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    Homeसाहित्‍यकविताभोलाराम का प्रजातंत्र

    भोलाराम का प्रजातंत्र

    -प्रभुदयाल श्रीवास्तव- yuva
    जब पवित्र पावक मनमोहक‌
    दिन चुनाव का आता है
    भोलाराम निकलकर घर से
    वोट डालने जाता है|
    किसे चुने या किसे वोट दें
    नहीं समझ वह पाता है
    सौ का नोट उसे जो देता
    वह उसका हो जाता है|
    दो दिन पहले तक चुनाव के
    लोग कई घर आते हैं
    लालच देकर हाथ जोड़कर‌
    हर कोई उसे मनाता है|
    हर आने वाले से कहता
    वोट तुम्हें ही हम देंगे
    किंतु वोट किसको देना है
    वही समझ न पाता है|
    अंतिम दिन जो दर पर आकर‌
    दारू और कंबल देता
    बिना किसी भी सोच समझ के
    वोट उसे दे आता है|
    हर चुनाव में इसी तरह से
    वोटर वोट दिया करते
    इसीलिये तो भारत पुख्ता
    प्रजातंत्र कहलाता है|
    प्रभुदयाल श्रीवास्तव
    प्रभुदयाल श्रीवास्तव
    लेखन विगत दो दशकों से अधिक समय से कहानी,कवितायें व्यंग्य ,लघु कथाएं लेख, बुंदेली लोकगीत,बुंदेली लघु कथाए,बुंदेली गज़लों का लेखन प्रकाशन लोकमत समाचार नागपुर में तीन वर्षों तक व्यंग्य स्तंभ तीर तुक्का, रंग बेरंग में प्रकाशन,दैनिक भास्कर ,नवभारत,अमृत संदेश, जबलपुर एक्सप्रेस,पंजाब केसरी,एवं देश के लगभग सभी हिंदी समाचार पत्रों में व्यंग्योँ का प्रकाशन, कविताएं बालगीतों क्षणिकांओं का भी प्रकाशन हुआ|पत्रिकाओं हम सब साथ साथ दिल्ली,शुभ तारिका अंबाला,न्यामती फरीदाबाद ,कादंबिनी दिल्ली बाईसा उज्जैन मसी कागद इत्यादि में कई रचनाएं प्रकाशित|

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