प्रोटो इण्डो युरोपीयन भाषा की कपोल कल्पना: डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

प्रवेश:
आज आक्रामक पैतरा ले रहा हूँ. जैसे बालक बिन्दू बिन्दू क्रमवार जोडकर चित्र बना देता है, कुछ उसी प्रकार मैं वास्तविक घटनाओं के पीछे की मानसिकता उजागर करने का प्रयास कर रहा हूँ. आज अंग्रेज़ी शासन के साथ साथ भारत आए मिशनरियॊ की मानसिकता में दृष्टिपात करते हैं. आलेख कुछ इतिहास का आधार लेकर और कुछ शासक और मिशनरियों की मानसिकता में दृष्टिपात कर के लिखा है. इस विधा से संभावित चित्र उजागर किया जा सकता है. इन परदेशियों ने संस्कृत अध्ययन भी किया पर किस उद्देश्य से? ……..

(एक)
मिशनरी संस्कृत अध्ययन का उद्देश्य,
उनका संस्कृत अध्ययन, प्रारंभ में, हिन्दुओं के मतान्तरण के उद्देश्य से ही प्रेरित था. साथ साथ उनकी इसाइयत की प्रखर निष्ठा से दूषित था. अध्ययन वस्तुनिष्ठ और विशुद्ध तटस्थता से किया जाना चाहिए.
इस प्रकार विचार करने पर आपको ’प्रोटो इण्डो युरोपीयन भाषा’ का कपोल कल्पित आविष्कार क्यों किया गया, इसका आंशिक उत्तर संभवतः मिल जाएगा.कम से कम, विषय पर कुछ जानकारी अवश्य होगी. फिर भी कुछ पूछनेवाले प्रश्न पूछते हैं, कि………

(दो)
प्रोटो इण्डो युरोपीयन भाषा की ऐतिहासिकता कैसे नकारी जा सकती है?

मित्र पूछते हैं, कि प्रोटो इण्डो युरोपीयन भाषा की ऐतिहासिकता को नकारने के लिए, आपके पास क्या प्रमाण है?
मेरा उत्तर:
जिस भाषा का अस्तित्व ही प्रमाणित नहीं हुआ, उसको नकारने के लिए क्या तर्क दिया जा सकता है?
क्या किसी न्यायालय में आप पर केवल आरोप मढ कर के कोई दण्ड दिया जा सकता है?
तर्क देना किसी अस्तित्व की पुष्टि में संभव हो सकता है. जो था ही नहीं उसको सत्य मानकर उसे नकारने का तर्क माँग रहें हैं आप? तर्क तो उनसे माँगा जाना चाहिए. जिस बुद्धिमान ने, प्रोटो इण्डो युरोपीयन भाषा के शब्द और व्याकरण (?) भी भूतकाल में अनुमान के आधारपर पुनर्रचित (रिकंस्ट्रक्ट) कर दिए. भाषा के शब्द भी अनुमान कर जोड दिए. { वास्तव में कहाँ थे?} जैसे कोई पुत्र के स्वभाव से उसके बाप के स्वभाव की कल्पना करें. 
इस प्रश्न पर. मेरा उत्तर है, जिस भाषा के अस्तित्व का कोई प्रमाण ही नहीं है, उसको नकारें तो कैसे नकारें?
प्रश्न शायद हो सकता है, कि, जो भाषा प्रमाणित थी ही नहीं उसको उस समय के भारतीय विद्वानों ने भी क्यों मान लिया?

(तीन)
भारतीय विद्वानों ने क्यों मान लिया?
इस का उत्तर भारतीय दृष्टि में मौलिक चिन्तन के उस समय के अभाव में था:-
आधुनिक भारतीय दृष्टि में मौलिक चिन्तन के अभाव पर कहते हैं लेखक देवेन्द्रनाथ शर्मा.
जो, *भाषा विज्ञान की भूमिका* नामक पुस्तक के, पृष्ठ ३०७ पर * देखा जा सकता है.
—————————————————————
’ यह विचित्र विरोधाभास है कि यूरोप में भाषाविज्ञान के अध्ययन का आरम्भ संस्कृत के अध्ययन और परिज्ञान से प्रेरित हुआ और भारत में यूरोपीय प्रभाव के फलस्वरूप. यहाँ यूरोपीय ज्ञान-विज्ञान का ग्रहण जैसे अन्य क्षॆत्रों में हुआ, वैसे ही भाषाविज्ञान के क्षेत्र में भी. इस लिए आधुनिक भारतीय दृष्टि में स्वतंत्र और मौलिक चिन्तन का अभाव है. जो मार्ग यूरोप के विद्वानों ने बना दिया है, उसी पर हम चल रहे हैं.

अपनी प्राचीन उपलब्धियों का ज्ञान न होने से हम उनसे सहायता नहीं ले पाते और जो पुरानी या बासी चीज़ें यूरोप या अमेरिका से मिलती हैं, उन्हें ही पाकर हम अपने को कृतार्थ मानते हैं. इसलिए जो भाषावैज्ञानिक कार्य आधुनिक युग में हुए हैं उनमें गतानुगतिकता अधिक है. इसका एक कारण यह भी है कि यहाँ आरम्भ में भाषावैज्ञानिक कार्यों का सूत्रपात यूरोपीय विद्वानों द्वारा ही किया गया और उन्हीं के आदर्शों पर भारतीय विद्वान भी चलते रहे. स्वभावतः जो मार्ग बन गया उसमें भारतीय तत्त्व कम और पाश्चात्य तत्त्व प्रमुख हो गया.’
——————————————————————————
(चार)
यूरोपीय प्राच्यविदों पर संदेह:
इसका उत्तर जैसे ऊपर कहा है, उनके यहाँ आने के उद्देश्य से जुडा है. वे मतान्तरण के लिए चर्च द्वारा वेतन पर आए थे. और बाकी जो शासन के लिए भी आए थे, वें भी चर्च से सहानुभूति रखते थे. इसका प्रमाण उनके पत्र व्यवहार में मिलता है.

लेखक देवेन्द्रनाथ शर्मा लिखते हैं, कि, यूरोपीय विद्वानों ने भारत में भाषावैज्ञानिक कार्यों का सूत्रपात किया. इस लिए आधुनिक भारतीय दृष्टि में स्वतंत्र और मौलिक चिन्तन का अभाव है. जो पुरानी बासी चीज़ें यूरोप या अमेरिका से मिलती हैं, उन्हें ही पाकर हम अपने को कृतार्थ मानते हैं.
इस प्रकार आज विचार करने पर, संस्कॄत लातिनी और ग्रीक को एक ही स्तर पर स्वीकार कर लेने में हमारे विद्वानों के मौलिक चिंतन का अभाव ही दिखाई देता है.
न्यूनतम संदेह तो जता सकते थे. इसमें मौलिक चिन्तन की भी आवश्यकता नहीं लगती. सामान्य (कॉमन सेन्स) बोध की ही आवश्यकता थी. क्यों ’साहेब वाक्यं प्रमाणं’ मान लिया? किसी को संदेह हुआ नहीं?
संस्कृत लातिनी और ग्रीक क्या समान विकसित स्तर की भाषाएँ थी? उन्हीं की यदि तुलना की जाती, तो, संस्कृत ही श्रेष्ठ प्रमाणित होती.

पर ऐसी स्वीकृति तो विलियम जोन्स को भी देनी ही पडती है, फिर अपनी इसाई हीनता से ग्रस्त मानसिकता को छिपाने के लिए प्रोटो इंडो युरोपियन भाषा का कपोल कल्पित आविष्कार पुरस्कृत करता है. जिसके फलस्वरूप लातिनी ग्रीक और संस्कृत एक पंक्ति में खडी करना संभव हो जाता है. और कपोल कल्पित प्रोटो इण्डो युरोपीयन भाषा को तीनों की स्रोत भाषा प्रमाणित किए बिना ही मानता है.
संस्कृत को स्रोत भाषा मानता तो ग्रीक और लातिनी साथ साथ अंग्रेज़ी भी हीन मानी जाती, और सापेक्षता से संस्कृत और हिन्दू धर्म भी श्रेष्ठतर प्रमाणित हो जाता.

इस लिए मूल प्रश्न को तिलांजली देकर एक कपोल कल्पित भाषा प्रोटो इंडो युरोपीयन भाषा का मनगढंत आविष्कार किया गया.
और संस्कृत लातिनी और ग्रीक भाषाएँ इस प्रोटो इण्डो युरोपीयन से निःसृत मानी गई.
संस्कृत को मदर लँग्वेज मानना नहीं पडा ….मानते तो हिन्दू धर्म की अप्रत्यक्ष स्वीकृति हो जाती. फिर मतान्तरण में बाधा बन जाती.
पर उसे भी संस्कृत के अगाध ज्ञान-सिंधु का अनुभव हुए बिना रहा नहीं, तो उस ज्ञान पर संशोधन कर लाभ पाने के उद्देश्य से हस्त लिखित पाण्डुलिपियों को भारत के बाहर भेजने की योजना बनी. यह योजना एशियाटिक सोसायटी ऑफ बेंगाल की स्थापना में देखी जा सकती है.

एशियाटिक सोसायटी की स्थापना की गई. और भारत भर दलालों को भेजकर हस्तलिखित खरीदे गएँ और महत्वपूर्ण पाण्डु लिपियाँ चुन चुन कर भारत के बाहर केम्ब्रिज और ऑक्सफर्ड और बर्लिन इत्यादि विश्वविद्यालयों में हजारों की संख्या में भेजी गई.
भोले भारतीय सोचते रहे, जो आज भी सोचते हैं , कि, एशियाटिक सोसायटी ने हमारे मूल्यवान ग्रंथों को संभालके रखा, कितनी दयालु थी माय बाप सरकार?
इस ज्ञान भण्डार की निर्यात को सरल बनाने में सोसायटी के तीसों परदेशी सदस्यॊ का चयन जो किया गया था, उन तीस सदस्यॊं में एक भी हिन्दू पण्डित स्वीकारा नहीं गया था. सारे के सारे तीसों सदस्य परदेशी थे.
आगे, कुछ तथ्यात्मक घटनाएँ प्रस्तुत करता हूँ, जो इसी इतिहास के संदर्भ में देखी जा सकती हैं.

(पाँच)’
तथ्यात्मक घटनाएं, और संबंधित बिन्दू.
कुछ सार रूप तथ्यात्मक पुष्टि निम्न ऐतिहासिक घटना-क्रम में देखी जा सकती है.

तथ्यात्मक घटना (१) सारे तथाकथित प्राच्यविद शासन के लिए वा मतान्तरण के लिए वेतन पर आए थे.

तथ्यात्मक घटना (२)धर्मान्तरण और शासन की सुविधा के उद्देश्य से ही संस्कृत-अंग्रेज़ी -संस्कृत ऐसे दो शब्द कोश, मॉनियर विलियम्स द्वारा प्रकाशित किए गए थे.(ऐसा कोश की प्रस्तावना में ही लिखा है.) उस कथनानुसार ऐसी दो डिक्षनरियाँ १८५१ और १८८५ में ही प्रकाशित हुई थी.

तथ्यात्मक घटना (३) इसी मतान्तरण के उद्देश्य से, उसके पहले, १८१९ में १,००० पृष्ठों की संस्कृत/इंग्लिश डिक्षनरी का संकलन एच.एच. विल्सन ने किया था.

तथ्यात्मक घटना (४) पण्डित तारानाथ से भी वाचस्पत्यं (डिक्षनरियाँ) शासन ने सहायता देकर बनवाई थी. कुछ शब्दों के विकृत अर्थ (अश्वमेध और गोघ्न जैसे शब्दों के विकृत अर्थ) भी उसी से करवाए गए थे. जिसके लिए, तारानाथ को आज के मूल्य के अनुपात से २+ मिलियन रुपयों की सहायता(?) दी गई थी.
पर संस्कृत में भरे पडे ज्ञान को निर्यात भी किया गया था.
तथ्य घटना (५) एशियाटीक सोसायटी की स्थापना का दिखावा कर भारत की चुन चुन कर श्रेष्ठ पाण्डु लिपियाँ बर्लिन, केम्ब्रिज और ऑक्सफर्ड भिजवाई गई थी.
कृपया मुक्त टिप्पणी दीजिए.
————————————————————-
परिशिष्ट (१)
मिशनरियों की मानसिकता:
संक्षेप में वें, मिशनरी मतान्तरण के समर्पित उद्देश्य से आए थे. वें चर्च की ओर से वेतन भी पाते थे. साथ साथ उस समय के, इसाई शासक भी चर्च के प्रति निष्ठावान थे, और सुविधा भी उपलब्ध कराते थे.उन्हों ने संस्कृत भी पढना प्रारंभ की थी, इसी उद्देश्य से. वें संस्कृत में त्रुटियाँ निकाल कर, हिन्दुओं को मतान्तरित करना चाहते थे. संदर्भ: [ ए कॉन्साइज़ एन्सायक्लोपेडिया ऑफ ऑथेन्टिक हिन्दुइज़्म ]
इस प्रकार, १८ वीं शती के अंतिम वर्षों में, भारत में प्रवेश करने वाले मिशनरियों के मानस में प्रवेश किए बिना उनकी कूटनैतिक चाल का पैंतरा समझ में नहीं आएगा. उन्हें कौन वेतन देकर,आजीविका उपलब्ध करा रहा था, यह जानकारी उनके मानस में क्या घट रहा होगा, इसका अनुमान कराने में सहायक सिद्ध होगी.

परिशिष्ट (२)
कूटनीति कैसे जाने ?
स्थूलतः जो प्राच्यविद भारत भेजा जाता था, वह विशुद्ध ज्ञान का उपासक नहीं था. कम से कम प्रारंभ में तो था ही नहीं.
प्रारंभ का, विलियम जोन्स भी नहीं. पर वह धीरे धीरे संस्कृत और देवनागरी का अध्ययन करने के पश्चात विवश होकर प्रभावित (?) ही हुआ होगा. हिचकिचाहट से ही संस्कृत की श्रेष्ठता स्वीकार करने बाध्य था.
जब संस्कृत में ज्ञान का अगाध सागर उमडते देखा तो श्रेष्ठता स्वीकार ने पर बाध्य हुआ. अपनी विश्वसनीयता को टिकाने के लिए उसने संस्कृत की परम श्रेष्ठता तो स्वीकार की पर अपनी चर्च के प्रति निष्ठा ने उसे संस्कृत को लातिनी और ग्रीक की स्रोत भाषा मानने से परावृत्त किया .
परिशिष्ट (३)
गीता का कर्म योग उसे इतना प्रभावित कर गया, कि, विलियम जोन्स ने…..
भगवत गीता का अनुवाद करवा कर इंग्लैण्ड की कार्पोरेशनो को कर्म योग का लाभ पहुँचाने भिजवा दिया

4 thoughts on “प्रोटो इण्डो युरोपीयन भाषा की कपोल कल्पना: डॉ. मधुसूदन

  1. बहन शकुन जी-नमस्कार
    आप और अन्य जानकार और विद्वान एवं विदुषियों की ओर से आई टिप्पणियाँ मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण होती हैं.
    प्रोत्साहन के लिए भी और सुधार के लिए भी.[दोनों का रचनात्मक उपयोग है.]
    आप की टिप्पणियाँ मुझे उचित दिशा का सूचन करती है. जिसका मुझे अवश्य लाभ ही होता है.
    सूक्ष्मता से विष्लेशण करने पर मुझे सही आशय मिलता है; जो अति सहायक ही होता है.
    ऐसी तटस्थ और वस्तुनिष्ठ टिप्पणियों का सदैव स्वागत है.
    मैं गलती भी कर सकता हूँ.
    आप मुक्त टिप्पणी देती रहें.
    यही मेरा पारिश्रमिक भी मानता हूँ.
    आपका हृदयतल से आभार व्यक्त करता हूँ.

    शुभेच्छाएँ

    मधु भाई

  2. आदरणीय मधु भाई,
    अकाट्य तर्कों एवं सशक्त प्रमाणों ने आपके इस आलेखों भी सर्वग्राह्य बना दिया है ।मैंने स्वयं बर्लिन विश्वविद्यालय के पुस्तकालय
    एवं इंडिया ऑफ़िस लाइब्रेरी-लंदन में अनेकों पांडुलिपियों को देखा है, जिन्हें उन्होंने बहुत सहेज कर रक्खा है । शोधार्थी को उनकी
    फ़ोटो कॉपी भी दे देते हैं । आपकी खोजपूर्ण मानसिकता और उन रहस्यों को उजागर करनेवाला संकल्प श्लाघनीय है , जो संस्कृत एवं भारतीय संस्कृति को गौरवान्वित करेगा । साधुवाद ।
    सादर ,
    शकुन बहिन

  3. आदरणीय मधु भाई,
    अकाट्य तर्कों एवं सशक्त प्रमाणों ने आपके इस आलेखों भी सर्वग्राह्य बना दिया है ।मैंने स्वयं बर्लिन विश्वविद्यालय के पुस्तकालय
    एवं इंडिया ऑफ़िस लाइब्रेरी-लंदन में अनेकों पांडुलिपियों को देखा है, जिन्हें उन्होंने बहुत सहेज कर रक्खा है । शोधार्थी को उनकी
    फ़ोटो कॉपी भी दे देते हैं । आपकी खोजपूर्ण मानसिकता और उन रहस्यों को उजागर करनेवाला संकल्प श्लाघनीय है , जो संस्कृत एवं भारतीय संस्कृति को गौरवान्वित करेगा । साधुवाद ।
    सादर ,
    शकुन बहिन

    1. बहन शकुन जी-नमस्कार
      आप और अन्य जानकार और विद्वान एवं विदुषियों की ओर से आई टिप्पणियाँ मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण होती हैं.
      प्रोत्साहन के लिए भी और सुधार के लिए भी.[दोनों का रचनात्मक उपयोग है.]
      आप की टिप्पणियाँ मुझे उचित दिशा का सूचन करती है. जिसका मुझे अवश्य लाभ ही होता है.
      सूक्ष्मता से विष्लेशण करने पर मुझे सही आशय मिलता है; जो अति सहायक ही होता है.
      ऐसी तटस्थ और वस्तुनिष्ठ टिप्पणियों का सदैव स्वागत है.
      आपका हृदयतल से आभार व्यक्त करता हूँ.
      मैं गलती भी कर सकता हूँ.
      आप मुक्त टिप्पणी देती रहें.

Leave a Reply

%d bloggers like this: