देवेश शास्त्री
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उन्हें नीति-नेम, धर्म-कर्म से कोई मतलब नहीं था। उसकी स्वाभाविक वृत्ति राजनैतिक रूप से ऐन-केन प्रकारेण अपना उल्लू सीधा करने यानी कमाऊ जुगाड़ भिड़ाने की रही है। कई बार चुनाव भी लड़ा और हारते रहे, उनका नजरिया चुनाव जीतने की बजाय आलाकमान से मिलने वाले चुनावी खर्चे को हड़पने और क्षेत्रीय रसूख का लाभ उठाकर चन्दा जुटाकर तिजोरी भरने का रहा।
सियासी रसूख के बल पर ही एक संस्था पर कब्जा कर लिया, अब तो पौबारह थी। बिना मेहनत के ही ‘‘करोड़ी-पंचवर्षीय’’ लाभ का अथाह स्रोत हाथ लग चुका था, बड़े राजनेताओं के साथ फोटो खिचवाकर पोस्टर साइज के फोटोग्राफ का शोरूम उनके ‘धन-प्रेम’ की गवाही देता था। यानी उनकी सहज वृत्ति राजनैतिक जुगाड़ से अकूत सम्पदा जुटाने की हो गई।
‘‘पलटा खाया वक्त ने बदल गई तकदीर’’ जैसे ही दुर्दिन आने शुरू हुए, तो उनका वही चश्मा (दृष्टिकोण) अपनी स्वाभाविक वृत्ति और जीवन शैली से दूसरों को वैसे ही देख रहा था। वे बोले- फलां नेता उनकी संस्था पर कब्जा करने की नियत से मुझे बेदखल करना चाहता है।
शुभचिन्तकों ने धैर्य धारणकर चश्मा बदलकर कर्मसिद्धान्त समझाने का प्रयास किया- ‘‘मित्रवर! जैसे आपने सदैव सियासी रसूख से उपना उल्लू सीधा किया, वैसे ही समझते हो आपके पराभव के पीछे भी सियासी चाल चली गई हैं। वास्तव में ये आपके चश्मे का दोष है। जैसे चोर को चोर नजर आता है वैसे ही आपके चश्मे के सियासी दांव-पेंच वाले लेंस से संसार में चारों ओर सियासी दांव-पेंच ही नजर आते हैं।’’
शुभचिन्तकों ने आगे समझाने का क्रम जारी रखते हुए कहा – ‘‘कर्म प्रधान विश्व रचि राखा, जो जस करहि सो तस फल चाखा’’ इसे समझते हुए अपे पराभव के लिए अपने ही कर्म को ही जिम्मेदार समझो। कोउ न काहु कर सुख दुख दाता….।’’
शुभचिन्तकों की बात को बीच में काटते हुए वे आग-बबूला हो गये, आप सब मेरे शुभेक्षु बनते हो और विरोध नेता की तरफदारी करते हो। भागो यहां से।
शुभचिन्तकों द्वारा प्रेम का चश्मा बदलने का प्रयास बिफल रहा। क्योंकि शुभेक्षु जनों के चिन्तन व परामर्श को उन्होंने उसी चश्मे से देखा कि इन लोगों की कवायद भी विरोधी नेता की चाल ही है। इसीलिए उन्हें भगा दिया।
बेचारे शुभचिन्तक हतप्रभ रह गये। सोचा- एक न एक दिन ‘संचित कर्मों के फल स्वरूप ‘‘प्रारब्ध और कर्मगति’’ को वे समझेंगे।’’
लेकिन ऐसा नहीं हुआ। वह सियासी दांव पेंच के लेंस का चश्मा शायद स्थाई रूप से नाकपर चिपक चुका था जो पराभव के बाद भी हट नहीं सका।

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