ज्वार उठाना होगा, मस्तक कटाना होगा

कवि आलोक पाण्डेय

समर की बेला है
वीरों अब संधान करो,
शत्रु को मर्दन करने को,
त्वरित अनुसंधान करो |

मातृभू की खातिर फिर
लहू बहाना होगा;
ज्वार उठाना होगा,
मस्तक कटाना होगा|
सिंहासन की कायरता से ,
संयम अब डोल रहा
चिरस्थायी संस्कृति हित ,
कडक संघर्षों को खोल रहा|
अखिल विश्व की दिव्य मनोरथ,
अधरों में अब डोल रहा,
लुट रही मानवता नित-क्षण
लंपट सदा कायरों की भाषा
बोल रहा|

वीरों को आगे आना होगा,
संघर्ष शिवाजी सा –
सतत् बढाना होगा
आतंक भगाना होगा,
जिहाद मिटाना होगा |
उठो! अमर सपूतों,
और एक बार
मस्तक कटाना होगा,
भारत बचाना होगा
समृद्धि लाना होगा !

अखंड भारत अमर रहे !

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