शशि थरूर की दृष्टि में रोज़गार का अर्थ

डा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

रोज़गार किसको कहा जाए – इसको लेकर एक नई बहस देश भर में छिड़ गई है । सोनिया कांग्रेस के एक दिग्गज शशि थरूर के इस मामले में कूद पड़ने से बहस और भी ज़्यादा तूल पकड़ गई है । इतना हल्ला सुनन्दा पुष्कर के मामले को लेकर नहीं हुआ था जितना एक आम आदमी द्वारा पकौड़े की दुकान से अपना रोज़गार चलाने को लेकर हो गया है । प्रसंग भाजपा के इस वायदे का था कि देश भर में रोज़गार के नए अवसर सृजित किए जाएँगे । किसी सम्वाददाता ने इसके वारे में प्रधानमंत्री से पूछा लिया कि कितने लोगों को रोज़गार मिला है ? भाव कुछ ऐसा था कि सरकार ने कितने लोगों को नौकरियाँ दी हैं ? प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रोज़गार और उसके अवसर सृजित होने की व्याख्या करते हुए कहा कि टैलीविजन स्टूडियो के सामने जिस व्यक्ति ने अपनी पकौड़े तलने वाली रेहडी लगा ली है , उसे भी रोज़गार में ही गिना जाएगा । रोज़गार की इस व्याख्या को लेकर सोनिया कांग्रेस ने बहुत सख़्त एतराज़ जताया । कांग्रेस के बुद्धिजीवियों के सरगना शशि थरूर इससे बहुत ही व्यथित हुए । उनके दूसरे साथी पी चिदम्बरम जो पूर्व में वित्त मंत्री भी रह चुके हैं का तो कहना है कि यदि रेहडी लगाना और उस पर पकौड़े तल कर बेचना रोज़गार है तब तो भिक्षा माँगना भी रोज़गार ही माना जाना चाहिए । ये दोनों सज्जन सोनिया गान्धी कांग्रेस के चिन्तन और विचार का प्रतिनिधित्व करते हैं , ऐसा माना जाता है । शशि थरूर रोज़गार की इस अवधारणा का  उपहास उड़ाते हैं । पकौड़े तल कर बेचना , उनकी दृष्टि में ऐसी तुच्छ चीज़ है जिसे रोज़गार तो किसी लिहाज़ से भी नहीं माना जा सकता । बहुत पहले जब उनसे किसी ने पूछा था कि जो यात्री हवाई जहाज़ की बिज़नेस क्लास में  सफ़र नहीं करते बल्कि एकोनिमी दर्जा में सफ़र करते हैं , उनको आप क्या कहेंगे । उन्होंने ऐसे यात्रियों को कैटल क्लास कहा था । यानि यह दर्जा तो पशुओं के दर्जे के बराबर है । जो लोग एकोनिमी दर्जा में सफ़र करते हैं वे पशु के समान हैं और पशुओं के लिए यही दर्जा उपयुक्त है । हवाई जहाज़ में सफ़र करने वाला आदमी , यदि वह पहली तीन सीटों पर नहीं बैठा है , शशि थरूर के लिहाज़ से पशु के समान है तो अपनी रेहडी पर पकौड़े तल कर बेचने वाले आदमी की उनकी दृष्टि में क्या औक़ात हो सकती है ? जब उस आदमी की ही औक़ात नहीं तो उस द्वारा किए जाने वाले काम को रोज़गार कैसे मान लिया जाए ? किसी भलेमानुस ने बैंक से दस हज़ार उधार लिए और अपनी रेहडी ख़रीद कर पकौड़े तलने लगा और अपने परिवार का पेट पालने लगा , इससे घटिया काम शशि थरूरों की दृष्टि में और कोई नहीं हो सकता । ध्यान रहे यहाँ शशि थरूर व्यक्ति वाचक संज्ञा नहीं है , बल्कि एक मानसिकता का नाम है , जो अपने जैसे अनेक लोगों के मानस को उघाड़ कर रख देती है । शशि थरूर ने खुले तौर पर अपने भीतर को नंगा कर दिया है , इसलिए पकड़े गए हैं । शेष इन जैसे अनेकों , पकौड़े तलने वाले आम आदमी को अपना रोज़गार चलाते देख कर हिक़ारत से नाकमुंह सिकोड़ लेते हैं और भाग कर साथ लगते किसी मैकडोनालड में घुस पर अपनी भूख और प्यास मिटाते हैं । मैकडोनालड में जो लड़का , वर्दी पहन पर उनकी प्लेटें उठा रहा होता है और सनैक्स तल रहा होता है , वह इन थरूरों की दृष्टि में रोज़गार में लगा हुआ है लेकिन उसी अन्दर वाले लड़के का दूसरा भाई बाहर मज़े से अपनी रेहडी पर पकौड़े तल रहा होता है , वह बेरोज़गार है । फ़र्क़ केवल इतना ही है कि अन्दर बाला नौकरी कर रहा होता है और बाहर वाला अपना मालिक ख़ुद है ।
अंग्रेज़ों ने लम्बे अरसे तक इस देश पर राज करने के बाद एक बात कुछ लोगों के दिमाग़ में घुसा दी है कि रोज़गार में वही है जो उनके शासन की नौकरी बजा रहा है । जो अंग्रेज़ों के शासन की नौकरी बजा रहा है वह एक प्रकार से उनकी सरकार का हिस्सा बन गया है । ज़ाहिर है जो उनकी शासन का हिस्सा बना है उसे सम्मान देना उनकी रणनीति का हिस्सा रहा था । जो उनकी सरकार का हिस्सा नहीं बना , उसे उन्होंने हिक़ारत की नज़र से देखा । शशि थरूर जैसे अनेकों प्राणी अभी तक मानसिक रूप से उसी विरासत को ढो रहे हैं । जो सरकारी कैंटीन में पकौड़े तल रहा है , वह रोज़गार में है और जो बाहर अपनी रेहडी पर पकौड़े तल कर बेच रहा है , वह केवल बेरोज़गार ही नहीं बल्कि थरूरों की हिक़ारत को भी झेलता है । थरूर को शायद पकौड़े तले जाने पर एतराज़ नहीं है , उनका असली एतराज़ है कि हल्दी राम के यहाँ जाकर पकौड़े तलो , केऐफई वालों के जाकर पकौड़े तलो , किसी बड़े नाम वाले होटल वाले की ताबेदारी में पकौड़े तलो । तुम्हारी इतनी हिम्मत की कि अपने मालिक ख़ुद बन रहे हो । ताबेदारी में रहना सीखो । नरेन्द्र मोदी देश के युवा को ताबेदारी से मुक्त कर उसे मालिक बनाना चाहते हैं । चिदम्बरमों और थरूरों को यही बात चुभती है । शताब्दियों की ग़ुलामी का असर जाते जाते भी वक़्त तो लेगा ही ।

यह अपनी अपनी समझ और दृष्टि का मामला है । एक व्यक्ति नौकरी छोड़ कर अपनी छोटी सी दुकान खोल लेता है तो थरूर जैसे लोगों की दृष्टि में वह बेकार हो गया है । उस पर तरस खाया जा सकता है । यदि वही व्यक्ति कल अपनी दुकान बन्द करके किसी बड़े माल में मालिक का वही सामना बेचना शुरु कर देता है , तो थरूरों के लिहाज़ से अब उसको रोज़गार मिल गया है । यह दृष्टि आत्म विश्वास की कमी से पैदा हुई है । इस दृष्टि में सड़कों पर खुले ढाबे कैटल क्लास के लिए हैं और इनका रोज़गार से क्या लेना देना ? यदि यही ढाबे वाला अपना ढाबा बन्द कर बग़ल में ही और किसी बड़े नाम से चल रहे होटल में पकौड़े तलने का काम शुरु कर देता है , तो वह रोज़गार में शामिल हो जाएगा । काम वह एक ही करता था । पहले वह अपने ढाबे में पकौडे तल रहा था और अब वह किसी दूसरे के ढाबे में पकौड़े तल रहा है । थरूर की दृष्टि में पहले वह दया का पात्र था और बेरोज़गार था लेकिन दूसरे के होटल में पकौड़े तल कर वह रोज़गार पा गया है
लेकिन एक और संभावना पर विचार करना भी ठीक रहेगा । यदि मोदी जी पकौड़े की जगह सनैक्स शब्द का प्रयोग कर लेते तो मामला बन सकता था । रेहडी की जगह भी अंग्रेज़ी का कोई भारी भरकम शब्द प्रयोग होना ही चाहिए था । हमारे देश में रोज़गार की परिभाषा , भाषा से भी जुड़ी हुई है ।  वाक्य कुछ इस प्रकार का होना चाहिए था – जो फ्रैश सनैक्स तैयार करके सप्लाई करता है , उसे भी रोज़गार सृजित हुआ है ,ऐसा माना जाना चाहिए । तब शशि थरूर उसे यक़ीनन रोज़गार स्वीकार कर लेते । वह भुनी हुई मक्की बेच रहा है या पौप कार्न बेच रहा है , इससे भी ज़मीन आसमान का फ़र्क़ पड़ जाता है । माल दोनों का एक ही होता है लेकिन बेचने की शैली अलग होती है । शशि थरूर शैली के दीवाने हैं , माल चाहे कितना भी बासी क्यों न हो । लेकिन उधर नरेन्द्र मोदी को शैली की चिन्ता नहीं है , माला  ताज़ा होना चाहिए । इसलिए मोदी के ताज़े माल को शशि थरूर रोज़गार नहीं मान सकते । उनके लिहाज़ से सुरक्षा परिषद में सचिव बन जाना ही रोज़गार है और न बन पाना बेरोज़गारी है । जो लोग अपनी मेहनत से , ईमानदारी से काम करते हैं , उसे थरूर जैसे लोग बेकार और तुच्छ मानते हैं । लेकिन दुर्भाग्य से शशि थरूर और पी चिदम्बरम की पार्टी केवल एक ही कौशल जानती है और वह कौशल है कोयले की खदानों के आवंटन की दलाली का । चारा घोटाले का , बोफ़ोर्स घोटाले का । जीपों का मूंदडा कांड तो कांग्रेसी शासन के शुरु में ही चल पड़ा था । उनकी दृष्टि में असली रोज़गार तो यही है । अब ऐसे लोग न तो रेहडी लगा कर आजीविका कमाने वाले को कैटल क्लास से ज़्यादा मानेंगे और न ही उसके इस काम को रोज़गार । उधर मोदी हैं कि वे चारा घोटाले वाला , कोयला खदानों के आवंटन की दलाली वाला रोज़गार ख़त्म करने पर आमादा हैं । मोदी के आने से मनसबदाकियां उखड़ रही हैं , दरबारों में से तीसहजारिए , बीसहजारिए , लखटकिया बेरोज़गार हो रहे हैं । इस एक कौशल के सिवा और कोई कौशल उन्हें आता नहीं है । शशि थरूरों को समझ लेना चाहिए जिनको वे कैटल क्लास समझते थे अब उन का युग आ गया है । अब उनके कौशल से रोज़गार सृजित होगा । उन्हीं की प्रतिष्ठा होगी ।
लेकिन शशि थरूर के मित्र और कांग्रेस के अर्थशास्त्री पी चिदम्बरम तो उनसे भी दो क़दम आगे जाते हैं । उनका कहना है कि यदि अपनी रेहडी पर पकौड़े तल कर बेचना भी रोज़गार की श्रेणी में आता है तब तो भिक्षा माँगना भी रोज़गार ही मानना चाहिए । वैसे तो चिदम्बरम कुछ सीमा तक सच ही बोल रहे हैं । चिदम्बरम की पार्टी ने पिछले सात दशकों में देश में इसी प्रकार का रोज़गार पैदा किया है । देश के युवा के आत्म विश्वास को खंडित किया है । वह स्वयं अपने बलबूते कुछ कर सकता है , यह भाव उसमें पैदा ही नहीं होने दिया । यही कारण है कि वह तमाम योग्यता होते हुए भी सरकारी /अर्ध सरकारी नौकरी पाने के लिए किसी न किसी राजनैतिक नेता के पीछे भागा रहता है । राजनेताओं के पीछे पंगु बन कर भागता देश का युवा ही कांग्रेस की असली ताक़त रही है । चिदम्बरम जानते थे कि यदि युवा ने भागना बन्द कर दिया और स्वयं अपने पैरों पर खड़े होने का प्रयास शुरु कर दिया तो उनकी पार्टी की ताक़त तो ख़त्म हो जाएगी । नरेन्द्र मोदी ने देश का खोया आत्म विश्वास लौटाने का ही प्रयास किया है । रोज़गार का मतलब केवल सरकारी नौकरी न हो कर अपने पैरों खड़ा हो पाने की क्षमता विकसित करना है । कौशल प्रशिक्षण इसी का नाम है । ताज़ा पकौड़े तल कर बेचना भी कोई कम जीवट का काम नहीं है । उसके लिए भी कौशल चाहिए । देश के परम्परागत काम धन्धों को आधुनिक तकनीक का लाभ देकर उसे बल प्रदान करना ही रोज़गार के क्षेत्र में स्वाबलम्वी बनाना है । यही शासन का सबसे बड़ा कौशल है । नरेन्द्र मोदी इसी दिशा में सक्रिय हैं । भारत के लोगों में अपने कौशल को आधुनिक तकनीक से जोड़कर युग के साथ चलने की समझ विद्यमान है । पंजाब के मालवा में जाकर देख लेना चाहिए के किसानों ने अपने छकडों पर ईंजन लगा कर उन्हें मारूति की जगह मारूता का नाम देकर सड़कों पर दौड़ा दिया है । देश दौड़ने लगा है । एक दिन ये पकौड़े वाले ही चिदम्बरमों की गर्दन पकड़ लेंगे । पकौड़ा प्रतीक है । शशि थरूर और चिदम्बरम भी इसे अच्छी तरह जानते हैं लेकिन जानबूझकर कर देश को भ्रमित करने और कांग्रेस की गर्दन छुड़ाने का प्रयास कर रहे हैं ।

3 thoughts on “शशि थरूर की दृष्टि में रोज़गार का अर्थ

  1. तथाकथित स्वतंत्रता के आरम्भ से ही १८८५ में जन्मी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस द्वारा रचाए भीड़-तंत्र जिसे दशकों सत्ता में बनाए रखने की एक मात्र युक्ति भ्रष्टाचार रहा हो, उस राजनैतिक दल का कोई पक्षपाती आज क्योंकर रोजगार की बात करे? जिस कृषिप्रधान विशाल क्षेत्र को फिरंगियों ने राजे-रजवाड़ों के माध्यम से अधिकृत किये रखा था, कांग्रेस ने स्वतंत्रता उपरान्त उन राजे-रजवाड़ों की रियासतों का एकीकरण कर इंडिया में अंग्रेजी भाषा के व्यापक माध्यम से बहुसंख्यक हिन्दुओं को न केवल उन्हें उनकी मूल भाषा द्वारा बांटे रखा बल्कि उनमें जाति भेद द्वारा एक दूसरे के प्रति संशय भय व क्रोध उत्पन्न कर उन्हें कभी एक भारत, एक जनसमूह बन संगठित नहीं होने दिया| क्यों? क्योंकि अन्य आवश्यकताओं व उपलब्धियों के अभाव में रोजगार का प्रश्न इन कांग्रेसियों का जीना ही दूभर न कर दे| मेरी मानो तो भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के स्नातक और कांग्रेस राज के अन्य कमाऊ पूत यदि भारत छोड़ विदेशों में न जा बसे होते तो कोई अचम्भा नहीं कि पापी पेट के लिए आज उनमें कई सड़क के किनारे पकोड़े बनाने जैसे रोजगार में लगे होते! कहो अयंगर जी, छाज तो बोले, छलनी क्यों बोले जिसमें छत्तीस सौ छेद हैं?

  2. एक शशि थरूर से काँपकर ऐसा लेख लिखा है आपने. तथ्थ से ज्यादा व्यक्तिगत आक्षेपों का लेख लगा.

    1. अयंगर जी, जीवन इतना दूभर कैसे हो गया कि बुढ़ापे में निराशा का चोला पहने हो? बिना वितर्क लेखक के लिए ऐसा लिखते यदि आपके हाथ नहीं कांपे तो सोचता हूँ कांग्रेस राज में पले बढे होने से कहीं आज आप स्टॉकहोम सिंड्रोम से पीड़ित तो नहीं हैं? मुझे आपसे पूरी सहानुभूति बनी रहेगी क्योंकि मैं सोचता हूँ कि प्रयत्न कर सोच समझ कभी तो आप अच्छा लिख पाएंगे!

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