केजरीवाल महोदय के निःशुल्क बिजली-पानी का गणित

 

इस लेख में कुछ सरल गणित की सहायता से केजरीवाल महोदय के द्वारा देहली में निःशुल्क या अल्पमूल्य पर बिजली-पानी दिए जाने के आश्वासन का विश्लेषण किया जा रहा है ।

 

औसत-आधारित दृष्टिकोण

मान लीजिए, केजरीवाल जी के आश्वासन के अनुसार देहली के प्रत्येक घर में औसतन २००० रूपये मासिक व्यय न्यून हो जाती है । वस्तुतः यह औसतन सङ्ख्या २००० रूपये है या इससे न्यून या अधिक, इस से यहाँ दिए जा रहा तर्क प्रभावित नहीं होता है ।

 

२,००० रूपये मासिक => २४,००० रूपये वार्षिक => १,२०,००० रूपये पाँच वर्ष में कुल औसतन बचत ।

 

अतः केजरीवाल जी के आश्वासन का अर्थ हुआ वर्तमान देहली सर्वकार के पाँच वर्ष के कार्यकाल में औसतन प्रति घर को १ लक्ष २० सहस्र (१ लाख बीस हजार) रूपये का लाभ ।

 

इसी के समान दूसरा (काल्पनिक) आश्वासन

मान लीजिए कि अभी देहली चुनाव हुए नहीं हैं, होने वाले हैं । और केजरीवाल महोदय के समान ही एक काल्पनिक “हमारी तुम्हारी पार्टी (हतुपा)” का नेतृत्व कर रहे श्रीमान “रीजकेवाल” एक चुनाव सभा को सम्बोधित कर रहे हैं । रीजकेवाल जी देहली की प्रजा को आश्वासन देते हुए यह घोषित करते हैं कि यदि हतुपा की सर्वकार बनी, तो एक मास की अवधि के अन्दर ही सभी घरों को १ लक्ष २० सहस्र रूपये उपायन (ईनाम) के रूप में दिए जाएँगे ।

 

ध्यान दीजिए, केजरीवाल महोदय और रीजकेवाल महोदय के आश्वासन गणित की दृष्टि से मूलतः समान हैं, क्यूँकि दोनों के ही अन्तर्गत प्रति घर औसतन १ लक्ष २० सहस्र रूपये का लाभ होता है ।

 

आगे, इन दोनों मूलतः समान विकल्पों की सूक्ष्मता से तुलना करते हैं ।

 

केजरीवाल जी और रीजकेवाल जी के उपायनों की तुलना

१. मूलतः समान इन दोनों विकल्पों में मुख्य भेद मनोवैज्ञानिक ही प्रतीत होता है ।

२. केजरीवाल जी का आश्वासन उन्हें विजयी करवा गया । रीजकेवाल जी के आश्वासन का प्रायः सभी राजनैतिक दल जम कर विरोध करते । प्रायः इसे “खुलेआम भ्रष्टाचार” की सञ्ज्ञा दी जाती । प्रायः चुनाव आयोग इसे अवैध घोषित कर देती ??

३. फिर भी, यदि मेरे पास दोनों विकल्प होते, तो मैं निश्चित रूप से रीजकेवाल जी का विकल्प ही चुनता । क्यूँकि इसमें मैं १ लक्ष २० सहस्र के उपायन का प्रयोग कैसे करना है, यह चुनने के लिए स्वतन्त्र हूँ । इस उपायन का प्रयोग केवल बिजली-पानी के शुल्क-पूर्ति के प्रति ही हो, ऐसा मुझ पर थोपा नहीं गया है । दूसरा, प्रति मास २००० रूपए नहीं, अपितु एक साथ १,२०,००० रूपए मुझे यदि मिलें, तो इस धन का निवेश कैसे करना है, इसे कैसे बढ़ाना है, यह चुनने के लिए भी मैं रीजकेवाल जी के विकल्प में स्वतन्त्र हूँ ।

 

औसत ने छिपायी असलीयत

कोई भी गणितज्ञ जानता है कि केवल औसत को ही देखने से समस्या के अनेक पहलू छादित (छिपे हुए) रह जाते हैं । ऊपर दिए हुए तर्क में हमने औसत का सहारा तर्क को सरलतापूर्वक समझने मात्र के लिए ही लिया है । अब आगे, कुछ और सत्य को आच्छादित करते हैं ।

 

औसतन २००० रूपये मासिक प्रति घर मिलने का अर्थ है कि वास्तव में कुछ घरों के द्वारा उपायन रूपी धन राशि २००० रूपयों से न्यून प्राप्त होगी, और कुछ घरों के द्वारा २००० रूपये से अधिक । सरल उदाहरण ले कर देखिए । २ और ४ का औसत होता है ३, जो कि २ और ४ के मध्य में ही है । औसत एक “मध्य” की ही सङ्ख्या होती है ।

 

जिनका बिजली-पानी का शुल्क पहले ही अल्प आता था, उसका लाभ भी अल्प भी होगा । जिनका अधिक आता था, उनका लाभ भी अधिक होगा ।

 

जैसे, जो निर्धन है, और जिसके घर १२ घण्टे ही प्रतिदिन बिजली आती है, उसका लाभ प्रति मास २००० रूपये से बहुत अल्प ही होगा । जो धनी है, जिसके घर ग्रीष्म में ४ वातानुकूल और शैत्य में ४ उष्णीकरणी (हीटर) चलते हैं, जिसका बिजली का शुल्क प्रति मास १०००० रूपए आता है, उसका लाभ भी उतना ही अधिक होगा ।

 

अतः, केजरीवाल जी के आश्वासन के अनुसार, सभी को कुछ धन की प्राप्ति तो अवश्य होगी, परन्तु निर्धन को अल्प धन की प्राप्ति होगी, व धनी को बहुत अधिक धन की प्राप्ति होगी । इससे निर्धन और धनी के मध्य का आर्थिक अन्तर और भी अधिक हो जाएगा । धनी की तुलना में निर्धन पहले से भी अधिक निर्धन हो जाएगा । तो आप ही बताइए, कि केजरीवाल जी निर्धनों के मसीहा हैं, या धनिकों के?

 

कुल मिला कर

१. जो जितना निर्धन, उसे उतना ही अल्प धन प्राप्त होगा ।

२. जो जितना धनी, उसे उतना ही अधिक धन प्राप्त होगा ।

३. राज्यकोष में बहुत दीर्घ छिद्र उत्पन्न होगा । कैसे? देहली की जनसङ्ख्या, मान लीजिए १ कोटि । मान लीजिए, प्रति घर ४ सदस्य, अतः २५ लक्ष घर । इसके मायने हुए, प्रति वर्ष २५,००,००० २४,००० = ६,००० कोटि का धन राज्यकोष से बाटा गया ! कहाँ से लाएँगे केजरीवाल जी इतना धन ? प्रायः, विकास कार्य रोक कर ही न ? वृक्ष पर तो धन लटकता नहीं है !

 

केजरीवाल जी क्या इस गणित से अनभिज्ञ हैं ?

हमारे देहली के भोले भाले भाई बहन प्रायः उन की झोली में आए अल्प धन से ही सुखी होकर उपर प्रस्तुत गणित आधारित तर्क को नहीं समझ पाए, परन्तु भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आई.आई.टी.) के छात्र रह चुके केजरीवाल जी भी इसे न समझ पाए हों, यह मानना कठिन है । तो क्या यह कहा जा सकता है, कि केजरीवाल जी ने देहली की प्रजा की भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया है ? मानता हूँ, पिछले २ वाक्य पूर्णतः तथ्य नहीं कहे जा सकते, क्यूँकि ये लेखक की प्रतीति पर आधारित हैं ।

 

आआप और हतुपा, दोनों से उत्तम विकल्प

यदि विकास को रोकना ही है, तो मैं कहूँगा कि देहली में सर्वकार ही न हो । आरक्षक (पुलिस), चिकित्सालय, न्यायालय आदि के प्रचलन के लिए जितने धन की आवश्यकता हो, केवल वही कर के रूप में प्रजा से लिया जाए । परन्तु, विधायकों की क्या आवश्यकता है ? आखिर केजरीवाल जी आदि नेताओं को भी तो वेतन देहली के लोगों के द्वारा दिए जा रहे कर से ही उपलब्ध हो रहा है ! क्यूँ न, कर को ही अल्प कर के, सर्वकार की ही छुट्टि कर दी जाए ? मेरे मत में, यह विकल्प केजरीवाल जी और रीजकेवाल जी, दोनों के आश्वासनों की तुलना में उत्तम होगा !

 

विशेष

लेखक की राजनीति में रुचि अल्प ही है, फिर भी लेख में प्रस्तुत रोचक “गणित” से उत्सुक होकर यह लेख लिखा गया है, और यह प्रयत्न किया गया है कि सत्य का उद्घाटन हो । यदि यहाँ दिए गए तर्क में कोई त्रुटि है, तो यह लेखक प्रार्थना करता है कि तर्क की त्रुटि दर्शाई जाए, लेखक उद्घाटित मन से सभी पाठकों की टिप्पणियाँ पढ़ने के लिए उत्सुक है ।

 

 

4 thoughts on “केजरीवाल महोदय के निःशुल्क बिजली-पानी का गणित

  1. प्रिय मानव–
    वाह!
    बहुत सुन्दर ढंग से प्रस्तुति की है।
    व्यङ्ग्यात्मक विश्लेषण से दबा हुआ सत्य उजागर हो गया है।
    सहानीय शैली भी है।
    अनेक शुभेच्छाएँ।
    लिखते रहिए।
    मधुसूदन

    1. माननीय मधु जी,

      आपके ये प्रेम भरे पारितोषिक तुल्य शब्द मेरे लिए अक्षया प्रेरणा के स्रोत हैं ! टिप्पणी के लिए आभार !

      भवदीय मानव ।

  2. आदरणीय,
    मानव जी
    सारे तर्क, प्रयास मैं जहाॅ तक समझता हूॅ राष्ट्रहित से ही जाकर जुडना चाहिये। आपके लेख का केन्द्रिय भाव राष्ट्रहित से जाकर जुडता है। अध्ययन करते वक्त हमने इतिहास के पन्नो में पढा था। जब भी कोई राजा सत्ता प्राप्त करता था, तो उसका पहला प्रयास राजकोष को समृद्ध करना होता था और अब जब राजनेता सत्ता के शिर्ष पर पहॅुचता है तो उसका पहला प्रयास राजकोष को लुटाकर सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करना होता है। शायद यही फर्क नरेन्द्र मोदी और केजरीवाल के अन्र्तगत है। देश को विकास के लिये पैसा चाहिये और यह कहाॅ से आयेगा इसका उत्तर किसी राजनेता के पास नही है। उदाहरण के साथ सुन्दर आलेख के लिये आपको बधाई!
    आपका
    अरविन्द

    1. माननीय अरविन्द जी,

      आपने मेरे राष्ट्रप्रेम को पहचाना और उसे अपने शब्दों में स्पष्ट लिखा, यह मेरे लिए बहुत बड़ा पुरस्कार है । इसके लिए मैं आपका आभारी रहूँगा ।

      केजरीवाल जी के किए को मैं बहुत गम्भीरता से लेता हूँ । जिसे आपने सस्ती लोकप्रियता की सञ्ज्ञा दी है, उसका दुष्प्रभाव बहुत गभीर दिखाई देता है । क्यूँकि उन्होंने लोगों के मन में लोभ / लालच भर दिया है । जिससे समाज का बड़े पैमाने पर नैतिक पतन हुआ है । केवल देहली में ही नहीं, देहली के बाहर भी आम आदमी यह पूछने लगा है, कि अमुक सरकार के आने से ’मुझे’ क्या मिलेगा । यदि देश की सारी प्रजा केवल यही सोच कर वोट देने जाएगी, तो इस नैतिक पतन को देश के पूर्ण पतन में परिवर्तित होने में समय नहीं लगेगा । ऐसा मेरा मत है ।

      लेख पर टिप्पणी के लिए आपको एक बार पुनः धन्यवाद ।

      भवदीय मानव ।

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