ईवीएम के हटते ही क्या निष्पक्ष हो जाएंगे चुनाव?

राजू पाण्डेय

ईवीएम की विश्वसनीयता का प्रश्न विश्व के सर्वाधिक विशाल लोकतंत्र के सवा सौ करोड़ नागरिकों के जीवन की दशा और दिशा तय करने वाले आम चुनावों की निष्पक्षता से जुड़ा हुआ है। इसलिए राजनीतिक दलों और चुनाव आयोग से इस विषय पर अधिक गंभीरता, संवेदनशीलता और तत्परता की अपेक्षा करना देश के नागरिकों का अधिकार है। किंतु तद्विषयक विमर्श निराशाजनक रूप से राजनीतिक स्वार्थसिद्धि और प्रशासनिक हठधर्मिता की बढ़ती प्रवृत्तियों का एक उदाहरण बन कर रह गया है। राजनीतिक दलों का विरोध प्रतीकात्मक अधिक है और वे इस मुद्दे पर जनांदोलन खड़ा करने के अनिच्छुक लगते हैं। उनकी इस मनोदशा के कारण आरोप-प्रत्यारोपों के उस सिलसिले को प्रामाणिक मानने को जी करता है जो यह स्थापित करता है कि ईवीएम का दुरुपयोग कोई नई बात नहीं है और यह भारतीय मतदाता को मूर्ख बनाने की अनेकानेक युक्तियों में से एक है। यदि भाजपा पर उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनावों में ईवीएम के दुरुपयोग का आरोप है तो कांग्रेस की 2009 की अप्रत्याशित जीत को भी ईवीएम की गड़बड़ियों से जोड़ कर देखा जाता रहा है। कांग्रेस की इस जीत के बाद बाद जी वी एल नरसिम्हा राव ने डेमोक्रेसी एट रिस्क! कैन वी ट्रस्ट अवर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन्स(2010) नामक पुस्तक की रचना की जिसकी भूमिका देश के प्रधानमंत्री बनने का भग्न स्वप्न लिए लाल कृष्ण आडवाणी ने लिखी थी। 3 सितंबर 2009 को  सुब्रमण्यम स्वामी(तब वे भाजपा में नहीं थे) ने निर्वाचन सदन में एक सॉफ्टवेयर विशेषज्ञ वी हरिप्रसाद की सहायता से यह सिद्ध करने का प्रयास किया था कि ईवीएम से छेड़छाड़ हो सकती है। किंतु स्वामी के कथनानुसार ईवीएम निर्मात्री ईसीआईएल और बीईएल की बौद्धिक संपदा उल्लंघन की आपत्तियों के बाद हरिप्रसाद को अपना प्रयोग पूरा करने नहीं दिया गया और बाद में उनकी इसी सिलसिले में गिरफ्तारी भी हुई। स्वामी बताते हैं कि इन दोनों कंपनियों ने पेरिस स्थित वर्ल्ड इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी आर्गेनाइजेशन में 2002 में इस मशीन के पेटेंट के लिए आवेदन दिया अवश्य था किंतु 2006 में यह विश्वास होने के बाद कि इनका आवेदन निरस्त हो जाएगा, इन्होंने इसे वापस भी ले लिया था। इनके पास ईवीएम का पेटेंट नहीं है।
हाल के वर्षों में संवैधानिक संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर प्रश्न चिन्ह लगाने की प्रवृत्ति बढ़ी है और इन संदेहों का निवारण करने के लिए यह संस्थाएं दृढ़ता के स्थान पर हठधर्मिता का सहारा लेती रही हैं एवं अपारदर्शिता को पवित्रता की रक्षा के लिए आवश्यक मानती रही हैं। जब विधि और संविधान के अधीन कार्य करने वाली संस्थाएं अपने निर्णयों को आत्मपूर्ण और तर्कातीत मानने लगें तो यह समझा जा सकता है कि इनमें गिरावट की शुरुआत हो चुकी है।  यूपीए के जमाने में हरिप्रसाद की गिरफ्तारी के लिए दबाव बनाने वाले और आज भाजपा नीत एनडीए के युग में ईवीएम को बिना सम्यक चर्चा और सार्वजनिक परीक्षण के क्लीन चिट देने वाले चुनाव आयोग की मानसिकता अपरिवर्तित रही है। चाहे चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली संदेहों को जन्म देने वाली हो अथवा चुनाव आयोग पर लगाए जाने वाले आक्षेप राजनीति से प्रेरित हों – दोनों ही स्थितियां लोकतंत्र हेतु घातक हैं।
आज जब हम ईवीएम की आलोचनाओं में व्यस्त हैं तब हमें मतपत्र युग के उत्तरप्रदेश और बिहार के उन चुनावों की याद भी करनी चाहिए जब बूथ कैप्चरिंग की जाती थी और बाहुबली लोग अपने पसंदीदा उम्मीदवार को जिताने के लिए मतपत्रों पर उसके नाम के आगे ठप्पा लगा दिया करते थे। प्रायः जो लोग मताधिकार से वंचित हुआ करते थे वे दलित, आदिवासी और पिछड़े समुदाय के लोग होते थे। मात्र इस संभावना के कारण कि इस तरह से बूथ कैप्चरिंग और फर्जी मतदान से अपने उम्मीदवार को जिताया जा सकता है, हिंसा और भ्रष्टाचार की नदियाँ बहा दी जाती थीं। इस बुराई से भारतीय प्रजातन्त्र को मुक्ति दिलाना ईवीएम का सबसे महत्वपूर्ण योगदान रहा है। लाने ले जाने की सुविधा, मतों की गिनती में आसानी, मत पत्रों की छपाई की परेशानी का अंत तो फिर भी गौण विषय हैं क्योंकि इनका संबंध चुनाव प्रक्रिया की कार्यकुशलता और मितव्ययिता से है।
किन्तु कार्यकुशलता और मितव्ययिता तब महत्वहीन हो जाते हैं जब चुनावों से निष्पक्षता समाप्त हो जाती है। ईवीएम के उपयोग पर आपत्तियों का स्वरूप वैधानिक तथा तकनीकी दोनों प्रकार का है। संविधान के अनुच्छेद 324 के अनुसार स्वतन्त्र एवं निष्पक्ष चुनाव कराना चुनाव आयोग का कर्त्तव्य है। निष्पक्ष एवं स्वतन्त्र चुनावों हेतु निर्धारित विश्वव्यापी मानकों में एक प्रमुख मानक यह है कि मतदाता को यह ज्ञात होना चाहिए कि वह जिसे मत दे रहा है उसे वह मत मिल रहा है या नहीं। एक अन्य मानक है कि यदि चुनाव परिणामों पर कुछ शंका है तो मतों की गिनती दुबारा अलग व्यक्तियों के द्वारा की जा सके। अभी तक जो ईवीएम चुनावों में प्रयुक्त होती रही थी वह इन दोनों मानकों पर खरी नहीं उतरती थी।
जर्मनी ने तो इसी आधार पर ईवीएम के प्रयोग पर प्रतिबंध लगा दिया था कि चुनावों में पारदर्शिता तो मतदाता का अधिकार है किंतु चुनावी कार्यकुशलता जर्मन संविधान द्वारा संरक्षित मूल्य नहीं है। भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने 1982 में तब के जन प्रतिनिधित्व कानून में केवल मतपत्र का उल्लेख होने को आधार बनाकर ईवीएम को गैरकानूनी कहा था किंतु आर पी एक्ट संशोधित किया गया और ईवीएम के उपयोग का मार्ग प्रशस्त हुआ। ईवीएम के विरोध में यह तर्क भी दिया जाता है कि विश्व के विकसित देशों ने ईवीएम की सुरक्षा, सटीकता, प्रामाणिकता और विश्वसनीयता आदि से सम्बंधित चिंताओं के कारण या तो इसका उपयोग ही नहीं किया या इसका उपयोग बन्द कर दिया। यूरोपीय देशों इटली, आयरलैंड एवं हॉलैंड ने ईवीएम त्याग कर वापस बैलट पेपर का सहारा लिया। किंतु भारतीय ईवीएम के समर्थक यह कहते रहे हैं कि उक्त यूरोपीय देश एक ही डच कंपनी की बनाई ईवीएम का प्रयोग कर रहे थे जिसमें खामियां थीं। इसके अलावा इंग्लैंड और फ्रांस ने ईवीएम पर कभी विश्वास नहीं किया और न इसे प्रायोगिक रूप से अपनाया। संयुक्त राज्य अमेरिका के केवल चन्द राज्य वीवीपैट के साथ ईवीएम का उपयोग करते हैं। ईवीएम विरोधियों द्वारा यह भी तर्क दिया जाता है कि विश्व के विकसित देश तो पेपर बैलट का उपयोग कर रहे हैं जबकि विकासशील देशों में ईवीएम को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसके उत्तर में ईवीएम समर्थक यह कहते हैं कि सम्पन्न और कम जनसंख्या वाले विकसित देशों के लिए बैलट पेपर भले ही उपयुक्त हो किन्तु भारत जैसे विशाल और बड़ी जनसंख्या वाले प्रजातन्त्र में मतपत्रों से चुनावों की खामियों को दूर करने हेतु ही ईवीएम को अपनाया गया है।
चुनाव आयोग का यह दावा कि ईवीएम टैम्पर प्रूफ है और इसे हैक करना असंभव है इसकी कुछ तकनीकी विशेषताओं पर आधारित है। चुनाव आयोग की ईवीएम कंप्यूटर नियंत्रित नहीं हैं और यह स्टैंड एलोन मशीनें हैं। चुनाव आयोग के अनुसार उनकी ईवीएम मशीनों में वन टाइम यूजेबल प्रोग्राम्ड मास्क्ड हार्डवेयर प्रयुक्त होता है जिसके साथ टेम्परिंग करने पर वह कार्य करना बंद कर देता है। इन मशीनों में ऑनलाइन कनेक्शन के अभाव के कारण इंटरनेट द्वारा हैकिंग असम्भव है। इनमें हार्डवेयर पोर्ट, वाईफाई, ब्लू टूथ आदि से किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ संभव नहीं है क्योंकि ईवीएम की कंट्रोल यूनिट, बैलट यूनिट से एन्क्रिप्टेड या डायनामिकली कोडेड डेटा ही ग्रहण करती है। ईवीएम का सॉफ्टवेयर प्रोग्राम कोड भारतीय निर्मात्री कंपनियों द्वारा तैयार किया जाता है। इस प्रोग्राम को मशीन कोड में रूपांतरित करने के उपरांत ही विदेशी सेमीकंडक्टर माइक्रोचिप निर्माताओं को दिया जाता है क्योंकि भारत अभी यह क्षमता प्राप्त नहीं कर पाया है। प्रत्येक माइक्रोचिप में मेमोरी में सन्निहित एक आइडेंटिफिकेशन नंबर होता है और इस पर मैन्युफैक्चरर के डिजिटल सिग्नेचर होते हैं, इस कारण इन्हें बदलने का प्रश्न नहीं उठता। ईवीएम के बटन राजनीतिक दलों के क्रम में नहीं होते बल्कि किसी चुनाव में भाग लेने प्रत्याशियों के नामों के अल्फाबेटिकल आर्डर के अनुसार होते हैं। हर चुनाव क्षेत्र में प्रत्याशियों की संख्या अलग होती है इसलिए किसी दल का नाम ऊपर नीचे हो सकता है। इस कारण इन्हें किसी दल के पक्ष में प्रीप्रोग्राम नहीं किया जा सकता।
चुनाव आयोग का यह भी दावा है कि वह अपनी ईवीएम मशीनों में निरन्तर सुधार कर रहा है। 2006 और उसके पूर्व निर्मित एम 1 मशीनें भी पर्याप्त सुरक्षित थीं। किन्तु 2006 के बाद 2012 तक निर्मित एम 2 मशीनों में एन्क्रिप्टेड डायनामिक कोडिंग और प्रत्येक की प्रेस की रियल टाइम सेटिंग के फीचर्स सुरक्षा की दृष्टि से बढ़ाए गए। यह मशीनें ईवीएम ट्रैकिंग का भी फीचर रखती हैं। 2013 के बाद बनाई गई एम3 मशीन में टैम्पर डिटेक्शन और सेल्फ डायग्नोस्टिक्स की खास विशेषताएँ जोड़ी गई हैं।
ईवीएम समर्थक इनका निर्माण सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों इसीआईएल तथा बीईएल द्वारा कराए जाने को सुरक्षित मानते हैं क्योंकि यह कंपनियां सरकार और चुनाव आयोग के नियंत्रण में होती हैं। निजी कंपनियों की जवाबदेही तय करना कठिन है। जबकि विरोधी कहते हैं कि सरकारी नियंत्रण में होने के कारण ये दबावमुक्त नहीं होतीं और इनसे मनचाहा कार्य लिया जा सकता है। चुनाव आयोग के अनुसार 5 अनुभवी आई आई टी पेशेवरों की तकनीकी समिति की गुणवत्ता निगरानी के कारण इन मशीनों में गलती की संभावना न के बराबर होती है।
ईवीएम समर्थक समय समय पर न्यायालयों द्वारा ईवीएम के पक्ष में आए न्यायालयीन फैसलों का उल्लेख करते हैं। ये फैसले मद्रास हाई कोर्ट(2001), केरल हाई कोर्ट(2002), कर्नाटक हाई कोर्ट(2004) और बॉम्बे हाई कोर्ट(2005) द्वारा ईवीएम के प्रयोग के विरुद्ध दायर विभिन्न मुकदमों में दिए गए हैं। इसके अतिरिक्त चुनाव आयोग के 2009 और 2017 के ओपन चैलेंज में हिस्सा लेकर ईवीएम को हैक करने का साहस भी किसी ने नहीं दिखाया।
चुनाव आयोग के अनुसार ईवीएम द्वारा चुनाव की प्रक्रिया अत्यंत पारदर्शी होती है और इसमें प्रत्येक चरण पर सभी स्टेक होल्डर्स को विश्वास में लिया जाता है। ईवीएम की खराबी की जांच हेतु प्राथमिक स्तर परीक्षण, बूथवार ईवीएम आबंटन हेतु रैंडमाइजेशन, मतदान और परिणाम की परीक्षा हेतु मॉक पोल, अनेक चरणों में ईवीएम की सीरियल नंबर आधारित सीलिंग, पीठासीन अधिकारी द्वारा मतदान के दिन वोट डालने वाले मतदाताओं के रजिस्टर(17ए) का निर्माण, वोटिंग के उपरांत ईवीएम में की गई वोटिंग हेतु एकाउंट ऑफ वोट रजिस्टर(17सी) का निर्माण, ईवीएम काउंटिंग रिजल्ट से 17ए और 17सी के आंकड़ों का मिलान और क्रॉस वेरिफिकेशन के बाद तैयार रिजल्ट की घोषणा-इन सारे चरणों में राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि, प्रत्याशी या उसके प्रतिनिधि पोलिंग एजेंट न केवल उपस्थित होते हैं बल्कि अपनी संतुष्टि के बाद निर्धारित प्रपत्र और सील पर बाकायदा हस्ताक्षर भी करते हैं।
चुनाव आयोग जब यह कहता है कि ईवीएम को टैम्पर या हैक नहीं किया जा सकता तो उसका यह कथन यह सिद्ध नहीं करता कि उसने परिपूर्ण सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर का निर्माण कर लिया है, इस दावे में वे सुरक्षित परिस्थितियां भी सम्मिलित होती हैं जिनमें ईवीएम को चुनाव कार्य के दौरान या उसके बाद रखा जाता है। चुनाव आयोग का अपना कोई स्टाफ नहीं होता, राज्य और केंद्र सरकार के तथा अन्य संगठनों के कर्मचारी चुनावों के समय यहाँ अपनी सेवाएं देते हैं। ये बहुधर्मी, बहुजातीय, बहुवर्गीय समूह का निर्माण करते हैं। यह स्वयं मतदाता भी होते हैं। अतः यह कल्पना भी कठिन है कि इतने लोगों को कोई टेम्परिंग के लिए एक साथ मैनेज कर सकता है।
किन्तु चुनाव आयोग द्वारा ईवीएम की डिज़ाइन और सुरक्षा के दावों को लेकर हठधर्मिता का रुख अख्तियार करना बिल्कुल गलत है। अत्यंत सुरक्षित समझी जाने वाली मशीनें भी निरंतर सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर के सुधार के बाद भी हैकिंग और टैम्परिंग के खतरे का सामना नहीं कर पातीं। चुनाव आयोग ईवीएम हैकिंग के लिए चुनौती तो देता है किंतु सुरक्षा कारणों और गोपनीयता का हवाला देकर मशीनों को हाथ नहीं लगाने देता। चुनाव आयोग जब तक तद्विषयक कानूनों में परिवर्तन के लिए आग्रह नहीं करेगा और शोधकर्ताओं, विशेषज्ञों तथा एथिकल हैकर्स को ईवीएम उपलब्ध नहीं कराएगा तब तक उसके हर सुरक्षा दावे पर सवाल उठते रहेंगे। ईवीएम की डिज़ाइन में बैलट यूनिट और कंट्रोल यूनिट एक केबल द्वारा जुड़ी होती हैं। इन तीन भागों को यदि एक एकीकृत डिज़ाइन में बदल दिया जाए तो यह सुरक्षा की दृष्टि से बेहतर रहेगा। यह कहा जाता है कि नगरीय निकायों में प्रयुक्त ईवीएम राज्य चुनाव आयोग द्वारा खरीदी और मेन्टेन की जाती हैं और इनके आधार पर केंद्रीय चुनाव आयोग की मशीनों का आकलन गलत है, इस संबंध में तथ्य जनता के सम्मुख लाए जाने चाहिए।
सुब्रमण्यम स्वामी विरुद्ध चुनाव आयोग के मुकदमे में 2013 के अपने निर्णय में सर्वोच्च न्यायालय ने वोटर वेरिफिएबल पेपर ऑडिट ट्रायल को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए अनिवार्य बताया है। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि वीवीपैट के प्रयोग से चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता बढ़ेगी और मतदाताओं का विश्वास भी अर्जित किया जा सकेगा। पूरे विश्व में ईवीएम से संबंधित अपारदर्शिता और पृथक पुनर्गणना की समस्याओं के समाधान के रूप में वीवीपैट को स्वीकारा गया है। अब जब चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में यह कह दिया है कि सितंबर 2018 तक उसके पास आवश्यक वीवीपैट मशीनें उपलब्ध हो जाएंगी और 2019 के लोकसभा चुनाव पूर्णतः इन्हीं मशीनों द्वारा होंगे तब यह विवाद समाप्त हो जाना चाहिए किंतु ऐसा होता नहीं दिखता। इसका कारण यह है कि विरोधी दलों की आपत्ति मशीन की कार्यकुशलता से अधिक चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर है। उनका कहना यह नहीं है कि  चुनाव आयोग के प्रयासों के बावजूद कोई ईवीएम की सुरक्षा में सेंध लगा रहा है। अपितु उनका मानना यह है कि चुनाव आयोग सरकार के दबाव में कार्य कर रहा है। हो सकता है कि यह संदेह अनुचित और निराधार हो किंतु इसकी उपस्थिति लोकतंत्र के लिए हितकारी नहीं है। क्या इसका समाधान मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति प्रक्रिया में छिपा है? यदि कॉलेजियम द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त का चयन किया जाए तो न केवल उसे सभी का सम्मान मिलेगा बल्कि उसे निष्पक्षता बरतने में भी आसानी होगी। चाहे ईवीएम हो या बैलट पेपर चुनाव आयोग की तटस्थता के बिना निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं है।
डॉ राजू पाण्डेय

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