प्याज के आंसू से सरकार भी हरकत में

अशोक “प्रवृद्ध”

 

गरीबों के सम्बन्ध में एक  कहावत प्रचलित है कि गरीब प्याज और चटनी के साथ रोटी खाकर संतुष्ट हो लेता है, परन्तु इस कहावत को प्याज के निरंतर बढ़ते दाम झूठा साबित करने पर तुलें हैं। देश में गरीब के उसी प्याज की कीमतें पिछले कुछ दिनों में आसमान छूने लगने के कारण एक बार फिर प्याज ने लोगों को रुलाना शुरू कर दिया है। सभी भारतीय व्यंजनों में अपनी विशेष पहुँच रखने वाली प्याज थोक में 50 रुपए और खुदरा में 70 रुपए प्रति किलोग्राम बिक रही है। कुछ इलाकों में तो मूल्य 80-90 रुपए प्रति किलो तक पहुंच गए हैं। उधर प्याज की बढ़ती कीमतों ने आम आदमी की आंखों में आंसू ला देने के बाद अब सरकार भी हरकत में आ इस मुद्दे पर गंभीरता दिखाने लगी है,दिखलाने लगी है और केंद्र सरकार ने प्याज की कमी को पूरा करने के लिए कदम उठाने शुरू कर दिए हैं तथा प्‍याज के मूल्‍यों की और फिर बढ़ते मूल्‍यों पर नियंत्रण बनाने के लिए उठाए गये कदमों की नियमित रूप से समीक्षा की जा रही है। सम्पूर्ण देश की तरह राजधानी में प्याज की खुदरा कीमतों के आसमान छूने के बाद प्‍याज के बढ़ते मूल्‍यों को थामने के लिए केंद्र सरकार ने दस हजार मीट्रिक टन प्याज आयात करने का फैसला किया है । इसके साथ ही केंद्र सरकार ने घरेलू  बाजार में प्‍याज की उपलब्‍धता को बढ़ाने के लिए, प्‍याज के न्‍यूनतम निर्यात मूल्‍य को 425 डॉलर प्रति टन से बढ़ाकर प्रति मीट्रिक टन 700 अमरीकी डॉलर तक बढ़ाने का फैसला किया है। इससे निर्यात की संभावनाएं समाप्त हो गई हैं। देश की बाजारों में प्याज की आपूर्ति बढ़ाने के लिये सरकारी एजेंसियों को नियुक्त कर दिया गया है। प्याज के दामों में हो रही वृद्धि को रोकने के लिए केंद्रीय उपभोक्ता मंत्रालय ने पहल कर प्याज से जुड़ी सरकारी एजेंसियों की बैठक भी बुला कर उन्हें इस मामले में ठोस कदम उठाने को कहा है।

 

इसमें कोई संदेह नहीं कि पिछले कुछ दिनों से प्याज के दाम में जबर्दस्त उछाल आया है। जनवरी से जुलाई तक इसमें 300 प्रतिशत तक का इजाफा हो चुका है। बाजार में 15 से 20 रुपये प्रति किलोग्राम बिकने वाले प्याज की कीमत आज करीब 50 रुपये से उपर तक पहुंच गई है। इसकी सबसे बड़ी वजह मौसम की मार रही है। आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है, मौसम का उतार-चढ़ाव तो चलता रहता है लेकिन प्याज की कीमतें हर दो-तीन साल बाद ऐसे ही छलांग मारती हैं। यही नहीं, जब-तब ये पाताल में भी जा पहुंचती हैं। कुछ इस तरह कि किसानों का दिल बैठ जाता है। भारतीय रसोई अर्थात भारतीय व्यंजन की सबसे जरूरी वस्तु बन चुके प्याज का ऐसा अतिवादी बरताव सिर्फ मौसम बदलने का नतीजा नहीं हो सकता। अन्य देशों की बात तो जाने दें, मगर भारत में लोगों के खाद्य आदत में प्याज के प्रति विशेष झुकाव अर्थात प्याज के मामले में खास पैटर्न देखा जा सकता है। किसी क्षेत्र में लोग चावल को ज्यादा पसंद करते हैं तो कहीं रोटी पर ज्यादा जोर देते हैं, लेकिन सम्पूर्ण भारत में इनके अतिरिक्त सिर्फ आलू, प्याज और टमाटर से सबका भोजन पूर्ण हो जाता है। इस सस्ती व सर्वसुलभ खाद्य आदत की वजह से घोर गरीबी में भी लोगों का जिंदा रहना मुमकिन बना रहता है। लेकिन इन गिनी-चुनी चीजों की कीमतें भी अगर मनमाने ढंग से बढ़ाई-घटाई जाने लगें तो समाज का ज्यादातर हिस्सा प्रभावित होता है और स्वाभाविक रूप से इसे अपने ऊपर हमले के रूप में लेने लगता है। हैरतअंगेज बात यह है कि इसके बावजूद सरकारें इस समस्या को स्थायी तौर पर हल करने की चिंता तक करती नहीं दिखतीं। इस बार भी राष्ट्रीय जनतान्त्रिक गठबन्धन सरकार आयात के जरिए समस्या हल करने की कोशिश कर रही है, जबकि मामला सीधे तौर पर बिचौलियों के खिलाफ सख्ती बरतने का है। स्मरणीय है कि कुछ साल पहले भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर (बार्क) ने प्याज को लंबे समय तक संरक्षित करने की एक तकनीक ढूंढ निकालने का दावा किया था, लेकिन खेदजनक बात यह है कि इस तकनीक पर आगे की शोध व अन्य कार्रवाई करने के मामले में सरकारी स्तर पर सार्थक पहल नहीं की गई । अगर इस तकनीक को बड़े पैमाने पर आजमाया गया होता तो इसे लम्बे समय तक संरक्षित कर समय आने पर इसकी कीमत भी नीचे लाई जा सकती थी अथवा कीमतों पर अंकुश लगाने का प्रयास किया जा सकता था। आज हालत यह है कि कुछ महीने पहले तक हम जिस प्याज को तीस-पैंतीस रुपये प्रति किलो की दर से निर्यात कर रहे थे, उसी प्याज को अभी साठ-सत्तर रुपये किलो की दर पर विदेशों से आयात करने को विवश हो रहे हैं। प्याज को साल भर सुरक्षित रखने की व्यवस्था हो जाए तो इस अंधेरगर्दी से मिनटों में छुटकारा पाया जा सकता है, परन्तु पता नहीं यह हमारी सरकारों में इच्छा शक्ति की कमी है, या बिचौलियों के हाथ बिके होने की उनकी स्थायी नियति, जिसके कारण वे इन दैनन्दिनी उपयोग की खाद्य वस्तुओं के मूल्य नियंत्रण की दिशा में कोई सार्थक स्थायी पहल करने से हिचकती दिखलाई देती हैं ?

 

इस क्षेत्र के जानकारों का मानना है कि दाम बढऩे का कारण बरसात के कारण ही फसल का खराब होना है। फसल लगने के समय हुई बरसात ने सब कुछ गड़बड़ कर रख दिया। प्याज की आपूर्ति काफी कम होने की संभावनाएं उसी समय जता दी गई थी लेकिन बाजार के अंदरूनी सूत्र बता रहे हैं कि देश भर में फैले जमाखोर ही इसके पीछे हैं। बिहार के चुनावों के चलते प्याज में राजनीति घुस गई है। बड़े कालाबाजारियों द्वारा एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत बाजार में आपूर्ति रोक कर बनाई गई कमी को प्याज की कीमतों में बढ़ोतरी माना जा रहा है ।प्याज के महंगा होने की सबसे बड़ी मार आम गरीब पर पड़ रही है। एक ओर वह दालों आदि के बढ़े दामों से परेशान है तो दूसरी ओर उसकी रोटी खाने का जरूरी प्याज भी जरूरत से ज्यादा महंगा हो चला है। बाजार में छाई महंगाई ने आम आदमी की भोजन थाल का स्वाद बिगाड़ दिया है। हालत यह है कि पिछले एक माह में ही सब्जियों और दालों के भावों में 14-36 प्रतिशत तक बढ़ोतरी हो गई है। उल्लेखनीय है कि प्याज की बुआई जनवरी से मार्च महीने के दौरान की जाती है और इस वर्ष उस दौरान खराब मौसम और बारिश के कारण बहुत कम बुआई हो पाई जिससे उत्पादन घट गया। भारतीय राजनीति में प्याज की कीमत अहम भूमिका निभाती रही है। 1980 के लोकसभा चुनाव में और फिर दिल्ली और राजस्‍थान में 1998 में जब विधानसभा चुनाव हुए थे, उस दौरान भी प्याज की ऊंची कीमत पार्टियों की हार-जीत में निर्णायक साबित हुई थी। जानकारी के अनुसार प्‍याज के मूल्‍यों में हुई वृद्धि का कारण कुल उत्‍पादन में कमी है जो वर्ष 2013-14 के 194.02 लाख टन के मुकाबले 2014-15 में 189.23 लाख टन पर आ गया है। इस प्रकार उत्‍पादन में कुल 4.79 लाख टन की कमी हुई है। इस कमी का प्राथमिक कारण खराब मौसम और बिना मौसम की बारिश रही है जिसका प्रभाव प्रमुख फसलों पर पड़ा है। कई राज्यों में कम बारिश होने के कारण प्याज के उत्पादन में कमी आई है और यही वजह है कि प्याज की कीमतें एक बार फिर बढ़ सकती है । प्याज की कीमतों को लेकर उद्योग संगठन एसोचैम ने पूर्व में ही कहा था कि बरसात के मौसम में प्याज 10 से 15 प्रतिशत महंगा हो सकता है। एसोचैम की ओर से जारी एक रिपोर्ट के अनुसार मौजूदा स्तर से प्याज कीमतों में बढोतरी होने से उपभोक्ता कीमत सूचकांक महंगाई पर दबाव पड़ेगा। इस समस्या से बचने और प्याज की कीमतों को कम करने के लिए एसोचैम ने समय रहते और वास्तविकता के आधार पर फसल और राज्यवार इसकी खपत की पूर्ति का आकलन करने का सुझाव दिया था

 

 

 

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