हिन्दी जगत में बनाई जाएं फतवा कमेटियाँ / राजीव रंजन प्रसाद

Posted On by & filed under राजनीति

मंगलेश डबराल प्रसंग हिन्दी साहित्य जगत के कूड़ाघर हो जाने की व्यथा कथा का उपसंहार है। यह पूरी घटना एक छटपटाहट का नतीजा है जो मेरी मुर्गी की एक टाग़ वाली प्रवृत्ति से निकली है और जिन्हें दो टाँगे दिख रही थी उन्हें भी फतवा-वितरकों ने जन्मान्ध घोषित करने के निबटा दिया। हिन्दी में रंगदारों… Read more »

वैचारिक अस्पृश्यता घातक / नरेश भारतीय

Posted On by & filed under राजनीति

नरेश भारतीय वैचारिक आदान प्रदान के लिए सहज तत्परता किसी भी सभ्य समाज की बौद्धिक क्षमता और उसकी व्यवहार परिपक्वता का परिचय होती है. इसके विपरीत, जहां ऐसी सहजता उपलब्ध नहीं होती वहाँ किसी भी व्यक्ति, परिवार, समाज और यहाँ तक कि देश के बौद्धिक स्तर का सम्यक मूल्यांकन भी संभव नहीं हो सकता. ऐसे… Read more »

वैचारिक बहस को वैचारिक ही रखे

Posted On by & filed under राजनीति

साक्षी श्रीवास्‍तव विचार में ताकत होती है और यह लोगों को सोचने और बदलने के लिए बाध्य करती है. हर युग में एक बौद्धिक वातावरण होता है. जो उस बौद्धिक वातावरण में एजेंडा तय करता है और विमर्श का नेतृत्व करता है उसे dominant ideology कहते हैं. भारत के वर्तमान परिपेक्ष्य में जब नई चुनौतियां… Read more »

मार्क्सवादियों को संघ सपने में क्यों आता है / विपिन किशोर सिन्हा

Posted On by & filed under राजनीति

राष्ट्रीय स्वंसेवक संघ निस्संदेह एक हिन्दू संगठन है. लेकिन उसके अनुसार हिन्दुस्तान में रहनेवाला हर व्यक्ति जिसकी निष्ठा भारत में है – हिन्दू है. कई मुसलमान भी इस संगठन से जुड़े हुए हैं. भारत के पूर्व रेल मंत्री श्री जाफ़र शरीफ़ ने लोकसभा में स्वीकार किया था कि वे कांग्रेस में आने के पहले संघ… Read more »

उदारता ही हमें बड़ा बनाती है / गिरीश पंकज

Posted On by & filed under राजनीति

बहुत पहले मैं भी यही सोचा करता था कि फलां जगह क्यों जाऊं? लोग क्या कहेंगे. लेकिन बाद में सोच बदली. मुझे लगता है कि लेखक को वर्जनावादी नहीं होना चाहिए. उसे उदारवादी सोच वाला होना चाहिए. उदारता ही हमें -या किसी को भी-बड़ा बनाती है.लेखक को हर मंच पर जा कर अपनी बात कहनी… Read more »

परिचर्चा : ‘वैचारिक छुआछूत’

Posted On by & filed under परिचर्चा

भारत नीति प्रतिष्ठान एक शोध संस्‍थान है। इसके मानद निदेशक हैं दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में प्राध्‍यापक श्री राकेश सिन्‍हा। श्री सिन्‍हा राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ से जुड़े हैं और संघ के संस्‍थापक डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार के जीवनीकार हैं। प्रतिष्‍ठान के बैनर तले विभिन्‍न समसामयिक मुद्दों पर संगोष्‍ठी का आयोजन वे करते रहते हैं। इसी क्रम में… Read more »

हर कोई गोलबंद है / चंचल चौहान

Posted On by & filed under राजनीति

चंचल चौहान ओम थानवी की टिप्पणी ‘आवाजाही के हक में’ (‘अनन्तर’, 29 अप्रैल) अगर हिंदी लेखक समुदाय में व्याप्त संकीर्ण रुझानों को लेकर पीड़ा व्यक्त करती, तो उसके मूल संवेदनात्मक उद्देश्य से असहमत होने की गुंजाइश नहीं होती। यह एक पवित्र उद्देश्य ही होता कि लेखक विचारधारा के आधार पर छुआछूत न बरतें, सौ तरह… Read more »

यह छुआछूत उनकी ही देन है / अवनिजेश अवस्‍थी

Posted On by & filed under राजनीति

 अवनिजेश अवस्थी ओम थानवी के ‘अनन्तर’ पर पता नहीं चंचल चौहान इतना क्यों भड़क गए। थानवी जी की टिप्पणी के केंद्रीय मंतव्य- ‘‘क्या हम ऐसा समाज बनाना चाहते हैं जिसमें उन्हीं के बीच संवाद हो जो हमारे मत के हों? विरोधी लोगों के बीच जाना और अपनी बात कहना क्यों आपत्तिजनक होना चाहिए? क्या अलग… Read more »

ताकि गर्द कुछ हटे / ओम थानवी

Posted On by & filed under राजनीति

ओम थानवी एक पाठक ने ‘आवाजाही’ पर चली बहस पढ़ने के बाद प्रतिक्रिया की: यह हाल तो तब है जब ‘अनन्तर’ कभी-कभार छपता है। ‘कभी-कभार’ की तरह निरंतर छपने लगेगा तब? पता नहीं। पर जो टिप्पणियां हमने छापीं, वे सब प्रतिनिधि प्रतिक्रियाएं नहीं थीं। एकाध को छोड़कर लोग आवाजाही के हक में ही जान पड़े।… Read more »

आवाजाही के हक में / ओम थानवी

Posted On by & filed under राजनीति

 ओम थानवी  इंटरनेट बतरस का एक लोकप्रिय माध्यम बन गया है। घर-परिवार से लेकर दुनिया-जहान के मसलों पर लोग सूचनाओं, जानकारियों, विचारों का आदान-प्रदान करते हैं, प्रतिक्रिया देते हैं। ब्लॉग, पोर्टल या वेब-पत्रिकाएं और सार्वजनिक संवाद के ‘सोशल’ ठिकाने यानी फेसबुक-ट्वीटर आदि की खिड़कियां आज घर-घर में खुलती हैं। गली-मुहल्लों, चाय की थड़ी या कहवा-घरों,… Read more »