लद्दाख के वातावरण को बचाने का अनोखा प्रयास

स्थानीय लोगो के माल मवेशी पर हिंसक हमलों के कारण लोगो का तेंदुए पर गुस्सा बहुत अधिक था, ऐसे में क्षेत्र में विभिन्न पशुओं के नस्लों की रक्षा करना महत्वपूर्ण था। रात के समय पशुओं को रखने की जगह चारो ओर से तो सुरक्षित थी परंतु उपर से खुली होती थी। कारणवश स्नो लेपर्ड रात के समय में जानवरों पर हमला कर देता था और लोगो औरस्नोलेपर्ड के बीच संघर्ष का एक वातारण निरंतर रुप से बढ़ता ही जा रहा था।

सुजाता राघवन

उंची उंची पहाड़ियों और बर्फ की सफेद चादर से ढका हुआ लद्दाख सुंदर क्षेत्रों में से एक है। यहां की खूबसूरत वादियों में रहता है एक अद्भुत जानवर जिसे “स्नो लेपर्ड” के नाम से जाना जाता है। इसे “भूरे भूत” का नाम भी दिया गया है कारण है इसके पीले और गहरे रंग के फर का होना जिस कारण ये लद्दाख के बर्फ में यू सम्मिलित हो जाता है कि  पता ही नही चलता कि ये कब उपर से नीचे की सतह पर आता है और चला जाता है।

मालूम हो कि जल्दी हाथ न आने वाला स्नो लेपर्ड कभी- कभी देखने को मिलता है। स्थानीय चरवाह ज़ेवांग नोरबो शाम वैली के उले में हुई जानवरों के मुठभेड़ को याद करते हुए घबरा जाते हैं। कहते हैं कि “:( स्थानीय भाषा में शान) स्नो लेपर्ड ने मेरे तीन साल के डज़ो(गाय) को मार डाला। डज़ो यॉक गाय की एक नस्ल है जो लद्दाख में बड़े पैमाने पर पाया जाता है। गाय के अतिरिक्त भेड़, बकरियों को भी उनके उन, दूध और मांस के लिए पाला जाता है। परंतु स्नो लेपर्ड द्वारा इन पर आक्रमण करने से पालतू पशुओं की जान खतरे में है। कारणवश स्थानीय लोगो के मन में स्नोलेपर्ड के प्रति बदले की भावना पैदा हो रही है। उसे पकड़ने के लिए जाल बिछाते हैं और पत्थरों द्वारा उसे तब तक मारते हैं जबतक वो मर न जाए। वास्तव में मैं और मेरा परिवार स्नो लेपर्ड से नफरत करता था क्योंकि उसने हमारे जानवरों को मार दिया था। इसलिए हमें भी उसे मारना पड़ा , इसके अलावा कोई और रास्ता नही था। अब या तो वो जिंदा रहता या हम”।

लद्दाख में मानव और वन्य जीवों के बीच ये संघर्ष काफी लंबे समय से चला आ रहा है।  इसके मद्देनजर स्नो लेपर्ड के संरक्षण और लद्दाख के पर्यावरण को बचाने के लिए 2003 में रजिस्टर्ड संस्था स्नो लेपर्ड कंजरवेंसी इंडिया ट्रस्ट ने काम शुरु किया । जिसका उद्देश्य मानव और स्नो लेपर्ड के बीच के संघर्ष को कम करके एक स्वच्छ वातावरण स्थापित करना था।

प्राकृतिक रुप से स्नो लेपर्ड पहाड़ की उंचाईयों पर ही रहता है और वहां उपस्थित नीले भेड़ का शिकार करता है। लेकिन प्राकृतिक असंतुलन के कारण नीले भेड़ की कमी ने उसे नीचे आने पर मजबूर कर दिया और अब वो अपना पेट भरने के लिए आबादी वाले क्षेत्र में आकर लोगो के पशुओं पर हमला करता है। ऐसी स्थिति में पूरे पर्यावरणीय व्यवस्था को इस प्रकार बनाना था कि तंदुए को शिकार के लिए लोगो के बीच न जाना पड़े। इसी सोच ने SIT को जन्म दिया जिसने लगातार इस ओर प्रयास किए हैं।

स्थानीय लोगो के माल मवेशी पर हिंसक हमलों के कारण लोगो का तेंदुए पर गुस्सा बहुत अधिक था, ऐसे में क्षेत्र में विभिन्न पशुओं के नस्लों की रक्षा करना महत्वपूर्ण था। रात के समय पशुओं को रखने की जगह चारो ओर से तो सुरक्षित थी परंतु उपर से खुली होती थी। कारणवश स्नो लेपर्ड रात के समय में जानवरों पर हमला कर देता था और लोगो औरस्नोलेपर्ड के बीच संघर्ष का एक वातारण निरंतर रुप से बढ़ता ही जा रहा था।

इस समस्या के निदान के लिए SIT ने मवेशी को सुरक्षित रखने के लिए (PREADTOR ROOF) बनाया ताकि जानवर अंदर सुरक्षित रह सकें। और घोड़े जो चरवाह के नजरों से दूर हो जाते थे वो भी उनके आस पास रहें।

इसके बाद भी SIT ने यह महसूस किया कि अगर हम स्थानीय लोगो को सिर्फ ये बोलेंगे की स्नो लेपर्ड की रक्षा में अपना योगदान दे तो वो नही मानेंगे । इसलिए स्नो लेपर्ड से होने वाले नुकसान की भरपाई और स्नो लेपर्ड की महत्वपूर्णता को दूसरे रुप से बताने के लिए SIT ने लद्दाख के 40 गांव में “होम स्टे प्रग्राम” की शुरुआत की। जिसके अंतर्गत लद्दाख में आने वाले पर्यटक को गांव के घरो में ही रहने की व्यवस्था थी। क्योंकि ये पर्यटक खुद भी ग्रामीण परिवेश मे रहने में रुची रखते थे। इसलिए SIT ने ग्रामीणो को इसके लिए प्रशिक्षण देना शुरु किया ताकि पर्यटक को हर प्रकार की सुविधा ग्रामीणो के घर में मिले। इसके बदले पर्यटक परिवारों को भुगतान करते हैं। और ग्रामीणों की आमदनी का ये एक साधन बन गया है। इस योजना को बनाने के पीछे मुख्य उद्देश्य था कि पर्यटकों द्वारा स्नोलेपर्ड में रुची रखने के कारण ग्रामीणो को इस बात का अहसास हो कि स्नो लेपर्ड लद्दाख के परिवेश के लिए कितना महत्वपूर्ण है।

2002 में शुरु इस प्रोग्राम को The Mountain Institute and UNESCO, की ओर से सर्मथन प्राप्त हुआ। इस प्रोग्राम के कारण स्थानीय लोगो को माल मवेशी के अलावा जीविका का एक अन्य साधन मिल गया लेकिन उन्हे इस विकल्प के बदले ये निश्चय करना पड़ा कि अब चाहे तेंदुए उनके जानवरों को नुकसान पहुंचाए लेकिन वो स्नो लेपर्ड की रक्षा करेंगे ताकि लद्दाख के वातावरण में संतुलन बरकरार रहे। इसके अतिरिक्त होम स्टे प्रोग्राम के अंतर्गत प्राप्त होने वाली राशि का दस प्रतिशत वो लद्दाख मे चलने वाले environmental protection fund में देगें। गांव वालों को परंपरागत कपड़े और अन्य वस्तुएं बनाने का भी प्रशिक्षण दिया गया जिसे वो आने वाले पर्यटको को बेचते हैं। ये आमदनी का एक अन्य साधन साबित हुआ।

साथ- साथ युवाओं को गाईड के रुप में प्रशिक्षण देकर उन्हे इसका भार सौंपा गया क्योंकि वो अपने इलाके से भली- भांति परिचित होते हैं इसलिए थोड़े से प्रशिक्षण के बाद वो अच्छे गाईड बन जाते हैं। इस प्रकार युवाओं को भी रोजगार मिल जाता है। इस बारे मे SIT के डायरेक्टर Dr. TsewangNamgail बतातें हैं “ इस पूरे कार्यक्रम के कारण पर्यटक और स्थानीय लोगो को लद्दाख के प्राकृतिक परिवेश से जुड़ने का मौका मिलता है और प्रकृति के साथ वन्य जीवन को समझने का भी अवसर प्राप्त होता है। वो आगे कहते हैं साल 2015 में Temisgam village में रात के समय में स्नोलेपर्ड जानवरों के बीच आ गया और कई जानवरों को मार डाला। यह एक भयानक घटना तो थी परंतु हर बार की तरह इस बार लोगो ने उसे मारने की जगह तुरंत जम्मू कश्मीर के वाइल्ड लाइफ विभाग को सूचित कर स्नोलेपर्ड को ले जाने का आग्रह किया और उसकी जान बच गई। अपने अनुभव के बल पर वो कहते हैं कि हांलाकि अगर 15 साल पहले ऐसा होता तो ये बिल्कुल भी संभव नही था लेकिन अब स्थिति पहले से बदल गई है।

वास्तव मे लद्दाख में स्थिति पहले से बदल चुकी है । SIT  के प्रयासो के कारण मानव और स्नो लेपर्ड के बीच का तनाव काफी हद तक कम हुआ है। जिस कारण लद्दाख के वातावरण को संतुलित रखने में सहायता मिल रही है। और पर्यटकों को भी प्राकृतिक लद्दाख और इस क्षेत्र के विशेष स्नो लेपर्ड को देखने का अवसर मिल रहा है। (चरखा फीचर्स)

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