आपातकाल को लेकर जनता को जागरूक रहना चाहिये – हरेन्द्र प्रताप

 

माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार वि.वि. में आपातकाल प्रसंग पर विमर्श

 हरेन्द्र प्रताप

     भोपाल, 26 जून। प्रख्‍यात चिंतक और विचारक श्री हरेन्‍द्र प्रताप ने आपातकाल के दर्द को बयां करते हुए कहा कि आज की युवा पीढी को आपातकाल के दौर को याद दिलाने की आवश्यकता है। मैंने प्रत्यक्ष तौर पर आपातकाल के दर्द को झेला है। तब लोग आपातकाल जैसे शब्द से परिचित भी नहीं थे। लाखों लोगों को जेल में अकारण बंद कर दिया गया। अनेक तरह की यातनाएं दी गयी। सरकार के पक्ष के कई समाचार पत्रों के विज्ञापन की दरें बढ़ा दी गयी। कई बड़े और छोटे मीडिया संस्थानों को प्रतिबंधित कर दिया गया। 1975 में लगे आपातकाल के बाद जनता को जागरूक रहना चाहिये। राजनेताओं में तानाशाही प्रवृत्तियां हो सकती है लेकिन जनता को जगाना पडेगा। वे माखनलाल चतुर्वेदी राष्‍ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार वि.वि. द्वारा आपातकाललोकतंत्र और मीडिया’ विषय पर आयोजित संविमर्श में मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे।

श्री हरे्न्‍द्र प्रताप ने कहा कि वास्‍तव में पं. जवाहरलाल नेहरू ने देश में आपातकाल का बीजारोपण किया था और पहली कम्‍युनिस्‍ट सरकार को भंग कर दिया था। ‘व्यक्ति से बड़ा दलदल से बड़ा देश’ यह कहना आसान है लेकिन इसको जीना मुश्किल है। इंदिरा गांधी की अधिनायकवादी नीति ने लोकतंत्र की बुनियाद की धज्जियां उड़ा दी थी। पार्टी के कई नेताओं को दल से बाहर कर दिया था।

संघ ने रखी थी जेपी आंदोलन की नींव :

श्री प्रताप ने जेपी आंदोलन और आपातकाल के संघर्ष में स्वयंसेवकों के योगदान का उल्लेख करते हुए कहा कि लाखों स्वयंसेवकों ने आपातकाल के दंश को झेला हैंजेल गए हैं और अनेक यातनाएं सही। वास्तव में जेपी आंदोलन की नींव स्वयसेवकों ने ही रखी थी। शुरूआत में स्‍वयं जयप्रकाश नारायण आंदोलन के लिए तैयार नहीं थे। स्वयंसेवकों ने उनसे आंदोलन का नेतृत्व करने के लिए आग्रह किया। इसके बाद देशभर में आंदोलन की शुरूआत हुई।  

दूसरा स्वतंत्रता संग्राम था आपातकाल : श्री केतकर

इस मौके पर मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित ऑर्गनाइजर के संपादक और जाने माने पत्रकार प्रफुल्‍ल केतकर ने कहा कि आपातकाल देश का दूसरा सबसे बड़ा स्वतंत्रता संग्राम था। आपातकाल के विरूद्ध लाखों लोगों ने आंदोलन किया था। देशभर में युवाओंपत्रकारों और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तारियां देनी पड़ी थी। कई लोगों को जेल में रखा गया। अनेक यातनाएं दी गयी। उस समय सरकारी मशीनरी का दुरूपयोग किया जा रहा था। सत्ता के साथ-साथ न्यायिक व्यवस्था पर भी इंदिरा गांधी नियंत्रण करने की कोशिश कर रहीं थी। कोर्ट के आदेश के बाद भी इंदिरा गांधी ने इस्तीफा नहीं दिया। गुजरात में छात्रों ने और बिहार से जयप्रकाश नारायण ने आंदोलन को देशव्यापी बनाने का कार्य किया।

     श्री केतकर ने कहा कि आंदोलन को सक्रिय बनाने में संघ के स्वयंसेवको ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने कहा कि जय प्रकाश नारायण ने आंदोलन का नेतृत्व किया लेकिन उसको वास्तविक आधार देने में स्वयंसेवकों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। स्वयंसेवकों ने रातों रात पर्चे बांटने और सूचनाओं के आदान-प्रदान का कार्य किया। इस कार्य में महिलाओं ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनके इस योगदान पर शोध कार्य किया जाना चाहिये।

     कुछ लोग आपातकाल के नाम पर लोकतंत्र को खोखला बना रहे हैं : श्री केतकर ने कहा कि आज ऐसे कई लोग है जो कहते हैं कि देश में आपातकाल की स्थिति बन गयी है। वास्तव में उन्हें आपातकाल के दर्द का अनुभव नहीं है। उन्हें पता ही नहीं है कि आपातकाल होता क्या है। जब शासन का उपयोग व्यक्तिगत स्वार्थ और परिवारवाद के लिए होता है तो वह आपातकाल होता है। आज कुछ लोग आपातकाल के नाम पर लोकतंत्र को खोखला बनाने का प्रयास कर रहे है।

     लोकतंत्र की रक्षा के लिए आपातकाल का इतिहास अवश्य पढ़े: कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे कुलपति श्री जगदीश उपासने ने मीडिया के विद्यार्थियों से आव्हान किया कि लोकतंत्र की रक्षा के लिए आपातकाल के इतिहास को अवश्य पढना चाहिए जो लोग अभी आपातकाल आने को लेकर अक्सर कयासबाजी करते रहते हैं वे उस दौर में होते तो उन्हें अनुभव होता कि आपातकाल गया होता है उस समय कई परिवार बर्बाद हो गए, नौकरियां चली गई, थानों-जेलों में लोग मर गए। चुन-चुन कर नेताओं के हाथ-पैर तोड़ दिए गए| वे स्वयं भी रायपुर जेल में बंद रहे पर्चे बांटने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार किया गया| पांच दिनों तक थाने में पुलिस ने तरह तरह से प्रताड़ित किया| उनके दो भाई भी जेल में बंद कर दिए गए थे|

     उन्होंने बताया कि आपातकाल के समय वे रायपुर से प्रकाशित ‘युगधर्म’ समाचार पत्र में उपसंपादक के पद पर कार्य करते थे| आपातकाल लगने से एक दिन पहले 25 जून को उन्होंने रायपुर में समाजवादी नेता मधु लिमये की पत्रकारवार्ता और सार्वजनिक सभा को कवर किया| सभा में श्री लिमये ने दिल्ली के अपने स्त्रोत के आधार पर घोषणा की थी कि आज रात को इंदिरा गाँधी बड़ा फैसला करने वाली हैं| इस सूचना के बाद वे श्री लिमये को ‘युगधर्म’ कार्यालय ले गए और विशेष संस्करण में उनका साक्षात्कार प्रकाशित किया| विशेषसंस्करण शहर में वितरण किया गया| तुरंत ही तत्कालीन सूचना और प्रसारण मंत्री श्री विद्याचरण शुक्ल को इसकी खबर लग गई और उन्होंने प्रेस पर छापा डलवा दिया| समाचार पत्र की बिजली काट दी गई और देश में आपातकाल लागू होने से पहले से कार्यालय पर इमरजेंसी लगा दी गई थी|

     आपातकाल की ‘ओरल हिस्ट्री’ सरंक्षित की जाना चाहिए: आपातकाल के दौरान समाचार पत्रों के प्रतिनिधियों पर हुए अत्याचारों का उल्लेख करते हुए विश्वविद्यालय के कुलाधिसचिव श्री लाजपत आहूजा ने कहा कि देश में प्रति वर्ष 1.25 लाख पीएचडी हो रही हैं लेकिन आपातकाल को लेकर बहुत कम शोध हुआ है| इसे लेकर लोगों के अनुभव को ‘ओरल हिस्ट्री’ के रूप में संरक्षित की जाना चाहिए| ताकि आने वाली पीढ़ी को पता लग सके कि देश के लोग और समाचारपत्र उस दौरान किन हालातों से गुजरे| उन्होंने कहा कि आपातकाल के दौरान समाचारपत्रों ने पहली बार जाना कि सेंसरशिप क्या होती है| र्गेनाइजर समाचारपत्र ने तो देश में संविधान लागू होने के साथ ही सेंसरशिप का सामना किया था|

     उन्होंने कहा कि समाचारपत्रों ने उस दौरान किस्से-कहानी के माध्यम से आपातकाल के विरुद्ध सन्देश दिए और आम जनता को जागरूक किया| आपातकाल को लेकर शाह आयोग बनाया गया लेकिन कांग्रेस की सरकार आने के बाद सभी स्थानों से आयोग की रिपोर्ट की प्रतियाँ वापस बुला ली गई| अब ऑस्ट्रेलिया के एक पुस्तकालय में रिपोर्ट की प्रति उपलब्ध है उसे भारत लाया जाना चाहिए|

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