शाह व मोदी बताएं कि पवैया क्यों नहीं हो सकते मप्र के योगी आदित्यनाथ

 विवेक कुमार पाठक
2003 में दिग्विजय सिंह के दस साल के कांग्रेसी कार्यकाल का समापन करना बीजेपी के लिए आसान नहीं था। आज की कांग्रेस और तब की भाजपा समानता से सत्ता परिवर्तन के लिए प्रतीक्षारत थी।
ऐसे में 2003 में प्रखर हिन्दुत्ववादी उमा भारती पर भाजपा ने दांव खेला था। उमा भारती ओबीसी, महिला होने के साथ हिन्दुत्व की गर्जना करने वाली नेता थीं सो भाजपा को उनकी इस छवि का एंटी इनकमबैंसी के दौरान बंपर लाभ मिला।
आगे उमा भारती मप्र की मुख्यमंत्री बनीं मगर सपाट कहें तो वे सरकार को मॉस लीडर की छवि से निकलकर राजनैतिक दूरदर्शिता व संतुलन के साथ नहीं चला सकीं।
योगी आदित्यनाथ मोदी युग की खोज हैं। 2014 के बाद जातिवादी राजनीति के गढ़ बन चुके यूपी में भाजपा सरकार बनी तो भविष्य के नाम पर योगी आदित्यनाथ लाए गए।यूपी में 2014 जैसा चमत्कार 2019 में भी हो जाए इसके लिए यूपी के हिन्दुओं का एकमुश्त वोट जरुरी है।योगी आदित्यनाथ का तिलक, प्रखर ओजस्वी वाणी और उनका भगवा वेष मोदी और अमित शाह की दूरदर्शी उम्मीदें हैं।
यूपी से निकलकर अगर पड़ोसी एमपी में आ जाएं तो यहां भाजपा में भगवा ध्वजधारी जयभानसिंह पवैया भी पुराना और बड़ा नाम हैं।पवैया रामजन्म भूमि एवं कृष्णजन्मभूमि न्यास के अध्यक्ष महांत नृत्यगोपालदास के पट्ट शिष्य हैं और साधु महात्माओं और बाबा वैरागियों के सखा हैं। पवैया को भाजपा ने 2013 से लगातार रोक रोककर आखिर 2016 में जैसे तैसे प्रदेश कैबीनेट लायक समझा था।आज वे मध्यप्रदेश भाजपा सरकार के उच्च शिक्षा मंत्री हैं और शिवराज मंत्रीमंडल के इकलौते संपूर्ण भगवाधारी विचार वाले तेजतर्रार मंत्री हैं।मप्र भाजपा में उनका कद क्यों सालांं तक थमा रहा ये भगवाप्रेमियों के लिए शोध और जिज्ञासा का विषय हो सकता है। वे हिन्दुत्व का झंडा 70 के दशक से उठाए हुए थे और मंदिर आंदोलन के समय राष्ट्रवादी विचारधारा के नायकों में अग्रणी युवा नेता थे। तब भगवा झंडा थामकर और हजारों कार्यकर्ताओं को लेकर पवैया भारतवर्ष में राष्ट्रवादी भ्रमण कर रहे थे। 1992 में राष्ट्रीय महासचिव व 1995 आने तक बजरंग दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रुप में पवैया की हिन्दुओं में लोकप्रियता के अलावा अपनी स्वतंत्र अखिल भारतीय पहचान बन चुकी थी।वे प्रखर और कुशल वक्ता हैं और शब्दों का वजन और उसके प्रवाह के कौशल से जनसभाओं को रोमांचित करना जानते हैं।
पवैया आज विधायक हैं मगर करीब दशक भर से पहले वे अटल सरकार के समय ग्वालियर से भारतीय जनता पार्टी के लोकसभा सदस्य रह चुके हैं।पवैया ही वर्तमान भाजपा के ऐसे नेता हैं जिनके समय में पूर्व पीएम अटल बिहारी वाजपेयी को हराने वाले 90 के दशक वाले कांग्रेसी दिग्गज माधवराव सिंधिया भी मुश्किल में पड़ गए थे और लाखों में जीतने वाले सिंधिया कुछ हजार की जीत से ग्वालियर में रुबरु हुए थे।
जयभान सिंह पवैया इसी लोकप्रियता के बाद आगे ग्वालियर से सांसद निर्वाचित हुए थे।पवैया इसके बाद राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के लिए बड़ी उम्मीद हो सकते थे मगर ऐसा हुआ नहीं। पवैया की देश के हिन्दुओं में पहचान तो बन गई मगर भाजपा के शीर्षस्थ उनकी क्षमता भगवा के लिए भारतवर्ष में उपयोग नहीं कर सके।1999 की अटल सरकार के वक्त सांसद बनने वाले पवैया की क्षमताओं का भाजपा आज तक उपयोग नहीं कर पाई है।ऐसा नहीं है कि भाजपा उनकी प्रखर हिन्दुत्ववादी छवि और उसके प्रभाव से अनजान है मगर खरी खरी वाणी, साफगोईएसपाट अंदाज और स्वाभिमानी प्रवृत्ति पवैया की राह के रोड़े हैं।ये पवैया वे ही भाजपा के नेता हैं जिन्हें हरवाने में जुटे स्थानीय प्रथक खेमे के भाजपा नेताओं की सीडी 2008 चुनाव में मीडिया की सुर्खियों में आई थी।2008 विधानसभा चुनाव में पवैया की हार ने उनके राजनैतिक कद को अप्रत्याशित रुप से नुकसान पहुंचाया।वे पहले राष्ट्रीय स्तर, फिर प्रदेश और आते आते ग्वालियर में भी पिछड़ते चले गए। हालत कुछ यूं रहे कि 1995 में मंदिर आंदोलन के अगुआ लालकृष्ण आडवाणी के साथ भाजपा के शीर्ष प्रखर हिन्दुत्व चेहरों में शुमार पवैया किनारे होते चले गए। पवैया लंबे समय तक भाजपा में किनारे रहे हैं। मप्र सरकार में दो साल पहले शामिल किए गए जयभान सिंह पवैया अब अपनी दूसरी पारी खेल रहे हैं। उच्च शिक्षा मंत्री के रुप में वे अब मप्र के कॉेलेजों और विश्वविद्यालयों को पटरी पर लाने मे जुटे हैं। मौजूदा प्रदेश सरकार में एकमात्र भगवा ब्रांड नेता होने से उनके समर्थक पवैया के दुबारा राजनीतिक क्षितिज पर पहुंचने की आस लगाए हुए हैं।

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