(सत्य घटना पर आधारित एक हास्य)

कई दिनों बाद किसी का फोन आया।
मै बना रहा था सब्जी, उसे छोड़कर उठाया।।

उधर से एक पतली सी आवाज आयी हैलो नरेश!
मैंने कहा सॉरी हियर इज मुकेश!

उसने कहा! क्यों बेवकूफ बना रहे हो।
मुझे सब पता है तुम नरेश ही बोल रहे हो।।

मै थोडा गुस्से में बोला! तुम हो कैसी बला।।
मै कैसे तुम्हे समझाऊँ। मुकेश हूँ नरेश को कहाँ से लाऊं।।

उसको मेरी बातों से, हुआ कुछ खटका।
उसने बड़े जोर से, रिसीवर को पटका।।

तब मुझको किचन से, कुछ बदबू सी आयी।

राँग नम्बर के चक्कर में, मैंने सब्जी जलवायी।।

दूसरे दिन फिर, उसका फोन आया।
मै बाथरूम से भागा, दीवार से टकराया।

सिर के बल गिरा, नाक से खून आया।।
फिर भी गिरते पड़ते, फोन उठाया।।

फिर वही आवाज, आयी हैलो नरेश।
मै खीझकर चिल्लाया! नहीं उसका बाप मुकेश।।

उसने कहा अंकल नमस्ते! मैंने भी आशीष दिया-
खुश रह आज तो मै, बच गया मरते मरते।।

वो थोड़ा शरमाई, फिर गिड़गिड़ायी-

अंकल नरेश से बात करा दो, मै पूनम बोल रही हूँ।
मैंने जवाब दिया-

नरेश तो सुबह ही मर गया, अभी दफना कर आ रहा हूँ।।

उसको हुआ कुछ शक। उसने कहा बक॥

अभी कल ही तो दिखा था।
मैंने आह भरी! इतनी जल्दी मरेगा,

क्या मुझको ये पता था।।

आवाज आयी अच्छा अतुल का नम्बर बता दो।
मै रोया! मेरा बेटा मरा है, कम से कम झूठी तसल्ली तो दे दो।।
उसको मेरी बातों में दिखी सच्चाई।
तब उसने अपनी गाथा सुनाई।।
अंकल मुझे आपका दर्द पता है।
पर इसमें मेरी क्या खता है।।

वो था ही इतना कमीना।

बेकार था उसका जीना।।
आपको क्या पता उसने मेरे साथ क्या किया था।
इंडिया गेट पर ही मेरा चुम्मा ले लिया था।।
इसके अलावा भी उसने मुझको ठगा था।
लालकिले पे मेरा पर्स ले भगा था।।
उसकी इस हरकत पर मेरे डैडी ने डांटा।
तो उसने मेरे बाप को भी जड़ दिया चांटा।।

और क्या बताऊँ मै उसकी करतूत।
अच्छा हुआ मर गया आपका कपूत।।

लेकिन मै उसे अब भी नहीं छोडूंगी।
स्वर्ग तो जायेगा नहीं नरक तक खदेड़ूगी।।
मैंने  उसको समझाया।

दो चार अवधी बातों का जाम पिलाया।।

और कहा! छोडो भी ये गुस्सा।

खत्म हुआ नरेश का किस्सा।।

मै उससे हूँ शर्मिंदा।

शायद तुम्हारे लिए हूँ जिन्दा।।

मुझसे शादी करोगी? सच कह रहा हूँ
पैर भी दबाऊंगा अगर तुम कहोगी।।

वो गुर्रायी! चुप बुड्ढे, कुछ तो शरम कर।
भगवान से नहीं, मुझसे तो डर।।

तुझे क्या पता मै कितनी खूंखार हूँ।
कलयुग में पूतना का दूसरा अवतार हूँ।।

मै तो अभी तेरे बेटे को ही नहीं छोडूंगी।
तूने कैसे सोचा मै तुझसे रिश्ता जोडूंगी।।
अरे तू! इस धरती पर अभिशाप है।
नरेश तो ठग ही था, तू तो उसका भी बाप है।।

 

उस  दिन  ही  मैंने,  वो फोन कटा दिया।

पर उसने बिन व्याहा, बाप मुझे बना दिया॥

4 thoughts on “रॉन्ग नंबर ‘Wrong Number’

  1. बहुत खूब,वह भी गांधी जयंती के अवसर पर.जवाब नहीं.

    1. अरे आर सिंह सर जी मेरी कविता और गांधी जयंती का क्या तालमेल??? वैसे भी मेरे हिसाब से तो गांधी जयंती मनाना एक मज़ाक ही है, क्योंकि जिन लोगों ने वाकयी मे देश के लिए अपने प्राणो की आहुती दी गांधी जी की वजह से उन सब की सहादत बौनी साबित की जाती है, जबकि साबरमती के संत के सारे दोषो पर आँख मूँद ली जाती है

  2. मोबाइल के जमाने मे फोन रखोगे तो ऐसा तो होगा ही, वैसे कविता अच्छी है

  3. बहुत खूब… अच्छी रचना के लिए कवि को हार्दिक साधुवाद

Leave a Reply

%d bloggers like this: