आवाजाही के हक में / ओम थानवी

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 ओम थानवी  इंटरनेट बतरस का एक लोकप्रिय माध्यम बन गया है। घर-परिवार से लेकर दुनिया-जहान के मसलों पर लोग सूचनाओं, जानकारियों, विचारों का आदान-प्रदान करते हैं, प्रतिक्रिया देते हैं। ब्लॉग, पोर्टल या वेब-पत्रिकाएं और सार्वजनिक संवाद के ‘सोशल’ ठिकाने यानी फेसबुक-ट्वीटर आदि की खिड़कियां आज घर-घर में खुलती हैं। गली-मुहल्लों, चाय की थड़ी या कहवा-घरों,… Read more »

जनसत्ता का प्रगतिशीलता विरोधी मुहिम और के. विक्रम राव का सफेद झूठ / जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

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जगदीश्‍वर चतुर्वेदी जनसत्ता अपनी प्रगतिशीलता विरोधी मुहिम में एक कदम आगे बढ़ गया है. उसने के.विक्रम राव का जनसत्ता के 13मई 2012 के अंक में “न प्रगति न जनवाद, निपट अवसरवाद” शीर्षक से लेख छापा है। यह लेख प्रगतिशील लेखकों और समाजवाद के प्रति पूर्वग्रहों से भरा है। यह सच है राव साहब की लोकतंत्र… Read more »

अशोक वाजपेयी का मार्क्सवाद पर हमला, मार्क्सवादी चुप्‍प !

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जगदीश्वर चतुर्वेदी हिन्दी आलोचना में नव्यउदार पूंजीवादी चारणों के बारे में जब भी सोचता हूँ तो रह-रहकर अशोक वाजपेयी याद आते हैं। इन जनाब की भजनमंडली में ऐसे 2 दर्जन लेखक हैं। अशोक वाजपेयी की शिक्षा-दीक्षा अव्वल दर्जे की रही है, सरकारी पद भी अव्वल रहे हैं, उनके पास चमचे भी अव्वलदर्जे के रहे हैं,… Read more »

कम्युनिस्टों का असली चेहरा / विपिन किशोर सिन्हा

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कम्युनिज्म और कम्युनिस्ट विश्व मानवता के लिए खतरा ही नहीं अभिशाप हैं। इन कम्युनिस्टों ने अपने ही देशवासियों को यातना देने में नादिरशाह, गज़नी, चगेज़ खां, हिटलर मुसोलिनी आदि विश्व प्रसिद्ध तानाशाहों को भी मात दे रखी है। रुस के साईबेरिया के यातना शिविरों के किस्से रोंगटे खड़ा कर देनेवाले हैं। चीन में सांस्कृतिक क्रान्ति… Read more »

कम्युनिज्म की काली किताब

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शंकर शरण  अन्ना आंदोलन की बाढ़ में पश्चिम बंगाल से आती एक बड़ी खबर डूब-सी गई। बंगला मीडिया में वह खबरें ‘कंकालकांड’ के नाम से आई है। पूर्वी और पश्चिमी मिदनापुर जिलों में जमीन के नीचे थोक भाव से नरकंकाल मिले हैं। प्रारंभिक जाँच में ही दिखा कि यह मार्क्सवादी पार्टी द्वारा राजनीतिक विरोधियों की… Read more »

साम्यवाद का ढहता दुर्ग

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डॉ0 कुलदीप चंद अग्निहोत्री  रूस में साम्यवादी संरचना के नष्ट को जाने से ही यह स्पष्ट संकेत मिलने शुरू हो गए थे कि लगभग एक शताब्दी पूर्व किया गया यह प्रयोग न तो अपने उददे्श्य की पूर्ति कर पाया और न ही आर्थिक व सामाजिक समानता के इतिहास में कोई नया अध्याय लिख पाया। साम्यवाद… Read more »

जेएनयू की बौद्धिक संस्कृति

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शंकर शरण जब एक संवाददाता ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) की चार दशक की उपलब्धियों के बारे में प्रश्न पूछा, तो वहाँ के रेक्टर का प्रमुख उत्तर था कि अब तक सिविल सर्विस में इतने छात्र वहाँ से चुने गए। दूसरी कोई महत्वपूर्ण उपलब्धि वे गिना नहीं पाए जो समाचार में स्थान पा सकती। सरसरी… Read more »

नंदीग्राम का महत्व

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डॉ0 दिलीप अग्निहोत्री पश्चिम बंगाल में वामपंथियों ने नंदीग्राम को निशाने पर लिया था। यह भारत की सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक विरासत पर हिंसक प्रहार था। देर हुई, मगर अन्धेर नहीं हुआ। परिणाम सामने है। वामपंथियों का मजबूत किला खण्डर में बदल गया। मेरठ के बड़ौत में जैन मुनि प्रभासागर ने अनशन के माध्यम से ‘अहिंसा… Read more »

भारतीय वामपंथ के पुनर्गठन की एक प्रस्तावना / अरुण माहेश्‍वरी

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(”आत्मालोचना क्रियात्मक और निर्मम होनी चाहिए क्योंकि उसकी प्रभावकारिता परिशुद्ध रूप में उसके दयाहीन होने में ही निहित है। यथार्थ में ऐसा हुआ है कि आत्मालोचना और कुछ नहीं केवल सुंदर भाषणों और अर्थहीन घोषणाओं के लिए एक अवसर प्रदान करती है। इस तरह आत्मालोचना का ‘संसदीकरण हो गया है’।”(अन्तोनियो ग्राम्‍शी : राजसत्ता और नागरिक… Read more »

जनता को विचारधारा से नहीं, विकास से मतलब

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नीरज कुमार दुबे राष्ट्रीय राजनीति में तीसरे मोर्चे की अगुवाई करती रही मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी पिछले माह तक तीन राज्यों में सत्ता के बलबूते राष्ट्रीय राजनीतिक परिदृश्यों और मुद्दों को प्रभावित करने की क्षमता रखती थी लेकिन पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में उसे दो राज्यों से हाथ धोना पड़ा और वह अपने इतिहास के… Read more »