योगदान दिए, अद्भुत क्षमताओं, प्रतिमा व शक्तियों को प्राप्त किया। इसी तरह अनेक विदेशी प्रतिभाएं हुई हैं जिनके पीछे वर्णन आया है।
गृहस्थ जीवन में रहकर भी संयम से अनेक प्रकार की प्रतिभाओं व आनन्द की प्राप्ति करने वाले आदर्श हमारे सामने है।
आचार्य श्री राम शर्मा, गांधी, पटेल, तिलक, लाल बहादुर शास्त्री आदि अनेक हैं जो विवाहित होकर भी संयमपूर्ण जीवन जीए और प्रतिमाओं के धनी बने।
इनमें गांधी जी का जीवन आज के युवाओं को विशे, प्रेरणा देनेवाला है। गांधी कभी अत्याधिक कामवासना में लिप्त थे। बाद में उन्होने अपनी वासना को जीतकर कठोर साधना व समय से इतनी शक्ति प्राप्त की कि भारत के सभी नेताओं और अत्याचारी अंग्रेज सरकार को भी उनके आगे झुकना पड़ा।
ये सब परिणाम संयम की कठोर साधना से सम्भव हो ते हैं। श्रीराम शर्मा आचार्य संयम व साधना से इतने प्रतिभावान बने कि संसार का सर्वाधिक साहित्य लिखने वाले वे सम्भवतः पहले (शायद अन्तिम भी) विद्वान हैं।
स्वामी दयानन्द ने घोडों की — को रोक दिया, यह भी संयम व ब्रह्मचर्य से सम्भव हुआ। स्वामी विवेकानन्द ने शिकागो में संसार के सारे विद्वानो को सम्मोहित कर दिया, तो यह भी तो संयम, साधना व ब्रह्मचर्य से ही हुआ।
वीर्य की रक्षा द्वारा प्राप्त शक्ति के द्वारा किसीभी कठिन से कठिन संकल्प को प्राप्त किया जा सकता है। इसपर अनेक शोध और प्रयोग भारत तथा विश्व के अनेक देशों में हुए है।
‘दि सीक्रेट’ नामक विश्व प्रसिद्ध पुस्तक तथा बीडियो में भी संकल्प के अनेक चमत्कारों का वर्णन है। पर असली सीक्रेट उसमे भी नहीं बतलाया कि जिन लोगों में संकल्प से चमत्कार किये, उन सबने कठोर ब्रह्मचर्य का पालन किया था।
सफल, सुखी, शक्तिशाली, आनन्द व मस्तिभरे जीवन का रहस्य है संयम अर्थात् ब्रह्मचर्य। गृहस्थी में भी सीमित भोग से ब्रह्मचर्य के काफीलाभ प्राप्त हो सकते हैं। विद्यार्थी जीवन में सफलता का एक मात्र सूत्र है ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन। इससे आत्मविश्वास, स्मरण शक्ति, प्रसन्नता, उत्साह, साहस, प्रतिभा, सकल्पशक्ति के विपुल भण्डार प्राप्त होते हैं।
ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले ही सुखी व सफल गृहस्थ जीवन चलाते हैं। जीवन में सफलताएं उनके चरण चूमती हैं। उनके संकल्प पूर्ण होते हैं। पर यदि हम अपने जीवन सार को गंवा चुके हैं, शरीर खोखला, दुर्बल हो चुका है; तो उसका समाधान भी आयुर्वेदिक चिकित्सा व साधना से सम्भव है।

38 thoughts on “कामवासना की अमूल्य ऊर्जा

  1. सर मे किशोरावस्था से हि हस्तमैथुन कर रहा हु! मुझे इस क्रिया मे कोई आनंद नहिं आता !में इस क्रिया को नहीं करने का बहुत प्रयास करता हु,पर असफल रहता हु! हस्तमैथुन के कारण मेरा शरीर बहुत दुबला हो गया हैं। रोग प्रतिरोध क्षमता कमजोर हो गयी हैं। न्योरेस्थेनिया के लक्षण दिखाई देने लगे!कोई सुयोग्य चिकित्सक नहीं मिल रहें !बहुत से चिकित्सकों को दिखाया सभी लुटतें हैं। में गरीब परिवार से हु महोदय
    थक चुका हु आप मे आशा कि किरण दिखलाई देती हैं।
    महोदय मेरा ईलाज आप करें आप का सदेव आभारी रहुगा!आप का पता लिखें !धनधन्यवाद!

  2. राजेश जी मेरे दो बेटे है ऐक 13वर्ष का एक7वर्ष मैं उन्हें योग्य व्यक्ति बनाना चाहती हूँ मैं सवयं कुंडलीनी साधना के द्वारा कम समय मे एक गुरु की करपा से कुंडलीनी जागरण कर पाई आगे की साधना चालू है मैं चाहती हूं कि मेरे बच्चे भी इस मार्ग पर चले कया मैं उनहें वजरौली क्रिया अभी से सिखाऊ या आप कोई और तरीका क्रप्या बताऐंगे

    1. 16-17 वर्ष से पहले हठ योग की कठिन योग साधना करवाना उचित नहीं। केवल ध्यान, व मंत्र जाप करवाएं।

  3. मै पिछले ४५ वर्षो से प्रति हफ्ते औषत ७ बार वीर्य क्षय करता रहा हूँ. मुझे मधुमेह और रक्तचाप जैसे गम्भीर रोग के अलावा कुछ अजीब अजीब व्याधिया है. अभी mri करवाने पर ब्रेन का हल्का संकुचन भी दिखा. हाल में मैंने ३० दिन वीर्य रक्षा का संकल्प लिया लेकिन सातवे दिन संकल्प टूट गया. क्या वीर्य रक्षा से व्याधियो को रिभर्स किया हां सकता है. क्या कोई अन्तर्सम्बंध है ?

    1. ईश्वर आपकी रक्षा करें। किसी योग्य योगाचार्य की शरण में जाएं। शायद वह कुछ कर सके।

  4. कामवासना एक गंभीर मनोरोग हैं । यह नियंत्रित होना चाहिए ।अनियंत्रित होने पर यह व्यक्ति को इंसान से हैवान बना देता है। व्यभिचारी बना देता है । अपराधी बना देता है जैसा कि आजकल देखा जा रहा है। नियंत्रित होने पर यह वरदान और अनियंत्रित होने पर अभिशाप हो जाता है।

    1. श्रीमान गिरधारी लाल जी,
      आपकी बात एक दम सही संतुलित बात है।

  5. मुझे निम्न ३ कथन याद आते हैं.
    (१) ज्ञानेश्वरी में कहा है:
    दुरितांचे तिमिर जावो. (दुष्टों का अंधेरा टले.)
    विश्व स्वधर्म सूर्ये पाहॊ (विश्व स्वधर्म सूर्य प्रकाश से देखें.)
    जो जे वांछिल तो ते लाहो. (जो जो चाहे, वह उसे पाए)
    प्राणिमात्र: (प्रत्येक प्राणी)
    दूसरा *अनपढ* चित्रपट का है.
    (२) वो अफ़साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन।
    उसे एक खुबसूरत मोड देकर छोडना अच्छा.
    (३) इस लिए, आप जो भी मानना चाहते हैं, उसे मानने का आपका अधिकार हमें मान्य है.
    (४) संवाद को संवाद रखे. उसे विवाद बनने से रोके.

  6. मन में जिज्ञासा लिए मैं यहां केवल डॉक्टर राजेश कपूर जी से संपर्क हेतु आ पहुंचा हूँ|

    मैंने पाश्चात्य विद्वान् द्वारा प्रकाशित एक पुस्तक में पढ़ा है कि प्राचीन भारत में चिकित्सक प्रायः गणितिज्ञ भी हुआ करते थे और इस कारण अपने ज्योतिष व खगोल विद्या के ज्ञान द्वारा रोगी में संभावित शारीरिक व मानसिक दोष को जानते हुए उसका उपचार-व्यवहार किया करते थे| डॉक्टर राजेश कपूर जी, कृपया बताएं इस वक्तव्य में कोई सचाई है और यदि है तो क्या आज पाश्चात्य-चिकित्सा से प्रभावित इंडिया में कहीं ऐसी चिकित्सा-प्रणाली प्रचलित है? धन्यवाद|

      1. डॉ. राजेश कपूर जी, मेरे प्रश्न को ध्यान में रख उत्तर हेतु आपके बहुमूल्य समय के लिए आपको धन्यवाद| लेकिन किसी कारण-वश—हो सकता है कि ईमेल सेवा ही समाप्त कर दी गई हो—मैं आपके उत्तर को नहीं देख पाया हूँ| वैसे भी मेरे प्रश्न का उत्तर सार्वजनिक ज्ञान और रूचि के लिए है और मैं चाहूँगा कि कृपया आप उसे यहाँ प्रवक्ता.कॉम के पन्नों पर साँझा करें| जहां मैं सभी भारतीयों के अध्यात्मिक व भौतिक विकास हेतु उनमें एक भारतीय-मूल की सामान्य भाषा द्वारा संगठन की आशा लगाये बैठा हूँ उसी पल अधिकांश बहुसंख्यक भारतीय जनसमूह में गरीबी और अज्ञानता के चलते उनके स्वास्थ्य संबंधी स्थिति को देख व्याकुल हो रहा हूँ| मेरे विचार में पाश्चात्य चिकित्सा समरूप भारत में, विशेषकर ग्रामीणों के हित में, आयुर्वेद को पुनः प्रचलन में लाना होगा|

    1. तंत्र, मंत्र, यंत्र कभी आयुर्वेद चिकित्सा का आवश्यक अंग थेः पर अब आधुनिकता के प्रभाव में वह सब औपचारिक आयुर्वेद शिक्षा में नहीं रहा है। हौसकता है कि कुछ लोग इन विधाओं का प्रयोग कलते हों। ज्योतिष, यंत्र, व मंत्र से चिकित्सा करने वाले कभी कभी को ई मिल जाते हैं पर इस विधा का विशेषज्ञ मिलना कठिन है।

      1. आधुनिक चिकित्सीय विज्ञानं में नैदानिक यंत्रों के अतिरिक्त जीनोम का अध्ययन भारतीय दर्शन में कर्म और फल के सिद्धांत में एक कड़ी सा प्रतीत होता है| मेरे कार्यकाल दौरान पढ़े एक लेख में यूरोपीय देश के विद्यार्थियों द्वारा क्रिसमस पर्व पर गुणगान गाते कोई बच्चे का मूर्छित हो गिर जाने का वर्णन दिया गया है| बहुत जांच-पड़ताल के बाद जब गुणगान गाते किसी एक स्वस्थ बच्चे के अकस्मात् मूर्छित हो गिर जाने का कारण न मिल पाया तो अधिकारीयों ने एक महामारी विशेषज्ञ की सहायता से उक्त क्रिसमस गुणगान में शब्दों को लम्बी तान में गाने से उत्पन्न अतिवायानता को दुर्घटना का कारण पहचाना| सोचता हूँ कि क्या ऋषि-मुनियों द्वारा रचाए मंत्र बार बार उच्चारण करने पर श्वास-प्रणाली में स्थिरता ला शरीर को स्वस्थ बनाए रखते थे?

        डॉ. राजेश कपूर जी, जिज्ञासा भरे मेरे प्रश्न के उत्तर में आपके विचारों के लिए मेरा धन्यवाद|

  7. मैने श्री राजेश कपूर जी के लेखो को व श्री डॉ. मधुसुदन जी के विचारो को ध्यानपूर्वक पढा | मै श्री कपूर जी के विचारो से काफी हद तक सहमत हूँ कि वीर्य का सर्जन व ब्रह्मचार्य का पालन करना चाहिए | पर यह अध्यनकाल तक सीमित रहे तो ठीक है जो स्मरण शक्ति को बढाता है जो ज्ञान व् विध्धा को अर्जन करने के लिए अति आवश्यक है|पर गृहस्थ आश्रम में पदार्पण होने व शादी हो जाने के बाद इतना आवश्यक नहीं है जितना २५-२६ वर्ष की अवस्था तक है|नर और नारी की ये बायोलॉजिकल आवश्यकता है ओर स्रष्टि को चलाने के लिए और उसके नियमो का पालन करना भी जरूरी है पर सम्भोग सीमित दायरे में होना चाहिए|किसी चीज का अतियाधिक उपयोग करना हमेशा हानिकारक ही होता है और समाज में विकृति पैदा होने लगेगी जैसा की आजकल के समाज में हो रहा है|

    1. शायद लेख के अर्थ समझने में चूक हुई है। सभी पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करें, ऐसा कहना लेख का उद्देश्य नहीं है। फिर तो मानव समाज समाप्त नहीं हो जाएगा?
      * षड़यन्त्रकारी, झूठी अवधारणाओं के चलते, असीमित, अतिवादी वासना के कारण बर्बाद होरहे युवाओं व सारे समाज की आँखें खोलने का प्रयास यह लेख है।
      * लेख में प्रमाणिक जानकारी, शोध हैं कि सयंम कितना अदभुत परिणामकारी है और अति भोग कितना विनाशकारी।
      * जल्दबाजी में लेख पढ़ने से कई बार गलत निष्कर्ष निकलते हैं। और तो किसी पाठक को नहीं लगा कि लेख में काम-क्रीड़ा को पूर्णतः वर्जित किया गया है।

  8. गोत्र का निर्धारण भी शायद इसी लिए पति के गोत्र से निर्धारित होता, ==> डी. एन, ए. (?) परीक्षणों में पाया गया है. कुछ ४-५ वर्ष पहले इसकी चर्चा भी हुयी थी. दादा आठवले शास्त्री जी की पुस्तक में भी इसका पूरा विवरण देखा हुआ स्मरण है. पर सूक्ष्मताओं से अनभिज्ञ हूँ.

  9. डॉ. राजेश जी —नमस्कार.
    ऊर्जा –की व्युत्पत्ति *ऊर्ध्व*(ऊपर की दिशा का अर्थ) शब्द से जुडी प्रतीत होती है. ऊर्जा मेरू दण्ड पर सात चक्रों से ऊपर चढाई जा सकती है. सृजन(मौलिक संशोधन) की ऊर्जा और प्रजनन की ऊर्जा दोनो अलग प्रकार के सृजन की ऊर्जाएं ही हैं. ब्रह्मचर्य के पालन से और ध्यान योग से, आप प्रजनन की ऊर्जा का रुपांतरण कुछ नए सृजन की ऊर्जा में ही करते हैं. जैसे जैसे आप ध्यान द्वारा ऊर्जा को ऊपर की दिशा में *चक्र प्रति चक्र* { चढाते जाते हैं; आपकी मौलिक सृजन की ऊर्जा (शक्ति) भी रुपांतरित होती जाती हैं} कुछ संशोधकों का अनजाने ही एकाग्र चित्त हो जाता है; तो उसे भी ध्यान ही माना जा सकता है. यह पढा हुआ था. स्मरण हो रहा है योगी अरविन्द का नाम. सोचा यह जानकारी आलेख की टिप्पणी में डाल दूँ. ढूँढ रहा था वह पुस्तक–पर मिली नहीं. इस ले स्मरण से लिखा है.
    धन्यवाद.

    1. आदरणीय डा. मधुसूदन जी नमस्कार।
      आपकी संक्षिप्त, सारगर्भित, लेख की पूरक बनी टिप्पणि के लिये पुनः आभार।
      निःसन्देह यह ऊर्ध्वगामी होनेवाली ऊर्जा ही जीवन का सबसे मूल्यवान सार तत्व है। शिव पार्वति से कहते हैं कि स्वर्ग से भी मूल्यवान यह ब्रह्मचर्य है। डा. साहब हमारी प्रतिभा को कुण्ठित करने, हमे नकारा बनाने के लिये उत्तेजना, कामुकता को बढ़ाने के अनेक प्रयास, आक्सीटोसिन जैसे रसायनों का योजनबद्ध प्रयोग बहुत व्यापक स्तर पर चल रहे हैं।

  10. धन्यवाद डॉ. राजेश कपूर जी. आपकी टिप्पणी के कारण ध्यान गया. जब पहले छपा था, दृष्टि से ओझल रहा. बहुत बहुत महत्त्वपूर्ण जानकारी भरे आलेख के लिए अभिनन्दन.
    मेरे एक मित्र भरत भाई गज्जर जो योग सिखाया करते थे, उन्हों ने एक अमरिकन पति -पत्‍नी को ऐसा ही परामर्श दिया था. जिसका सफल परिणाम मात्र ४ सप्ताह में अनुभूत हुआ था.
    (१)स्वामी तिलक जी के चेहरे पर भी ऐसी ही ब्रह्मचर्य की चमक और आध्यात्मिक शक्ति दिखाई देती थी. बर्फ़ में नंगे पाँव धोती और कंधेपर शाल ऐसे वे अमरिका की ठण्ड में खुले घूमे थे.
    (२) योगी अरविन्द:==> *मनुष्य की मौलिक सर्जन शक्ति ब्रह्मचर्य के पालन से वीर्य को ओज की ऊर्जा में परिवर्तित कर मसिष्क की ओर उठाकर, मौलिक सर्जन करवाती है.* योगी अरविन्द, विवेकानन्द, दोनों का साहित्य यही कहता है.
    ** दोनों ही सर्जक शक्तियाँ हैं. ओज से वीर्य ऊपर उठकर मानसिक(बौद्धिक) सर्जन में परिवर्तित होता है. जब ऐसा घटता है, व्यक्ति को अनुभव भी हुआ ऐसा पढा हुआ है. (३) ब्रह्मचर्याश्रम का ब्रह्मचर्य ही क्रिएटिव (सर्जक) होता है. इसी लिए विद्यार्थी अनोखी सफलता प्राप्त करता है, और सारे संशोधक (अनजाने ) एकाग्र चित्तसे हमारा ध्यान योग ही करते हैं. फलस्वरूप संशोधन किया जाता है. { यह ध्यान किसी विशेषज्ञ से सीखना आवश्यक मानता हूँ.) धन्यवाद.
    मौलिक चिन्तन की यही विधा है. (मेरी समझ के अनुसार लिख रहा हूँ.)

    1. आपकी विद्वत्तापूर्ण टिप्पणी के लिये आभारी हूँ। धन्यवाद।

  11. manyawar , aapmne ek jagah likha hai ki istriyaan veerya ko grahan kr balwati hoti hain …….yah kitna sahi hai ?

    1. बात तो पूरीतरह सही है। आपको सन्देह है क्या?

      1. Hn Manyawar , qnki yadi aisi baat hai to istriyon k liye brahmchaarini Hona aniwaarya ni …..?

        Qnki brahmchaarini Hona to vyarth Siddh ho rha unke liye .

        1. ऐसा नहीं है। जब मन में वासना जागृत होती है तो स्त्रयों के शरीर में भी पुरुषों के समान रक्त आन्दोलित होकर जीवन का सारतत्व रक्त से लग होकर, जननांग से लिसलिसे पदार्थ के रूप में बाहर निकलने लगता है। इससे शरीर के सभी अंग दुरबल होने लगते हैं।
          जो स्त्रियां या युवतियाँ वासना के विचारों में अधिक रहती हैं, उनके रस शरीर से अधिक मात्रा में बाहर निकलजाने के कारण चेहरा निस्तेज, काले कीलों से भरा नजर आता है। पुरुष के वीर्य को ग्रहण करने से जितना लाभ मिलता है, जननांगों के दुरुपयोग की हानि उससे कहीं अधिक होती है। अधिक भोगपूर्ण जीवन स्त्रियों में अधिक रोगों का एक बड़ा कारण है।
          # एक और विशेष बात यह है कि हमारी चेतना जितना अधिक नीचे के केद्रों (प्रजनन अंगों में) रहती है, उतना ही अधिक हम नीचे गिरते जाते हैं, क्षूद्र विचार व क्षूद्र स्तर बना रहता है। क्षमता, प्रतिभा का जगरण नहीं होता। आनन्द, मस्ती, शक्ति से वंचित रहते हैं। शरीर की प्रसुप्त शक्तियाँ और प्रतिभा नहीं जागती। जैसे-जैसे हमारी चेतना नीचे के केन्द्रों उठकर ऊपर की ओर जाती है, हमारा आनन्द, मस्ती, मन की शति, प्रतिभा, बुद्धि बढ़ती जाती है। यह प्रतिभा जागरण व क्षमता वर्धन शुक्र व रज ( स्त्रियों में) की रक्षा से ही सम्भव हो पाता है।

          1. Tb ye kahna aapka galt h ki sex k dauraan istriyaan veerya ko grahan kr balwati hoti hain … qnki sex ki kaamna krne pr unka b bal raj rup me ghat he jata h … to vo veerya ko grahan kr balwati kaise ho gyi ?

            Mere vichaar se ye pankti aapko hta leni chahiye lekh se … qnki verna aise me istriyaan, mataayein aur bahine ye bhram paal leti hain ki shadi k baad veerya grahan kr vo balwati ho jayeingi ya unka swasthya achha ho jaayega …..mahodaya aapki us ek pankti pr hmko apatti h .

        1. आशीष जी –नमस्कार.
          *नर और नारी* (श्रीमाँ व अरविन्द के लेखों से संकलित) निबंधों की पुस्तक में इस संदर्भ में आप को जानकारी मिलेगी. इस पर कोई भी पैतरां मैं नहीं लेता. पर योगी अरविन्द (ऑरोबिन्दो) और माताजी की संकलित यह पुस्तक पढने का परामर्श है.
          हिन्दी में ही यह पुस्तक छपी है. (द्वारा: श्री अरविंद सोसायटी, पांडिचेरी)

        2. आप लेख ध्यान से पढ़ें। दोनो बातें सही हैं। पुरुष के स्वस्थ वीर्य को ग्ररहण करने से स्त्री का बल बढ़ता है। पर कामवासना की उत्तेजना व रक्तान्दोलन से उसके शरीर के सार तत्वव स्रवित होते हैं। अधिक वासनावेग व कामक्रीड़ा से स्त्रियाँ भी अधिक दुर्बल व रोगी होती हैं। विशिष्ट शरीर रचना के कारण कामक्रीड़ा की अधिकता से अनेकों रोग होते हैं। तभी आजकल अधिकाँश स्त्रियाँ छोटे-बड़े रोगों से ग्रस्त हैं।
          प्रदर, ब्रैस्टकैंसर, सर्विक्स कैंसर, अनेक प्रकार के मानसिक व यौन रोग, मासिक धर्म के रोग, हार्मोन असन्तुलन के रोग अत्यधिक होने के पीछे बड़ा कारण है अति भोग, विकृत उपायों का प्रयोग और कामुक विचारों की अधिकता।

          1. Maan lijiye ek isrti ne 30 varsh tak shuddh Brahmcharya ka paalan kiya …ab vo ek baar kisi purush se sambhog krti hai … to kya aap ye 200 puri balwata se kah payeinge ki us istri ka rup aur bal badhaane mein ye purush ka veerya sahayak siddh hoga ? , jbki raj rup mein istri k b bal aur rup ki haani huyi is sambhog kiriya mein .

  12. आपका कहना सही है। इन दानवाकार कम्पनियों को हर हाल में केवल पैसा कमाना है, उसके लिये वे अनैतिकता की सब सीमाएं लाँघ जाती हैं।
    समाधान केवल यही समझ आता है कि इनके काले कर्मों से पर्दे हटाए जाएं, जनमत जागृत किया जाय।

  13. असल में पाश्चात्य जीवन पद्धति एक उपभोक्तावादी पद्धति का स्थान ले चुकी है. कारखानो के अवशेष को नदियों में बहाने से प्राकृतिक रूप से पाये जाने वाले पानी का प्रदुषण आरम्भ हुआ, और पानी का एक बड़ा बाजार खड़ा हो गया आज यह अरबों में पहुँच चूका है, एड्स, हेपेटीटीएस बी ,और ऐसी कितनी ही अन्यांय दवाईयां हैं जो वपर को अरबों खरबों में ले जाती हैं. इसी प्रकार पाहिले ब्रह्मचर्य को चिकित्सकीय दृष्टि से गलत साबित करना और उसके स्थान पर जो तरीके सुझाएं जाय उनसे होने वाली बीमारियों का बाजार खड़ा कर दिया जाय. सरकार और चिकितसकों को चाहिए की वे वैज्ञानिक रूप से इस विषय पर चर्चा कर कोई नतीजे वाली बात सामने लाये.

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