संभावनाओं को पंख लगाती नई शिक्षा नीति

भारत दुनिया का सबसे बडा युवा जनशक्ति वाला देश हैं, जहाँ युवाओं में अपार संभावनाएं अंतर्निहित हैं। जैसा की स्वामी विवेकानंद कहते थे युवाओं में अंतर्निहित संभावनाओं का प्रकटीकरण ही शिक्षा का मूल उद्देश्य होना चाहिए। इस दृष्टि से नई शिक्षा नीति मील का पत्थर साबित होती दिख रही है। पिछली शिक्षा नीतियों में जहाँ सभी तक शिक्षा को पहुंचाने पर जोर दिया गया था, वहीं नई शिक्षा नीति में एक ऐसी शिक्षा को सर्वसुलभ बनाने की बात की गई है जो व्यवहारिक, हुनर आधारित, रोजगारपरक एवं व्यक्तित्व विकास में सहायक हो। चूंकि बच्चों के मस्तिष्क के 85 प्रतिशत हिस्से का विकास 6 वर्ष की अवस्था से पहले ही हो जाता है, अतः नई शिक्षा नीति में बच्चों के पोषण संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करते हुए 3 वर्ष की उम्र से ही स्कूली शिक्षा प्रदान किये जाने का प्रावधान रखा गया है । कक्षा 6 से प्रत्येक छात्र को व्यवसायिक शिक्षा प्रदान की जाएगी। प्रत्येक शैक्षणिक सत्र के 10 दिन बिना बैग के स्कूल दिन होंगे जिस दौरान छात्र विशेषज्ञों से बिजली का काम, बढईगीरी, कुम्हारी, धातु का काम, राजमिस्त्री, बागबानी, सिलाई-कढाई, कुकिंग-कैटरिंग आदि जैसे कौशल विकास से संबंधित व्यवसायों का प्रशिक्षण लेंगे। इसमें इंटर्नशिप भी शामिल होगी जिससे कि छात्र किसी औद्योगिक संस्था में जाकर प्रशिक्षण ले सकें। कोशिश यह होगी कि जब छात्र 12 वीं पास करके निकले तो उसके पास एक स्किल हो जो उसकी आजीविका का आधार बने। नई शिक्षा नीति छात्रों को सिखने, जानने और पढने के ज्यादा अवसर प्रदान करती है। परम्परागत शिक्षा प्रणाली की भांति यह शिक्षा को केवल कुछ विषयों एवं तथ्यों तक सीमित नहीं रखती। नई शिक्षा नीति में स्कूलों के पाठ्यक्रम में विज्ञान और गणित के अलावा बुनियादी कला, शिल्प, मानविकी, खेल और फिटनेस, भाषा और साहित्य का भी समावेश किया जाएगा। कोई भी छात्र दशवीं- बारहवीं बोर्ड और ग्रेजुएशन में विज्ञान के साथ-साथ कला, संगीत तथा सामाजिक विज्ञान के विषयों को भी चुन सकता है। 2040 तक सभी उच्च शिक्षा संस्थानों को सभी विषय पढाने होंगे। शिक्षण का तरीका भी चाक, डस्टर और ब्लैक बोर्ड तक सीमित नहीं होगा बल्कि प्रयोगात्मक, खोजपरक, एक्टिविटी बेस्ड और इंटरेक्टिव लर्निंग आधारित होगा। यदि किसी छात्र का मन किसी कोर्स में नहीं लगता तो वह कोर्स को बीच में ही छोड़ सकता है लेकिन उसकी मेहनत बेकार नहीं होगी उसे सार्टिफिकेट या डिप्लोमा आवश्य मिलेगा जिसका लाभ अन्य कोर्स में एडमिशन लेने पर उसे क्रेडिट के रूप में मिलेगा। इसके लिए एकेडमी बैंक आफ क्रेडिट का निर्माण किया जाएगा जिसमें छात्रों के परफॉर्मेंस का डिजिटल रिकार्ड रखा जाएगा। भारत में ग्रामीण प्रतिभा के समक्ष एक बडी बाधा भाषा से संबंधित होती है। नई शिक्षा नीति में कक्षा पांचवी तक मातृभाषा या क्षेत्रिय भाषा में पढाई होगी चाहे स्कूल सरकारी हो या प्राइवेट। आॅनलाइन कोर्स कन्नड़, उडिया, बंगाली जैसे क्षेत्रिय भाषाओं में भी उपलब्ध होंगे। वर्तमान में अधिकतर आॅनलाइन कोर्स मुख्यतः अंग्रेजी या हिन्दी भाषा में ही उपलब्ध हैं। निष्कर्षतः नई शिक्षा नीति शिक्षा को केवल डिग्री और किताबों तक सीमित नहीं रखती बल्कि शिक्षा को एक अवसर के रूप में प्रस्तुत करती है जिससे छात्र अपनी प्रतिभा और रूचि के अनुसार जीवन मे अपना रास्ता चुन सकें। लेकिन हमेशा कि तरह सवाल नीति का नहीं बल्कि नियत का है, सवाल एक्ट का नहीं बल्कि एक्शन का है। शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है। ऐसे में नई शिक्षा नीति को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए केन्द्र सरकार, राज्य सरकार तथा नागरिक समाज तीनों को मजबूत इच्छा शक्ति दिखानी होगी। नई शिक्षा नीति में शिक्षा पर व्यय को वर्तमान जी0डी0पी0 के 3 प्रतिशत से बढाकर 6 प्रतिशत करने की बात कही गई है। लेकिन इससे ज्यादा जरूरी यह है कि शिक्षा के लिए आवंटित धन का प्रयोग कुशलतापूर्वक एवं मितव्ययितापूर्वक किया जाय। इसके लिए आवश्यक है कि प्रशासनिक मशीनरी को चुस्त-दुरूस्त बनाया जाय साथ ही बिना वजह की अफसरशाही पर भी लगाम लगाया जाय।

डाॅ0 रोहित राय

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