अहम सवाल- जिन्दगी जैसी है वैसी क्यों हैं

गंगानन्द झा
रचना (यहाँ टाइप या पेस्ट करें): एक किताब मिली। The Vital Question. Why life is the way it is. लेखक हैं Nick Lane । (अहम सवाल, जिन्दगी जैसी है वैसी क्यों है। )
मैं जीव-विज्ञान का छात्र रहा हूँ।मैंने सीखा कि प्रोटोप्लाज्म जीवन का भौतिक आधार है। मैंने सीखा कि पदार्थ के एक विशेष स्वरूप एवम् स्तर तक संगठित होने के फलस्वरूप सम्भव हुआ है।मैंने सीखा कि पदार्थ के संगठित होने और रहने के लिए ऊर्जा की अनवरत आपूर्ति की जरुरत रहा करती है। और यह कि संगठित पदार्थ की स्वाभाविक रुझान ऊर्जा के बिखराव की ओर होती है। मैंने सीखा कि बिखराव के नतीजे में संगठन का वह स्वरूप और स्तर विगठित होता है तो जीवन समाप्त हो जाता है। मैंने सीखा कि जीना सम्भव हो पाता है क्योंकि जीव अपने परिवेश के साथ ऊर्जा और पदार्थ का अविच्छिन्न प्रवाह बनाए रखता है। मैंने सीखा कि जीव और परिवेश परस्पर को रुपान्तरित करते रहते हैं। ऊर्जा का विस्तार जीव के शरीर के सूक्ष्मतम कण से परिवेश में अनंत तक अविच्छिन्न सूत्र में प्रसारित है।
मैंने सीखा कि धरती पर जीवन के सम्भव हो पाने में संयोग की महत्वपूर्ण भूमिका है। धरती से सूरज की खास दूरी तथा अभिविन्यास के कारण पानी का तरल अवस्था में धरती पर रह पाना सम्भव हुआ। साढ़े चार अरब साल पहले वह विस्मयकारी घटना हुई जिसके नतीजे में जीवन का प्रादुर्भाव धरती पर हुआ. उसके बाद प्राकृतिक वरण (Natural Selection) द्वारा क्रम-विकास की प्रक्रिया के जरिए विविधता से भरे प्राणी जगत का विस्तार होता रहा है। 
जीन, परिवेश और संयोग से होनेवाली घटनाएँ हमारे जीव-विज्ञान को नियन्त्रित करती हैं। मैंने सीखा कि लगभग सभी जीव, अपने बीच तथा भौतिक परिवेश के साथ पदार्थ एवम् ऊर्जा की अनवरत शृंखलाओं और जाल का संचालन करते रहते हैं, फलस्वरुप सभी जीवों का अस्तित्व एक दूसरे के साथ गूँथा हुआ होता है। और यह उपग्रह सम्पूर्णता में एक जीवमंडल है। यह स्वयंधारी (self sustaining) तंत्र है। विभिन्न प्रजातियाँ एक दूसरे को तथा परिवेश को रुपान्तरित करती रहती हैं।, नतीजतन परिवेश मौजूदा प्रजातियों के लिए प्रतिकूल हो जाता है और नई प्रजातियों के पनपने के लिए अनुकूल हालात बनते रहते हैं।अनुक्रमण (succession) चलता रहता है।
मैंने सीखा कि हम वही हैं जो हमारा डीएनए है. इसका तात्पर्य है कि हमारी नियति हमारे जीन्स में सन्निहित हैं और हम उनके सामने बेबस हैं। इसे अनुवंशिक नियतिवाद (Genetic Determinism) कहा जाता है। यह वह क्रियाविधि है जिसके जरिए जिन्स पर्यावरण के सहयोग से जीव के शारीरिक और क्रियाविधि सम्बन्धी आचरण निर्धारित करते हैं। इसका मानना है कि जीन्स जीव विज्ञान का नियन्त्रण करते हैं।इसका मतलब हुआ कि हमारे जीव विज्ञान के नियन्त्रण में हमारी कोई भूमिका नहीं होती क्योंकि अपनी जेनेटिक अक्षय निधि का निर्धारण हम नहीं करते। इसलिए ऐसा मानना गलत नहीं होगा कि व्यक्ति अपनी आनुवंशिकता का शिकार होता है। आनुवंशिकता के युग के प्रारम्भ होने के साथ ही हमारे विश्वास की प्रोग्रामिंग ऐसी हो गई है कि हम मानने लगे हैं कि हम अपने जीन्स के अधीनस्थ होते हैं। जीन द्वारा नियन्त्रित हमारे लक्षणों की अभिव्यक्ति एंजाइम्स द्वारा नियन्त्रित रासायनिक प्रतिक्रियाओं की शृंखलाओं के जरिए होती है।एंजाइम प्रोटिन अणु होते हैं। इन अणुओं का संश्लेषण जीन(डीएनए) द्वारा निर्देशित और नियन्त्रित होता है। इसी तरह जीन हमारे लक्षणों की अभिव्यक्ति का निर्धारण करते हैं। पर्यावरण की भूमिका रासायनिक प्रतिक्रियाओ के लिए आवश्यक पदार्थ एवम् माध्यम उपलब्ध कराने से सम्बन्धित है। इस तरह पर्यावरणीय संकेत आनुवंशिक सन्देश का लिप्यान्तर और अनुवाद करते हैं। प्राकृतिक वरण पर्यावरण के द्वारा प्रस्तुत समस्याओं को कुशलता से सुलझा लेना नहीं हुआ करता: बल्कि इसके विपरीत जीव एवम् पर्यावरण सक्रिय रूप से परस्पर एक दूसरे को तय करते हैं। हमारे जीन्स में वे सन्देश अन्तर्निहित हुआ करते हैं जो परिवेश से आनेवाले प्रभावों के द्वारा अभिव्यक्त होते हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि हमारी नियति हमारे जीन्स निर्धारित करते हैं।
हमने जाना कि सामान्यतः जीव प्रजनन-आयु( Reproductive age) समाप्त होने के बाद मर जाते हैं। । मनुष्य इसका अपवाद है क्योंकि मनुष्य में शिशु के स्वनिर्भर होने में अतिरिक्त समय लगता है . मानव शिशु को देखभाल की सघन आवश्यकता होती है। सभ्यता और संस्कृति में प्रगति होने के बाद से यह अवधि और भी लंबी हो गई है। इसलिे मनुष्य की उत्तरजीविता(longevity) बढ़ी है।

एक अन्य किताब मिली । The Biology of Belief। मुझे यह भी पढ़ने को मिला कि परिवेशीय संकेत जीन्स को रुपान्तरित कर देते है। इसलिए जीन्स को अपनी नियति बताना सही नहीं होगा। परिवेशीय संकेत हमारी जीन्स को रुपान्तरित कर हमारी नियति को नियन्त्रित करते हैं। हमारे विचार भी परिवेशीय संकेत ऊर्जा तरंगों के रुप में हमारे जीन्स को रुपान्तरित करने में सक्षम होते हैं।
नवीन जीव विज्ञान प्राणी परिवेश समष्टि को एक समन्वयित सम्पूर्ण मानता है। यह उत्तरजीविता(Logevity) के लिए व्यक्तियों के बीच प्रतियोगिता और संघर्ष की डार्विन की अवधारणा को त्यागकर प्रजातियों के बीच सहयोग की लैमार्कियन अवधारणा को मान्यता देता है। पर्यावरणीय संकेत जीन्स को रुपान्तरित करते हैं। हमारे विचार, ऊर्जा संकेत बनकर हमारे जीन्स को रुपान्तरित करते हैं। ऐसा कहा जाना चाहिए कि सूक्ष्म मन स्थूल शरीर को प्रभावित करता है,।
मेरी यह सारी सीख यह तो बताती है, बताने की कोशिश करती है कि ज़िंदगी कैसी है, पर यह नहीं बताती कि ऐसी क्यों है।
इस समझ ने जीवन के सम्बन्ध में मेरी दृष्टि को सीमाबद्ध किया है। इस नजरिए में दैवी विधान के लिए गुंजाइश नहीं है। फिर भी काकतालीय घटनाओं की व्याख्या करने में कठिनाइयाँ सवाल और सन्देह पैदा करती हैं।क्या वे महज इत्तिफाक से होनेवाली घटनाएँ हैं या उनके पीछे एक अदृश्य योजना है, ऐसे सवाल रह ही जाते हैं। जीवन जैसा है, वैसा क्यो है? क्या जीवन का कोई उद्देश्य है? क्या कोई सत्ता है जो ब्रह्माण्ड में होनेवाली सारी घटनाओं का नियन्त्रण किया करता है? क्या जीवन का कोई उद्देश्य है? क्या धरती की उत्पति और विकास के क्रम में इत्तिफाक से जीव-जगत का उदय हुआ है?जीवन जैसा है वैसा क्यों है?
रवीन्द्रनाथ ठाकुर जीवन को आनन्द का समारोह कहते हैं। उनका मानना है कि यह समारोह विधाता (प्रकृति) द्वारा आयोजित है विधाता इस आयोजन के माध्यम से जीवन की सम्भावनाओं का अवलोकन किया करता है। कवि ने जीवन और सृष्टि के विस्मयकारी रुप, और सम्भावनाओं को समझने के लिए विधाता को एक रूपक की तरह सामने खड़ा किया है। वे व्यक्ति के अस्तित्व और चेतना को विश्व ब्रह्माण्ड में विसरित मानते हैं। एकात्म बोध होता है। अपनी सीख से बनी समझ के धरातल पर मैं कवि के विधाता को रूपक की सत्ता में ही समन्वयित कर पाता हूँ।
रामकृष्ण मिशन के संन्यासी समर्पण की किताबों को पढ़ा। इन किताबों में आत्मा, परमात्मा, लोक परलोक की चर्चा नहीं है, पाप, पुण्य की भी नहीं। इस जीवन की ही चर्चा है।बिखरी हुई ऊर्जा के पैटर्नयुक्त संगठित ऊर्जा में रुान्तरित होने की चर्चा है। इन पुस्तकों ने “The Vital Question”. It asks – Why is the life the way it is? “ज़िंदगी जैसी है, वैसी क्यों है” के अहम सवाल के साथ जूझने में मेरी सहायता की है।मेरी मुझे समर्पण के वक्तव्य को अपनी सीख की समझ के आधार पर समझने में सुविधा हुई।
Tia, a parrot’s journey home का नायक टिया की आकांक्षा की ताड़ना उसे अपने समाज के निश्चित, सुरक्षित स्थिति से अलग होकर अजाने की ओर प्रेरित करती है और वह निकल पड़ता है अजाने के आकर्षण में बँधा हुआ। वह आराम करने के लिए एक स्थान की तलाश मे है। खत्म नहीं होनेवाला सफर एक स्थिति से दूसरी स्थिति तक ले जाया करता है. हम रोते और हँसते है, कुछ और भी पाना चाहते हैं, नए अवश्यम्भावी तक पहुँचते हैं, नए प्राणियों से मिलते हैं, और सफर जारी रहता है. यह प्रसंग जैव वैज्ञानिक Albert Szent- Gyorgyi, के इस उद्धरण के अनुरूप है, “जीवन कुछ नहीं है सिवाय उस एक एलेक्ट्रॉन के, जो आराम करने के लिए स्थान की तलाश में है।”
कहानी के अन्त में टिया अपने स्थान तक पहुँच जाता है, रास्ते मे उसे लगातार कष्ट, अनिश्चितता, खतरे और मौत से जूझते रहना पड़ा। यह कहानी मेरे जीवन के अनुभवों से मेल रखती है।
समर्पण की दूसरी किताब जंगलज़ेन शेरु उस जंगल के जानवरों की कहानी बुनता है जिसके राजा शेर के सपरिवार की मौत से जंगल अस्तव्यस्त हो गया है। यह कहानी मेरी चेतना के बायोस्फियर और इकोसिस्टम (Biosphere and Ecosystem) के प्रारुप मे है। यह किताब बतलाती है कि हर प्रजाति का अनोखापन होता हैष उसकी पहचान खो जाए तो पूरे तंत्र पर अस्तित्व का संकट उत्पन्न होता है। विभिन्न जीवों के बीच समानता की बात करना गलत होता है। सही बात है कि हर प्राणी, हर व्यक्ति के अनोखेपन की पहचान स्थापित और सम्मानित होनी चाहिए।
शृंखला की अगली कड़ी है Carving a sky अपना आसमान तराशना।विमर्श की शुरुआत की जाती है मनुष्य की दो विशिष्टताओं की चर्चा से। हर जीव एक निर्दिष्ट स्थान का अधिकारी होता है। मनुष्य अकेला ऐसा प्राणी है जिसकी आकांक्षा और कोशिश रहती है कि अपने स्थान का विस्तार करे। इसलिए वह अपनी बिना पैटर्न की ऊर्जा को पैटर्नयुक्त ऊर्जा में उन्नत करता रहता है। इस प्रक्रिया से उसकी वृद्धि होती है, वृद्धि उसको सीमाओं से मुक्त करती है और वह अधिक स्थान का अधिकारी होता है।

आकांक्षाएँ, आदर्श और मूल्य बिना पैटर्न की ऊर्जा को वृद्धि में रुपान्तरित करती हैं। जब कोई व्यक्ति किसी आदर्श के साथ बँधा रहता है, तब वह अपने अन्दर काफी ऊर्जा उत्पन्न कर सकता है, जिसके नतीजे में वह विकसित होता है। बिखरी हुई, बेतरतीब ऊर्जा वृद्धि द्वारा पैटर्नयुक्त ऊर्जा में उन्नत होती है। व्यक्ति प्रज्ञ होता है।
अहम सवाल के जवाब तो नहीं मिला है।

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