प्रणव मुखर्जी का नागपुर प्रवास

विजय कुमार

जब से कांग्रेस वालों ने ये सुना है कि पूर्व राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रम में जा रहे हैं, तब से उनकी नींद हराम है। कई तो मन ही मन उन्हें गाली दे रहे हैं। हो सकता है दो-चार दिन में गालियों का स्वर ऊंचा हो जाए। शायद अभी विदेश यात्रा पर गये मां-बेटे की ओर से संकेत नहीं मिला है। अन्यथा गाली देना तो कांग्रेस के (कु)संस्कार का ही हिस्सा है।जहां तक संघ की बात है, तो प्रशिक्षण संघ के काम का एक नियमित अंग है। संघ के स्थापना काल से ही ये वर्ग लग रहे हैं। जिस वर्ग में प्रणव दा जा रहे हैं, वह संघ का तृतीय वर्ष का प्रशिक्षण वर्ग है। 25 दिवसीय इस वर्ग में पूरे देश से कार्यकर्ता आते हैं। इस बार का वर्ग 14 जून को प्रारम्भ हुआ था। इसमें 708 कार्यकर्ता प्रशिक्षण ले रहे हैं। सात जून को इसका सार्वजनिक समापन कार्यक्रम है। परम्परागत रूप से इसमें सरसंघचालक मुख्य वक्ता रहते हैं। इस बार प्रणव दा वहां मुख्य अतिथि के नाते जा रहे हैं। वे शारीरिक प्रदर्शन देखेंगे और फिर अपनी बात भी कहेंगे।

कुछ लोगों को एक खांटी कांग्रेसी का संघ के इतने महत्वपूर्ण कार्यक्रम में जाना भले ही आश्चर्यजनक लग रहा हो; पर संघ वालों के लिए ये सामान्य सी बात है। संघ अपने कार्यक्रमों में  समाज के प्रतिष्ठित लोगों को अध्यक्ष या मुख्य अतिथि के नाते बुलाता रहता है। ये लोग व्यापारी, उद्योगपति, शिक्षक, वकील, डॉक्टर, किसान, समाजसेवी, पत्रकार, राजनेता आदि कोई भी हो सकते हैं। संघ के मंच पर आकर वे अपनी बात कहते हैं और मुख्य वक्ता से संघ के विचार भी सुनते हैं। वे संघ के अनुशासन और कार्यकर्ताओं के प्रेमपूर्ण व्यवहार से प्रभावित होते हैं। ऐसे अधिकांश लोग फिर सदा के लिए संघ के साथ जुड़ जाते हैं।

वैसे तो संघ में प्रारम्भ से ही ये काम चल रहा है। संघ के संस्थापक डा. हेडगेवार पूरे देश से ऐसे प्रभावी लोगों को बुलाकर नागपुर की शाखा दिखाते थे; पर पिछले 25 वर्ष से संघ में इसके लिए एक ‘संपर्क विभाग’ बना दिया गया है। संघ की राष्ट्रीय से लेकर नीचे तक की हर इकाई में एक संपर्क प्रमुख और उनके साथ पूरी टीम काम करती है। ये अपने क्षेत्र के अच्छे लोगों से मिलकर उन्हें संघ का साहित्य देते हैं। फिर उन्हें संघ या किसी समविचारी संस्था से जोड़ते हैं। इसके लिए प्रतिवर्ष कुछ दिन के लिए विशेष संपर्क कार्यक्रम चलाया जाता है। इस कारण संघ का फैलाव निरन्तर बढ़ रहा है।

ऐसे ही संपर्क कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपति श्री प्रणव मुखर्जी से भी संपर्क किया गया। उन जैसे बड़े आदमी से संपर्क करने सरसंघचालक श्री मोहन भागवत स्वयं गये। ऐसी एक-दो मुलाकातों में प्रणव दा को संघ का काम समझ में आया; पर पद की मर्यादा के कारण वे खुलकर संघ के किसी कार्यक्रम में नहीं आ सकते थे; पर अब ऐसी बाध्यता नहीं है। इसलिए उन्होंने संघ के कार्यक्रम में जाना स्वीकार किया है।

यदि प्रणव दा के पक्ष पर ध्यान दें, तो राजनीति में वे सर्वोच्च स्थान पा चुके हैं; पर उनका बेटा और बेटी दोनों वंशवादी कांग्रेस में सक्रिय हैं। प्रणव दा के नागपुर जाने से उनके राजनीतिक भविष्य का क्या होगा, यह कहना कठिन है। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस में प्रणव दा सबसे वरिष्ठ और अनुभवी नेता थे। प्रधानमंत्री बनने की उनकी इच्छा भी थी; पर राजीव गांधी स्वयं प्रधानमंत्री बन गये। इसके बाद एक षड्यंत्र के अन्तर्गत वे कांग्रेस से बाहर कर दिये गये। उन्होंने ‘राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस’ नामक दल भी बनाया; पर सफल नहीं हुए। अतः वे फिर कांग्रेस में आ गये।

राजीव गांधी की हत्या के बाद सोनिया मैडम को उनके अनुभव का बहुत लाभ मिला; पर 2004 में जब कांग्रेस को सत्ता मिली, तो सोनिया ने उनकी बजाय मनमोहन सिंह जैसे जनाधारहीन व्यक्ति को प्रधानमंत्री बना दिया। सोनिया मैडम को ये भय था कि यदि प्रणव दा पार्टी और सरकार में जम गये, तो कहीं उनकी और उनके परिवार की छुट्टी न हो जाए। मनमोहन सिंह से ऐसा कोई खतरा नहीं था। इस अपमान को सह कर भी प्रणव दा कांग्रेस में बने रहे। अंततः राष्ट्रपति पद के रूप में उन्हें इसका पुरस्कार भी मिला।

यों तो संघ या स्वयंसेवकों द्वारा संचालित संस्थाओं के कार्यक्रमों में आने वालों की सूची बहुत बड़ी है। इनमें डा. कलाम, इन्दिरा गांधी, वी.वी.गिरी, करुणानिधि, ज्योति बसु, हरेकृष्ण कोनार, नीलम संजीव रेड्डी, मिर्जा हमीदुल्ला बेग, रामनरेश यादव, जगजीवन राम, नारायण दत्त तिवारी, शिवराज पाटिल, डा. कर्णसिंह, मालवीय जी, गांधी जी, विनोबा भावे, जयप्रकाश नारायण, डा. राधाकृष्णन, मोरारजी देसाई, प्रभाष जोशी, शरद यादव, शंकर दयाल शर्मा, कुंवर महमूद अली, बलराम जाखड़, अन्ना हजारे, खुशवंत सिंह, एच.डी.देवेगौड़ा, मुलायम सिंह, सुशील कुमार शिंदे, एम.जी.बोकारे, अजीम प्रेमजी आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। सभी पत्रकार तथा जन प्रतिनिधि स्वयंसेवकों द्वारा चलाये जा रहे शिक्षा, सेवा एवं संस्कार केन्द्रों में प्रायः आते रहते हैं।

संघ का दिल बड़ा और दिमाग खुला है। उसे किसी विरोधी को अपने मंच पर बुलाने में आपत्ति नहीं होती। इसीलिए संघ का काम सभी दिशाओं में बढ़ रहा है। प्रणव दा के इस निर्णय में भी बहुत से लोग राजनीतिक अर्थ ढूंढेंगे; पर संघ इन प्रपंचों से दूर है। उनके आने से संघ, समाज और देश को लाभ ही होगा, यह निश्चित है।

 

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