अनावश्यक देश के गले पड़े अविश्वास और राहुल

प्रवीण गुगनानी

देश को और उसकी संसद को एक अनावश्यक अविश्वास प्रस्ताव में झोंका गया. अनावश्यक अंकगणित की दृष्टि से नहींक्योंकि संसदीय लोकतंत्र में अंकगणित से इतर होकर अविश्वास प्रस्ताव को जागरण का एक प्रयास भी माना जाता है. जागरण सरकार काविपक्ष काजनता का और मुद्दों का भी. कांग्रेस की काड़ीबाजी से आन्ध्र की तेलगु देशम पार्टी द्वारा लाया गया गत सप्ताह का चर्चित अविश्वास प्रस्ताव अंकगणित की दृष्टि से तो थोथा था हीमुद्दों व संसदीय जागरणजनता जागरण या विपक्ष जागरण की दृष्टि से भी निरा खोखला सिद्ध हुआ गत लोकसभा चुनाव में जब तेलगु देशम पार्टी नरेंद्र मोदी नेतृत्व वाले राजग में सम्मिलित हुई व तत्पश्चात नमो सरकार में भी भागीदार रही और उसके बाद उसने राजग से नाता तोड़ा तब से लेकर अब तक तेदेपा राजग से अलग होने के अपने एजेंडे को न तो स्वयं समझ पाई है और न ही अपने कार्यकर्ताओं व जनता को समझा पाई है. राजग से हुए अपने तलाक के बाद उपजी पीड़ा व खीझ को मिटाने की दृष्टि मात्र से तेदेपा यह अविश्वास प्रस्ताव लाई और लोस में मात्र आधा सेकड़ा सदस्यों में सिमट गई कांग्रेस ऐसे किसी विघ्नसंतोषी प्रयास को हाथों हाथ लेनें को तैयार बैठी ही थी बस यही पृष्ठभूमि है इस अविश्वास प्रस्ताव की.

         इतिहास में जब जब भी नमो सरकार के विरुद्ध लाये हुए इस पहले अविश्वास प्रस्ताव की चर्चा होगी तब तब भी यह स्मरण किया जाएगा की देश जब संसद से एक गंभीर चर्चाविमर्श व मंत्रणा की आशा कर रहा था तब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी एक बेहद बचकाना आचरण के साथ प्रस्तुत हुए और उनके बोलने से पूर्व व पश्चात हुई संसदीय चर्चा को ग्रहण लगा गए. अविश्वास प्रस्ताव के दौरान राहुल गांधी के हाव भाव एक राजकुमार की भांति थे. इससे भी आगे बढ़कर एक लम्पट राजकुमार की तरह ही उन्होंने भारतीय संसद को चौपाटी समझकर संसद में आंखे मारने जैसा अशोभनीय कृत्य भी किया! निस्संदेह इस दिन लोस में राहुल ने जो किया उसकी पूर्व तैयारी व योजना वे घर से करके ही आये थे. वे प्रधानमंत्री जी को नफरत की राजनीति वाला व स्वयं को प्रेम की राजनीति वाला राजनीतिज्ञ सिद्ध करने की नौटंकी बनाकर आये थे. गांधी परिवार के इस वंशज की इस नौटंकी को पुरे देश ने देखा व आज इस दृश्य को शब्दों में व्यक्त किया जाना आवश्यक नहीं हैकिंतु भविष्य की दस्तावेजी दृष्टि से राहुल गांधी की समूची हरकत को शब्दों में व्यक्त करना आवश्यक है अतः लिख रहा हूं. इस अविश्वास प्रस्ताव पर अपने भाषण में राहुल ने कुछ सटीक मुद्दों को भी समेटा किंतु अधिकांशतः वे नाटकीयता से भरे रहे. इस नाटकीयता में वे राफैल सौदे पर बोलते समय संसदीय सीमाओं को भी लांघ गए जिसे विशेषाधिकार के हनन वाला कहा गया. राहुल गांधी ने यह भी कहा था की उनकी फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों से बात हुई थी और उन्होंने इस ख़रीदारी में किसी भी तरह की गोपनीयता से इनकार किया था. देश की संसद में हुई चर्चा के में राहुल के इस व्यक्तव्य के बाद तुरंत ही फ़्रांस की सरकार का व्यक्तव्य आ गया कि दोनों देशों के बीच 2008 में एक समझौता हुआ था, जिसमें सुरक्षा से जुड़ी सूचना में गोपनीयता बरतने की बात है और रफ़ायल लड़ाकू विमान की ख़रीदारी में भी यह लागू होता है. भारतीय संसद में रखी हुई राफैल के विषय में राहुल की बात को फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने सिरे से नकार दिया. पुनः कहना ही होगा कि इस दिन राहुल स्वयं को शहजादे से कम कतई नहीं समझ रहे थे. लोस में भाषण समाप्त करने के बाद राहुल तेजी से पंतप्रधान की आसंदी के समीप आये! आकरअपनी उंगलियों सेहाथों से प्रधानमंत्री जी को संकेत करने लगे और कहने लगे get up –get up; खड़े हो जाओ!! इस पर हतप्रभ प्रधानमंत्री जी पूछते हैंक्या बात है?! यह युवक प्रम को पुनः संकेत में भी और शब्दों से भी कहता हैखड़े हो जाओ!! चाय बेचने वाले से प्रम बना प्रेरणा पुरूष तब भी खड़ा नही होता हैतब यह शहजादा राहुल गांधी अपने पिता की आयु से भी बड़े प्रधानमंत्री जी को जबरन गले लगाने का प्रयास करते हुए उनके गले पड़ जाता है! एक प्रचारक से प्रधानमंत्री बना व्यक्ति इतने पर भी विचलित नही होता और उस जाते हुए शहजादे को पुनः समीप बुलाकर उसकी पीठ स्नेह से थपथपा देता है। भारत मे कभी लोकतंत्र का गला घोंटने वाले परिवार का यह वंशज यही नहीं रुकता!! वह फिर अपनी सीट पर जाता है और अपने समय के समाप्त होने व अपना भाषण समाप्त होने के बाद भी संसद में पुनः भाषण देने का कुप्रयास करने लगता है। पुरे देश को स्पष्ट आभास हुआ, लगा किक्या ये लोग भारत के लोकतंत्र कोसंसद कोप्रधानमंत्री के पद कोलोस अध्यक्ष को अपनी जागीर समझने के लतीआदती नहीं हो गए हैं?! 
संसदीय परंपराओं को समझना न समझना एक अन्य बात हो सकती हैप्रशिक्षण का विषय भी हो सकता हैकिंतु केवल नौटंकी करने हेतु इतनी सारी स्थापित संस्थाओं को एकसाथ ताक पर रखना और उनकी घोर अवहेलना करना पुरे देश को बहुत बुरा लगा। संसदीय परम्पराएं अपने स्थान पर हैकिंतु संसद की इस घटना से तो भारत की सामान्य सामाजिक व्यवहार परम्परा व ज्येष्ठ  सम्मान की परंपरा भी चोटिल हो गई !!!यह कहा जा सकता हैकिस्वयं को पता नहीं क्या सिद्ध करना चाह रहे थे राहुलबहरहाल आयुपदअनुभव हर दृष्टि से कनिष्ठ राहुल गांधी का स्वयं से अतीव गुरुतरज्येष्ठअनुभवी व प्रधानमंत्री की आसंदी पर विराजे नरेंद्र मोदी को गेट अप – गेट अप कहकर उठाने का प्रयास करना,भारतीय संसदीय इतिहास का एक शर्मनाक अध्याय ही सिद्ध होगा. 

        इस अविश्वास प्रस्ताव के संदर्भ में जहां भाजपा की पुरानी साथी शिवसेना ने अपने अस्थिर आचरण से भाजपा संग आँख मिचौली का अपना खेल जारी रखकर भाजपा को साथ भी दिया और छकाया भी वहीँ अविश्वास प्रस्ताव पर बहस शुरू होते ही बीजू जनता दल (बीजद) के सदस्यों ने सदन से वॉकआउट करके राजग के नए विस्तार की संभावनाओं को भी जन्म दे दिया है. इस दृष्टि से 2019 की पटकथा भी लिखी जानी प्रारंभ हो गई है जिसमें नवीन पटनायक नए नितीश कुमार बनकर उभरतेआते दिखाई दे रहे हैं. भाजपा और बीजद के बीच समझौते के चर्चे बिहार में तख्तापलट के बाद ही गर्म हो गए थे. लेकिन दोनों पार्टियों की घटती दूरियों के बारे में अटकलबाज़ी तभी से शुरू हो गई थी जब एनडीए द्वारा राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार के रूप में रामनाथ कोविंद के नाम की घोषणा होने के दो घंटों के अंदर नवीन पटनायक ने उनके लिए समर्थन की घोषणा कर दी थी.

              प्रधानमंत्री के रूप में अपना भाषण करते हुए नरेंद्र मोदी जीएसटी, सप्रंग सरकार द्वारा अपने कार्यकाल के अंतिम वर्षों में निर्ममता से बांटे गए बैंक लोन, सप्रंग सरकार के  घोटालों आदि पर चर्चा करते व  सप्रंग सरकार की नाकामियों पर सतत चोट करते नजर आये. यह अवश्य था कि नरेंद्र मोदी का व्यवहार व मुखमुद्रा पहले की अपेक्षा कुछ बदली बदली और चिंताग्रस्त थी, किंतु उनकी इस चिंतित मुखमुद्रा को भी राहुल गांधी की कथित नौटंकी के बाद तुरंत राहत मिल गई व वे अपने चुस्त शिकारी व संवेदनशील प्रशासक वाले रूप में त्वरित ही लौट आये. नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में तेदेपा को संबोधित करते हुए पूर्व प्रधानमन्त्री अटल बिहारी वाजपेयी को स्मरण किया. कहाकि जब अटल जी के प्रधानमंत्रित्व में राज्यों का विभाजन कर झारखंड, उत्तराखंड व छत्तीसगढ़ राज्यों का निर्माण किया गया तब वह गठन इतना सुव्यवस्थित, सुगठित, सामंजस्यपूर्ण व संवेदनशीलता से भरा हुआ था कि बाद में कभी इन नवगठित राज्यों व इनके उद्गम के मध्य संसाधनों को लेकर तनिक सा भी विवाद नहीं उभरा. वहीँ जब कांग्रेस ने आंधप्रदेश का विभाजन कर तेलंगाना राज्य को बनाया तो उसने इस कार्य में घनघोर लापरवाही व तदर्थता का व्यव्हार रखा. कांग्रेस तेलंगाना निर्माण के समय अपने क्षुद्र स्वार्थ देखे, व्यक्तिगत लाभ-हानि देखी गई, परस्पर व्यवस्थित चर्चाएँ भी नहीं होने दी गई और यहाँ तक की जब आंध्र का विभाजन प्रस्ताव संसद में लाया गया तो संसद न तो व्यवस्था सम्मत थी और न ही इस प्रस्ताव हेतु विधिवत तैयार थी. तब संसद के दरवाजों को बंद करके भारी अव्यस्थाओं के मध्य आनन फानन में आंध्र का विभाजन किया गया,इसी का परिणाम है कि आज भी तेलंगाना व आंध्रप्रदेश के मध्य के विवाद नहीं सुलझ रहें हैं.   प्रधानमंत्री ने आंध्र के लोगों को विश्वास दिलाते हुए कहा कि केंद्र सरकार आंध्र की जनता के कल्याण में पीछे नहीं रहेगी और कोई कसर नहीं छोड़ी जायेगी. आपने भारत और पाकिस्तान का विभाजन किया और आज भी हम मुसीबत झेल रहे हैं. आंध्रप्रदेश का भी ऐसा बंटवारा किया कि अब भी संसाधनों का विवाद चल रहा है. हमारी एनडीए सरकार वचनबद्ध है आंध्रप्रदेश और तेलंगाना के विकास में कोई कमी नहीं आएगी.

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