किताब तो छप गई मगर ………….

अब हमें कुछ किताबें अपने नज़दीकी रिश्तेदारों को भेजनी थीं, साहित्य जगत के उन वरिष्ठ लोगों को उपहार में भेजनी थीं जो हमें प्रोत्सहन देते रहे थे या फिर वो जिनके लेखन से हम प्रभावित थे, जिन्हे हमने किताबें भेजी उनमें से कुछ ने अतिरिक्त किताबों की मांग की तो हमने साफ़ कह दिया कि अतिरिक्त किताब तो उन्हे हमसे ख़रीदनी होगी।अब हमे ढेरों किताबें कोरियर से भेजनी थीं उपहार वाली भी और ख़रीद वाली भी।

bookकाफ़ी पत्रिकाओं मे छपने के बाद, डिटल मीडिया पर एक अच्छी जगह बना लेने के बाद, एकाध सम्मान मिल जाने के बाद, फ़ेस बुक पर मित्रता का आँकड़ा 5,000तक पंहुच जाने के बाद अगला पड़ाव तो पुस्तक का प्रकाशन हीहोना था।अब लगने लगा था कि अपनी एक किताब तो छप ही जानी चाहिये बिना किताब छपे लेखक लेखक कहाँ लगता है!
न हम कहानीकार हैं न व्यंगकार, न कवि, न निबंधकार, न लधुकथाकार और न उपन्यासकार।साहित्य की सभी विधाओं में हाथ डाल चुके हैं, संस्मरण यात्रा संस्मरण यहाँ तक कि पुस्तक समीक्षा भी लिख चुके हैं। सबसे पहले तो यह निर्णय लेना था कि पुस्तक किस विधा की प्रकाशित करवायें।अब भानुमति के पिटारे की तरह एक ही किताब में सभी विधाओं को छपवाना तो उचित नहीं लगा।

बाज़ार को देखें तो सबसे ज़्यादा उपन्यास बिकते हैं फिर कहानियाँ, उपन्यास तो नही पर कुछ कहानियाँ तो लिखीं थीं ,कुछ छोटी कुछ बड़ी पर इतनी नहीं थी कि एक पुस्तक छप सके। व्यंग और लेख अधिकतर सम सामयिक विषयों पर लिखे थे उन को हटा कर न इतने व्यंग्य बचते न लेख जिनसे पुस्तक बन सके।हमारी उम्र हो चुकी है पर तजुर्बा नहीं है, यहाँ तो 80-90पृष्ट के पेपर पैक भी खूब छपते ह जो किसी ट्रैवल एजैंसी के ब्रौशर जैसे दिखते हैं ,बुक शैल्फ़ मे खड़े रहने की भी ताक़त नहीं होती।हमें तो सुन्दर सी आकर्षक सी कम से कम 200 पृष्टों की पुस्तक छपवाने की चाह थी इसलियें कविता संग्रह छपवाने के अलावा कोई विकल्प बचा ही नहीं था।कविता के बाज़ार में हमेशा मंदी का आलम रहता है फिरभी हमने कविता संग्रह ही छपवाने का निर्णय लिया।

हमारे गुरु समान कुछ वरिष्ठ मित्रों ने हमें समझाया कि कविता आजकल कम बिकती है…….. हमने कहा कि आजकल क्या कविता तो हमेशा से कम बिकती है।हम तो निर्णय ले चुके थे, जब हमारी इस इच्छा का अंदाज़ वरिष्ठ मित्रो कोहुआ तो उन्होने हमें बहुत प्रोत्साहित भी किया।प्रकाशक आसानी से मिल गये पर आधी पस्तकों को हमें उनसे ख़रीदकर बेचना था, आधी पुस्तकें उन्हे बाज़ार में उतारनी थीं।हम जानते थे कि कविता संग्रह आजकल बड़े बड़े कवि नहीं छपवा पा रहे हैं जब तक कि वो किसी सरकारी पद पर आसीन नहों तो, हमें अपनी इच्छा या यों कहें अंतिम इच्छा पूरी करने के लिये कुछ राशि का पर जोखिम उठाना ग़लत नहीं लगा।

कुछ महीनों में हमारी और प्रकाशक की कड़ी महनत के बाद किताब छपकर तैयार होगई, किताब बहुत आकर्षक छपी थी,कभी हम किताब देखते तो कभी उसपर छपा अपना नाम।हमने साहित्य जगत के कुछ मित्रों और पारिवारिक मित्रों के साथ पुस्तक का लोकार्पण भी कर दिया, सभी को हमने पुस्तक भेंट की , इसके बावजूद बहुत सारे लोगों ने अतिरिक्त प्रतियाँ हमेसे ख़रीद भी ली औरों को उपहार में देने के लियें।हम बेहद ख़ुश थे।

अगले दिन लोकार्पण के चित्रों के साथ हमने अपवी पुस्तक का संक्षिप्त विवरण फ़ेसबुक पर भी डाल दिया हमें लगा कि 5000 मित्रों में से बहुत से लोग पुस्तक ख़रीदने में रुचि दिखाँयेगे , इसके अलावा हमारे पास फौलोअर्स भी हैं जोकि विशेषकर हमारे लेखन या यों कहें कि कविताओं की वजह से ही हमसे जुड़े थे पर ये क्या………. वहाँ तो लाइक्स और बधाई के अलावा कुछ था ही नहीं!केवल दोतीन लोगों ने पुस्तक ख़रीदने की इच्छा व्यक्त की। फोन भी आये ई मेल भी आये बधाइयाँ झोली भर भर के मिलीं।अब हमने फेसबुक मित्रों की संख्खा 3000 के नीचे पंहुचा दी है और 500 तक पंहुचाने का लक्ष्य है।

हमने अपनी सोसायटी से भी दो तीन पड़ौसियों को लोकार्पण में बुलाया था उन्हे किताब बहुत पसन्द आई पर प्रचार करने की बजाये उन्होने वही किताबें पूरी सोसायटी में घुमा दीं, शायद अभी भी घूम रही हैं!
अब हमें कुछ किताबें अपने नज़दीकी रिश्तेदारों को भेजनी थीं, साहित्य जगत के उन वरिष्ठ लोगों को उपहार में भेजनी थीं जो हमें प्रोत्सहन देते रहे थे या फिर वो जिनके लेखन से हम प्रभावित थे, जिन्हे हमने किताबें भेजी उनमें से कुछ ने अतिरिक्त किताबों की मांग की तो हमने साफ़ कह दिया कि अतिरिक्त किताब तो उन्हे हमसे ख़रीदनी होगी।अब हमे ढेरों किताबें कोरियर से भेजनी थीं उपहार वाली भी और ख़रीद वाली भी। कई लोगों ने किताब मिलने की सूचना दी कई चुपचाप बैठ गये। अब किसे किताब मिली किसे नहीं कभी नैट पर चैक करते कभी लोगों को फोन करके पता करते ।जिन्होने किताबें ख़रीदीं उनको पैसे देने की याद दिलाते तो वो हमसे ऐसे पेश आते हैं मानो हमी ने कुछ उधार लिया हो!अभी तक भी कुछ किताबों के पैसे भेजने की याद दिला रहे हैं!इधर एक और काँड हुआ कि हमारे सात कोरियर ग़ायब होगये जिनका कोई सुराग नहीं मिल रहा।कोरियर कंपनी वाले भी मुफ्त ख़ोर पाठक होंगें ये नहीं सोचा था। क्या कभी इतने सारे कोरियर एक साथ ग़ायब होते हैं!वो फोन नहीं उठाते हैं, मेल के बेतुके जवाब देते हैं और हम धमकी देते हैं।अब हम इस चक्कर से थक चुके हैं और बेचने की ज़िम्मेदारी अमेज़न पर डाल दी है।अमेज़न तो बहुत बड़ी नदी है हमारी एक एक किताब को बहा कर शायद सागर(पाठक )तक पंहुचा दे!
अब ‘मैं सागर में एक बूँद सही’हमारी बुक शैल्फ के एक ख़ाने में समा गई है जो बहुत बड़ा नहीं है!

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