पढ़े लिखे लोगों को मूर्ख बनाने की कला में माहिर है केजरीवाल

डॉ मनीष कुमार

एक पुरानी कहावत है, भैंस अगर पूंछ उठाएगी तो गोबर ही करेगी. लेकिन केजरीवाल के केस में ये कहावत केजरीवाल के मुंह पर लागू होती है. केजरीवाल एक पेशेवर झूठे व्यक्ति हैं. ये झूठ बोल कर लोगों को झांसा देने को ही वो राजनीति समझते हैं. वो एक आत्मकामी (narcissist) व्यक्ति है जो किसी भी हद तक गिर कर खुद को महान साबित करना चाहता है. पंजाब चुनाव में मुंह काला करवाने के बाद अब केजरीवाल के मुंह में जुबान आई है. आप कार्यकर्ताओं को संबोधित किया. हमेशा कि तरह केजरीवाल का भाषण झूठ और फरेब की पोटली थी. लोगों को भ्रमित करने वाला भाषण था. विफलता से पैदा हुई छटपटाहट को इंगित करने वाला भाषण था.

केजरीवाल ने ऐलान किया है कि दिल्ली को पूर्ण राज्य घोषित करवाने के लिए वो आंदोलन करेगें. केजरीवाल को ये हसरत पूरी करने की पूरी छूट देनी चाहिए ताकि इस आत्मकामी व्यक्ति को पता चल सके कि लोग आंदोलकारी-केजरीवाल की अत्येष्ठि कर चुके हैं. अब जो बचा है वो दिल्ली के अबतक की सबसे भ्रष्ट सरकार का मुखिया है जिसका पूरा का पूरा मंत्रिमंडल ही भ्रष्टाचार के आरोप में फंस चुकें है. अब जो केजरीवाल बचा है वो आंदोलनकारी-केजरीवाल की झूठ की खेती से पैदा हुआ एक ऐसा शख्स है जो अपने हर पुराने बयानों पर माफी मांगती फिरता है. आज का केजरीवाल दोयम दर्जे का एक ऐसा नेता बन चुका है जो भ्रष्टाचार के महारथियों की रथ (महागठबंधन)पर सवार होने के लिए गिरगिरा रहा है लेकिन वहां से भी लोगों ने उसे दुत्कार दिया है.

लेकिन एक आत्मकामी की ऐंठन इतनी जल्दी जाती नहीं है. वो भ्रम की दुनिया में जीना पसंद करता है. यही वजह है कि आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए केजरीवाल में खुद को महात्मा गांधी बता दिया. केजरीवाल के गैंग की समस्या यही है कि इन लोगों ने खुद को स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ने वाला पार्टी होने का भ्रम पाल रखा है. इतना ही नहीं, आपस इन लोगों ने ये भी तय कर लिया है इनमें से कौन गांधी है.. कौन नेहरू.. कौन पटेल. और कौन सुभाष चंद्र बोस हैं. इनकी मानसिक दिवालिएपन की हद ये है कि ये हर झूठी लड़ाई को स्वतंत्रता संग्राम बता देते हैं. तालकटोरा स्टेडियम केजरीवाल ने कहा दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने की लड़ाई स्वतंत्रता संघर्ष की तरह है. जिस तरह कि महात्मा गांधी ने ब्रिटिश शासन के दौरान भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया था और उसी तरह वो भी दिल्ली ‘एलजी दिल्ली छोड़ो’ अभियान शुरू करेंगे. मतलब ये आज भी खुद को गांधी समझ रहा है. जबकि लोग केजरीवाल को नए जमाने का लालू यादव भी नहीं समझते हैं.

अब बात मुद्दे की.. दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा की मांग एक भ्रामक प्रचार है. ये मुद्दा इसिलए उठाया जा रहा है क्योंकि केजरीवाल के चहेते मंत्री सत्येंद्र जैन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं. सीबीआई पूछताछ कर रही है. उन्हें पता है कि आज न कल इनकी पोल पट्टी खुलने वाली है. मीडिया में कहानियां आएगी. उससे पहले ही एक बवाल उठा दो ताकि ‘पढे-लिखे लोगों’ और आप के कार्यकर्ताओं को लगे कि मोदी सरकार उसके पीछे पड़ी है. काम करने नहीं दे रही है. केजरीवाल का मकसद साफ है वो दिल्ली में फिर ड्रामेबाजी कर के मीडिया की सुर्खियों में बने रहना चाहता है ताकि वो 2019 में महागठबंधन का हिस्सा बन सके. लेकिन परिस्थितियां बदल चुकी है. केजरीवाल सरकार की पूरी की पूरी कैबिनेट भ्रष्टाचार के मामले में फंसी हुई है. भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाने का केजरीवाल का मुंह नहीं रहा इसलिए ड्रामेबाजी का नया सुगूफा पूर्ण राज्य का दर्जा को चुना गया. जबकि हकीकत ये है कि दिल्ली को न तो पूर्ण राज्य का दर्जा दिया जा सकता है और न ही इसे पूर्ण राज्य का दर्जा देना चाहिए.

दिल्ली को पूर्ण राज्य को दर्जा मिलना चाहिए या नहीं, यह सवाल ही बेमानी है. क्योंकि यह मांग ही मूर्खतापूर्ण है. दुनिया के किसी भी संघीय प्रजातंत्र में देश की राजधानी पूर्ण राज्य नहीं होती है. यह संभव भी नहीं है. इसके कई कारण है. पहले समझते हैं कि पूर्ण राज्य का मतलब क्या है? पूर्ण राज्य का मतलब, दिल्ली के पूरे क्षेत्र पर दिल्ली सरकार का आधिपत्य होना है. जबकि संघीय व्यवस्था में राजधानी पर हर राज्य का अधिकार है. संविधान सभा में जब दिल्ली को राजधानी बनाने पर बहस हुई थी तब पूरी दुनिया के संघीय राष्ट्रों के मॉडल का तुलनात्मक विश्लेषण किया गया था. जिन देशों के मॉडल को प्राथमिकता दी गई, उनमें अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे बहुराज्यीनय देश शामिल थे. दुनिया में ऐसा कोई फेडेरल यानि संघीय ढांचा वाला देश नहीं हैं जहां पर केंद्र सरकार का राजधानी पर पूरा नियंत्रण न हो. दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाने के सबसे खिलाफ डा. भीमराव रामजी अंबेदकर थे. उन्होंने तो यहां तक कह दिया था कि यहां सरकार की भी जरूरत नहीं है. जहां तक बात संविधान और व्यवस्था की समझ की है तो केजरीवाल तो डा. अंबेदकर के पैरों की जूती भी नहीं है.

डा. अंबेदकर की दलीलें बिल्कुल साफ थी. दिल्ली में सत्ता के दो केंद्र नहीं हो सकते हैं. इसकी वजह ये है कि दिल्ली में संसद है, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, केंद्र की सरकार, सुप्रीम कोर्ट, राष्ट्रीय स्तर की अफसरशाही, तीनों सेना अध्यक्ष और सीएजी जैसे कई संस्थान हैं, जिनका महत्व और अधिकार किसी भी राज्य सरकार से ज्यादा है. इसके अलावा देश के महत्वपूर्ण सैन्य, अर्धसैन्य साथ ही खुफिया विभागों के मुख्यालय भी यहां हैं. हर राज्य का दिल्ली में ऑफिस है और भवन है. क्या इन संस्थानों को किसी राज्य सरकार के अधिकार-क्षेत्र में रखा जा सकता है? साथ ही दिल्ली में दुनियाभर के देशों के दूतावास और हाई कमीशन हैं, जिनका रिश्ता सिर्फ और सिर्फ केंद्र सरकार के साथ है. क्या वो दिल्ली की राज्य सरकार के अधिकार-क्षेत्र में काम करेंगे? ये कौन लोग हैं जो खुद को संविधान निर्माताओं से ज्यादा अक्लमंद समझने की जुर्रत कर रहे हैं. हकीकत ये है कि कई लोग केजरीवाल की धूर्तता को सच मानकर बैठे हैं. ये वैसे लोग हैं जिन्हें न तो संविधान की समझ है औऱ न ही संघीय व्यवस्था को जानते हैं. केजरीवाल के झांसे में जीने वाले ऐसे लोगों को कौन समझाए कि किसी एक दल को एक चुनाव में प्रचंड बहुमत मिलने का मतलब यह नहीं है कि संविधान के मूलतत्वों की ही तिलांजलि दे दी जाए.

देश का शासन और प्रशासन संविधान के अनुसार ही चलता आया है और चलता रहेगा. ये किसी बनिए की दुकान नहीं है, जिसमें कुछ भी मांगो तो पुड़िया में डाल कर दे दिया जाएगा. दिल्ली के लिए पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग करने वाले, उस पर राजनीति करने वाले, उस पर जनता को बहलाने और फुसलाने वाले और लुटियन-मीडिया की वो जमात जो इस पर सच्चाई पर पर्दा डालने का काम कर रही है, वो सब देश के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं. ऐसी किसी भी मांग को जायज नहीं ठहराया जा सकता है जो संविधान के प्रावधानों के खिलाफ है. इसके अलावा एक और सवाल है. यह सवाल पूर्ण राज्य का दर्जा देने के लिए देश में संवैधानिक प्रक्रिया को लेकर है. केजरीवाल ने दिल्ली के पूर्ण राज्य के संबंध में बिल भी पास करा लिया है. ये एक असंवैधानिक कदम है. केजरीवाल को भी पता है कि दिल्ली की विधानसभा के वोटिंग करा लेने से कुछ फर्क नहीं पड़ने वाला है. फिर भी उन्होंने ऐसा क्यों किया.

चुनाव में आप को प्रचंड बहुमत मिला था लेकिन इतना वक्त बीत जाने के बाद कहा जा सकता है कि केजरीवाल सरकार से शीला दीक्षित की सरकार लाख दर्जा बेहतर थी. केजरीवाल अपने वादे को निभाने में पूरी तरह से विफल रहे हैं इसलिए अब बहानेबाजी शुरू हो गई है. दिल्ली की जनता ने केजरीवाल को काफी उम्मीद के साथ चुना था लेकिन केजरीवाल तो झूठे वादे कर वोट ठगने में मायावती और लालू यादव से भी आगे निकल गया. दिल्ली की जनता को केजरीवाल की असलियत का पता चल चुका है. वो ठगा महसूस कर रही है. जनता केजरीवाल से तौबा कर चुकी है. ऐसे में केजरीवाल का कोई भी आंदोलन न तो सफल होगा और न ही इसमें जनता शामिल होगी. इसमें शामिल होने वाले वही होंगे जो आप-सरकार में मलाई काट रहे हैं या फिर केजरीवाल के वेतन-भोगी कार्यकर्ता हैं.

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