विश्व मंचों पर सम्मानित होते मोदी और उनकी नीतियां

राकेश कुमार आर्य
 संभवत:  यह पहली बार है जब हमारे देश के प्रधानमंत्री को दूसरे देश अपना सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार देने मेंस्वयं को गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं। अलग – अलग देश यह अवसर ले लेना चाहते हैं कि श्री मोदी उनके देश के इस सर्वोच्च अलंकरण को प्राप्त करें । वास्तव में यह मोदी की उपलब्धि नहीं है , अपितु भारत के प्रधानमंत्री की उपलब्धि है । जिस पर भारत को भी गौरवान्वित होना चाहिए । अभी कुछ ही समय पहले की बात है जब देश को इतना अधिक सम्मान विदेशों में नहीं मिलता था और हमारा ही पड़ोसी देश हमारे ही प्रधानमंत्री को ‘ देहाती महिला’  कहकर संबोधित करता था। हमें यह भी स्वीकार करना चाहिए कि देश के पहले प्रधानमंत्री रहे पंडित जवाहरलाल नेहरू और उसके पश्चात उनकी बेटी श्रीमती इंदिरा गांधी ने भी अपने प्रधानमंत्री  काल में कई ऐसे गौरवान्वित करने वाले कार्य किए थे जिनसे उन्हें भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला था , वह भी उनका व्यक्तिगत सम्मान नहीं था ,अपितु उस समय किया गया हमारे देश का सम्मान था  , जिसके लिए वह भी अभिनंदन के पात्र हैं।  परंतु यह मानना पड़ेगा कि उन्हें इतना अधिक सम्मान वैश्विक मंचों पर नहीं मिला जितना इस समय प्रधानमंत्री श्री मोदी प्राप्त कर रहे हैं। अभी हमारे देश के प्रधानमंत्री श्री मोदी को संयुक्त अरब अमीरात और रूस ने अपने देश का सर्वोच्च नागरिक अलंकरण देकर सम्मानित किया है , जो हमारे सब के लिए गर्व और गौरव का विषय है।इससे पूर्व प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी का चयन ‘सियोल शांति पुरस्कार 2018’ के लिए किया गया था ।  यह सम्मान उन्हें वैश्विक आर्थिक प्रगति, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और भारत के लोगों के मानवीय विकास को तेज करने की प्रतिबद्धता व सामाजिक एकीकरण के माध्यम से लोकतंत्र के विकास के लिए प्रदान किया जा गया था ।

सियोल पीस प्राइज कल्चरल फाउंडेशन के आधिकारिक वक्तव्य में कहा गया था कि सामाजिक विषमताओं की खाई को पाटने में नरेंद्र मोदी की नीतियों के महत्व को संस्था स्वीकार करती है। संस्था का यह कथन इस बात की ओर संकेत करता है कि श्री मोदी ने अपने कार्यकाल में जो जन कल्याण की योजनाएं प्रारंभ की हैं वह यथार्थ के धरातल पर सफल सिध्द हुईं , और इसके सफल परिणाम संसार के समस्त बुद्धिजीवियों , सामाजिक संगठनों और देशों को दिखाई दे रहे हैं।  यह तब है कि जब हमारे देश के विपक्षी नेता प्रधानमंत्री श्री मोदी को लोकतंत्र विरोधी  और जनता के मौलिक अधिकारों का हनन करने वाला, असहिष्णु आदि विशेषणों से संबोधित करते रहे हैं और उनके जनोपयोगी निर्णयों को भी अलोकतांत्रिक सिद्ध करने का प्रयास करते रहे हैं। सियोल शांति पुरस्कार प्रत्येक दो वर्ष के अंतराल पर ऐसे व्यक्तियों को दिया जाता है जो मानवता के कल्याण के लिए प्रयासरत हों तथा विश्व शांति के लिए अपना योगदान दे रहे हों । बात स्पष्ट है कि  विदेशों को  यह  लग रहा है कि प्रधानमंत्री श्री मोदी मानवतावाद के समर्थक हैं और उनकी नीतियां जनहितकारी व  वसुधैव कुटुंबकम की भारत की उत्कृष्ट भावना को समर्पित हैं। जिन्हें अपनाकर  विश्व शांति का सपना साकार किया जा सकता है।

दूसरी ओर भारत के ही विपक्षी नेता हैं जो यह कह रहे हैं कि नरेंद्र मोदी की नीतियों  से देश में आग लग रही है और बहुत संभव है कि मोदी 2024 तक यदि भारत के प्रधानमंत्री रहे तो उनके लोकतंत्र विरोधी होने के कारण भारत में चुनाव ही नहीं होंगे ।सियोल शांति पुरस्कार को प्राप्त करने की होड़ में 1,300 से अधिक दावेदार थे, किंतु चयन समिति ने नरेंद्र मोदी के नाम पर मुहर लगाई। यह कहना गलत नहीं होगा कि यह सम्मान नरेंद्र मोदी की विकास नीति पर एक वैश्विक मुहर है। सियोल पीस प्राइज कल्चरल संस्थान ने जिन बिंदुओं को आधार मानकर श्री मोदी को यह पुरस्कार दिया यदि हम उसके आधार पर उन्हें समझने का प्रयास करें तो स्थिति और भी स्पष्ट हो सकेगी। सबसे पहले हम नरेंद्र मोदी सरकार की उन योजनाओं पर निष्पक्षता पूर्वक दृष्टिपात करें जिन्हें भारत के लोगों के मानवीय विकास को आगे बढ़ाने की दिशा में सफल प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। इस तथ्य की समीक्षा करने हेतु हम तीन योजनाओं पर  अपना ध्यान विशेष रूप से केंद्रित करें।  

पहली योजना है –, जन धन योजना। मोदी सरकार की यह योजना सबसे प्रभावी योजनाओं में से एक है। इस योजना के द्वारा सरकार ने अंतिम पंक्ति में खड़े लोगों को बैंकिंग प्रणाली से जोड़ा , जिसका अनुकूल प्रभाव भारत के अर्थतंत्र पर भी पड़ा। यह योजना कुछ लोगों को बैंकिंग सेक्टर से जोड़ने के लिए आरम्भ नहीं की गई, इसके पीछे सरकार का बड़ा उद्देश्य भ्रष्टाचार को रोकना तथा सरकारी योजनाओं का लाभ सीधे लाभार्थी के खाते तक पहुंचाना था। अगस्त 2014 में आरम्भ हुई इस योजना के अंतर्गत सितंबर 2018 तक खाताधारकों की संख्या 32.61 करोड़ हो गई थी । इसका प्रत्यक्ष लाभ यह हुआ कि सरकार और लाभार्थी के बीच में सीधा आदान प्रदान होने से पारदर्शिता को प्रोत्साहन मिला है। सरकार सब्सिडी की रकम, किसानों का मुआवजा, मनरेगा की मजदूरी, आवास, शौचालय निर्माण आदि की रकम सीधे लाभार्थी के खाते में हस्तगत कर रही है।दूसरी योजना, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना की हम बात करें तो इससे महिलाओं के जीवन स्तर को नई दिशा मिली है। इस योजना के अंतर्गत सरकार ने निर्धन महिलाओं को धुएं से उत्पन्न होने वाले सभी रोगों से मुक्ति दिलाने का बीड़ा उठाया और उन्हें निशुल्क गैस सिलिंडर देना आरम्भ किया। इस योजना का क्रियान्वयन इतने प्रभावी ढंग से हुआ कि यह योजना निर्धारित समय से पहले ही अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की ओर अग्रसर है। मई 2016 में आरम्भ हुई इस योजना के माध्यम से सरकार ने अब तक 5.70 करोड़ से अधिक महिलाओं को निशुल्क गैस सिलिंडर प्रदान किया है। इसी तरह स्वच्छ भारत अभियान ने भी  वैश्विक स्तर पर ख्याति अर्जित की है।सरकार ने इस योजना के द्वारा लोगों को स्वच्छता अपनाने का आग्रह किया तथा खुले में शौच से मुक्ति दिलाने के लिए हर घर में शौचालय के निर्माण के लिए के लिए पहल की, जिसके सार्थक परिणाम हमारे सामने आ रहे हैं। यह मोदी की ही सोच है जिसकी चर्चा आज वैश्विक स्तर पर हो रही है। भारत में कुछ समय पहले तक लोग पन्नियों या डॉने आदि को  ऐसे ही फेंक देते थे, सिगरेट पीने वाले सिगरेट के बचे हुए अंश को कहीं भी डाल देते थे , परंतु अब लोग कूड़ेदान की ओर  जाते देखे जाते हैं और उसी में चीजों को डाल कर प्रसन्न होते हैं।जिससे पता चलता है कि लोगों ने प्रधानमंत्री की सोच को न केवल सम्मान दिया है,अपितु उसे अपनाया भी है ।उक्त संस्था ने मोदी की आर्थिक नीतियों की भी प्रंशसा की थी,  जिसमें नोटबंदी भी सम्मिलित थी। विडंबना देखिए कि भारत में कुछ कथित बौद्धिक वर्ग और राजनीतिक दल जिन नीतियों को लेकर नरेंद्र मोदी पर प्रश्न उठाते रहते हैं और विरोध के अवसरों की खोज में रहते हैं, विश्व समुदाय उसे दूरदर्शी बताते हुए सराहना करता दिखाई देता है।पिछले कुछ समय से देश में बलात  यह परिवेश बनाने का प्रयास हो रहा है कि नरेंद्र मोदी लोकतंत्र विरोधी हैं तथा उनकी सरकार की नीतियां देश के अहित में हैं। उनकी आर्थिक नीतियों विशेष रूप से जीएसटी और नोटबंदी की भारी आलोचना एक विशेष बौद्धिक वर्ग करता रहा है।

वहीं दूसरी ओर मोदी की आर्थिक नीतियों की कई वैश्विक संस्थाओं ने सराहना की है तथा उन नीतियों को भारत के लिए श्रेष्ठ आर्थिक नीति बताया है। कुछ समय पूर्व वर्ल्ड इकोनॉमी फोरम ने प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्थाओं की एक सूची तैयार की थी जिसमें भारत की रैंकिंग में पांच अंकों का सुधार हुआ है। 2018 में भारत ने इस सूची में 58वां स्थान प्राप्त किया था । फोरम का यह भी कहना है कि जी-20 देशों की बात करें तो पिछले वर्ष की तुलना में भारत की स्थिति में सबसे अधिक सुधार हुआ है।आइएमएफ की ओर से जारी रिपोर्ट में भी  भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर सकारात्मक संकेत दिए गए हैं। आइएमएफ के अनुसार 2018-19 में भारत की विकास दर 7.3 प्रतिशत रहने का अनुमान जताया गया है। ऐसे ही कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने नरेंद्र मोदी की नीतियों की प्रशंसा की है। यह भारत के लिए गौरव की बात है कि प्रधानमंत्री विश्व के देशों के साथ मिल कर आगे बढ़ रहे हैं । जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की साख सुदृढ़ हुई है।नरेंद्र मोदी ने विश्व के हर मंच से अपनी सोच से विश्व को प्रभावित किया है। आतंकवाद के विषय में वैश्विक सहमति बनाने में उनकी भूमिका की बात करें या ऊर्जा, जलवायु, पर्यावरण तथा साइबर सुरक्षा को लेकर सकारात्मक प्रयासों की, उन्होंने अपनी नीतियों से विश्व समुदाय का ध्यान भारत की ओर आकृष्ट किया है।अभी कुछ दिनों पहले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संयुक्त राष्ट्र का सर्वोच्च पर्यावरण पुरस्कार ‘चैंपियन ऑफ द अर्थ’ से सम्मानित किया गया था। यह पुरस्कार भी प्रधानमंत्री श्री मोदी को  उनके उत्कृष्ट चिंतन  और विश्व  को वास्तव में शांति का धाम बनाने  के उनके चिंतन के  आधार पर ही दिया गया था ।अब संयुक्त अरब अमीरात और रूस ने भी प्रधानमंत्री श्री मोदी की नीतियों से प्रभावित होकर उन्हें अपने देश का सर्वोच्च नागरिक अलंकरण दिया है तो वह भी श्री मोदी के वैश्विक नेता होने का एक प्रमाण है ।  एक और भी संकेत मिलता है विश्व नेता अभी यह मान रहे हैं कि उन्हें प्रधानमंत्री श्री मोदी के साथ एक और पारी खेलनी है अर्थात वह यह माने बैठे हैं कि 2019 का चुनाव प्रधान मंत्री श्री मोदी के नाम होने वाला है। हमारे देश के लोग इस पर क्या सोचते हैं और इस पर उनकी क्या मान्यता है ? – यह तो 23 मई को पता चलेगा , परंतु इस समय चुनाव का दौर चल रहा है तो बहुत ही सोच-समझकर निर्णय लेने की आवश्यकता है।

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