गीता का कर्मयोग और आज का विश्व, भाग-63

राकेश कुमार आर्य


गीता का आठवां अध्याय और विश्व समाज
स्वामी चिन्मयानन्द जी की बात में बहुत बल है। आज के वैज्ञानिकों ने ‘गॉड पार्टीकल’ की खोज के लिए अरबों की धनराशि व्यय की और फिर भी वह ‘गॉड पार्टीकल’ अर्थात ब्रह्मतत्व की वैसी खोज नहीं कर पाये-जैसी हमारे श्री ऋषि-महर्षियों ने हमें युगों पूर्व करा दी थी। उसी परम्परा को बिना पैसे और बिना अधिक परिश्रम कराये श्रीकृष्ण जी युद्घ के मैदान में निर्वाह कर रहे हैं। अर्जुन से कह रहे हैं कि तनिक दिव्यदृष्टि का प्रयोग कर और देख ले ‘गॉड पार्टीकल’ अर्थात ब्रह्मतत्व।

श्रीकृष्ण जी ने दिव्य दृष्टि को इतना सरल कर दिया है कि जैसे खिडक़ी में हाथ दें और टिकट लेकर जा बैठो गाड़ी में। इससे पता चलता है कि हमारे यहां ज्ञान कितना सहज और सरल उपलब्ध था? पर यह तब था जब यौवन सिनेमाघरों के टिकट खरीदने में नहीं बीतता था, अपितु जब ब्रह्मतत्व को खोजने में ही यौवन बीतता था। आज के शिक्षाविद् तो ब्रह्मतत्व को खोजने की हमारी प्राचीन शिक्षानीति को या तो भगवावादी शिक्षानीति कहकर उसका उपहास उड़ाएंगे या उसे रूढि़वादी कहकर उपेक्षित कर देंगे।
है धन्य भारत देश मेरा धन्य मेरी भारती।
दिशाएं मंगल गीत गातीं दुनिया उतारे आरती।
स्वामी चिन्मयानन्द जी एक और प्रश्न का भी उत्तम समाधान देते हैं। वह कहते हैं कि संसार हमें एक रूप दीखता क्यों नहीं? क्यों यह शतश: सहस्रश: विभक्त है? क्यों यह नाना रूप है? नाना वर्ण हंै, नाना आकृति है, क्यों इसमें आदित्य, वसु, रूद्र, मरूत अलग-अलग दीखते हैं? क्यों यह विश्व हमें एक रूप ही नहीं दीखता? इसका कारण यह है कि हर वस्तु दूसरी वस्तु से देश (स्क्क्रष्टश्व) तथा काल (ञ्जढ्ढरूश्व) से जुदा है। एक वस्तु यहां है, दूसरी वहां है-यह देश के कारण वस्तुओं की भिन्नता है। एक घटना आज हुई दूसरी घटना पहले या पीछे हुई-यह काल के कारण भिन्नता है। इन्हीं दो कारणों से संसार का नानात्व है, इन दोनों कारणों को हटा दिया जाए तो नानात्व समाप्त हो जाता है, सब संसार एक जगह सिमट आता है। श्रीकृष्णजी ने अर्जुन के मन से देश तथा काल की भावना को निकाल दिया। जब देश तथा काल को निकाल दिया तब उसे पास का और दूर का, भूत का और भविष्य का सब एक ही स्थान पर एक ही काल में दर्शन होने लगा। जो दूर से दूर हो रहा था-वह सामने दीखने लगा। जो सृष्टि में अब तक हो चुका था और जो आगे होने वाला था-वह उसी समय दीखने लगा।
विश्व रूप का दर्शन
संजय ने धृतराष्ट्र को बताया कि महाराज ऐसा अपना उपदेश जारी रखते हुए श्रीकृष्ण जी ने अर्जुन को अपना विश्वरूप-ईश्वरीय रूप दिखाया। जिसमें अनेकों मुख, अनेकों नेत्र, अनेकों अदभुत दृश्य थे। वह अनेक दिव्य अलंकारों से सुभूषित था तथा उसने अनेक दिव्य शस्त्र उठा रखे थे। वह दिव्य मालाओं, वस्त्रों से और सुगंधित लेपों से युक्त था, उसके मुख चारों ओर थे। वह आश्चर्यमय था। उसकी आभा हजारों सूर्यों के समान है। उस महात्मा में अर्जुन ने सारे जगत को एक साथ देखा। तब अर्जुन हाथ जोडक़र सिर झुकाकर खड़ा हो गया, पर वह बहुत ही आश्चर्य चकित और रोमांचित था।
संजय ने ईश्वर के दिव्यस्वरूप का या विश्व रूप का उसकी आत्मा के अनुसार ही चित्रण किया है। वह अविनाशी ब्रह्म का मानवीयकरण कर रहा है। याद रहे कि यह उस ब्रह्म का मानवीयकरण है जो इस चराचर जगत का कारण है। अत: जगत के कारण उस ब्रह्म को यूं ही कोई ‘ऐरा-गेरा नत्थू खैरा’ तो दिखा नहीं सकता। उसमें तो कुछ अनोखापन होना ही चाहिए। यही कारण है कि उसे हजारों सूर्यों के समान तेजस्वी बताया गया है। वास्तव में जो ब्रह्म अनेकों असंख्यों सूर्यो को बनाने वाला है और जिसके असंख्य लोकों में ऐसे कितने ही सूर्य इस सूर्य से भी लाखों गुणा बड़े आकार के हों-वह तो कुछ ऐसा ही होना चाहिए जैसा उसे संजय ने बताया कि वह हजारों सूर्यों के समान तेजस्वी है।
इस विराट ईश्वर को देखकर अर्जुन आश्चर्य चकित और रोमांचित हो उठता है। उसने अपने जीवन में ऐसा दृश्य कभी पूर्व में नहीं देखा था। उसके लिए यह अनुपम, अद्वितीय और अनोखा दृश्य था। जिसके सामने उसका हाथ जोडक़र खड़ा हो जाना ही उचित था।
अर्जुन कहने लगा कि हे देव! मैं आपके इस रूप में, इस देह में सब देवताओं को, सब प्राणियों को ब्रह्मा को, ईश को, विष्णु को और ऋषियों को देख रहा हूं। मैं देख रहा हूं कि आपका न तो आदि है, न अंत है और न ही मध्य है। चारों ओर आप ही आप हैं। आपके अनेक नेत्र और अनेक मुख हैं। मैं आपको मुकुट, गदा और चक्र धारण किये चारों ओर से तेज की राशि से दीप्त होते हुए देख रहा हूं।
जब व्यक्ति के ज्ञानचक्षु खुल जाते हैं तो उसकी स्थिति वैसी ही हो जाती है जैसी कि अर्जुन की हो गयी है। उसे परमपिता-परमात्मा और उसकी ज्योति सर्वत्र भासने लगती है। उसके अनेक हाथ दीखने का अभिप्राय है कि वह करोड़ों-अरबों नहीं अपितु असंख्य प्राणियों का अन्नदाता है। हर दिन प्रात:काल में वह हर प्राणी के निमित्त का अन्नादि बांटता है। उसकी इस रूप में पूजा करने वाला उसे अनेकों हाथों वाला ही कहेगा। वह दे रहा है और हर दिन दे रहा है, फिर भी उसके भण्डार समाप्त नहीं होते उसे ऐसा मानने वाला परमैश्वर्य संपन्न ही मानेगा और उसका ऐसा ही चित्र बनाएगा। वह परमात्मा शत्रु सन्तापक है, दुष्ट संहारक है, वह अपने भक्तों का त्राता है, उसे ऐसा मानने वाला उसके हाथों में गदा देखेगा, चक्र देखेगा और उसे सेनाओं का सेनापति मानकर मुकुट से सुशोभित हुआ भी देखेगा। उससे छुपकर कोई पाप नहीं किया जा सकता, उसे ऐसा मानने वाला उसके अनेक नेत्रों का दर्शन करेगा, अर्जुन उसे ऐसा ही देख रहा है। उसके अनेक रूप एक साथ प्रकट हो रहे हैं और अर्जुन विस्फारित नेत्रों से उसे देख रहा है। उसके अनेक रूपों को देखने का अभिप्राय है कि अर्जुन को ज्ञान हो गया है और वह यह समझ गया है कि वह परमात्मा हमारी किन-किन रूपों में सहायता करता रहता है? अभ्यास से हम लोग अपने भीतर भी एक ऐसी शक्ति का आभास करने लगते हैं जो हमें भीतर बैठी-बैठी गलत कार्यों से रोकती और टोकती है तो अच्छे कार्यों पर हमें प्रोत्साहित करती है, हमारा मनोबल बढ़ाने के लिए पिता के रूप में हमारी पीठ थपथपाती है। मां के रूप में हमें छाती से लगाती है। अपने स्थान से जब हम कहीं दूर देश में होते हैं तो वह शक्ति वहां भी हमारे लिए माता-पिता, गुरू, मित्रादि की कमी की पूर्ति करती रहती है। बात साफ है कि जो कुछ अर्जुन के साथ हो रहा था-वह हमारे साथ भी होता है। पर हमने अपने साथ होने को हल्के में ले लिया है और अर्जुन के साथ होने को खास मान लिया है। जबकि श्रीकृष्णजी ने अर्जुन को जो कुछ दिखाया या गीताकार ने इस होने को जिस प्रकार महिमामंडित किया-वह इसलिए किया कि यह खास होकर भी आम बन जाए, सर्वसुलभ हो जाए। जब कोई चाहे तब बाहर की चर्मचक्षु बन्द करे और भीतर अपने प्रियतम की झलक पा ले। गीताकार के इसी दृष्टिकोण को समझकर हमें अर्जुन बनने की दिशा में कार्य करना चाहिए। गीता के रूप में और वैदिक साहित्य के रूप में श्रीकृष्ण जी हमारे साथ हैं, हमें ही अर्जुन बनना होगा। हमने अर्जुन और कृष्ण को महाभारत का पात्र मानकर उन्हें वहीं तक सीमित कर दिया है। जबकि सनातन ज्ञानपरम्परा का अभिप्राय यह होता है कि वह ज्ञान के प्रतीकों को सनातन ही रखती है।
क्रमश:

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