चन्द्र का प्रतिविम्ब !

चन्द्र का प्रतिविम्ब,

ज्यों जल झिलमिलाए;

पुरुष का प्रतिफलन,

प्राणों प्रष्फुराए !

विकृति आकृति शशि की,

जल-तल भासती कब;

सतह हलचल चित्र,

सुस्थिर राखती कहँ !

गगन वायु अग्नि जल थल,

थिरकते सब;

द्रष्टि दृष्टा चित्त पल-पल,

विचरते भव !

फलक हर उसकी झलक,

क्षण क्षण सुहाए;

देख पाए सोंप जो हैं,

अहं पाए !

महत में सत्ता डुबाए,

बृह्म भाए;

‘मधु’ के प्रभु अहर्निश,

हर हिय सुहाए !

रचयिता: गोपाल बघेल ‘मधु

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