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डॉ नीलम महेंद्र नारी शक्ति सम्मान से सम्मानित

प्रसिद्ध लेखिका एवं वरिष्ठ स्तंभकार डॉ नीलम महेंद्र को बृजभूमि फाउंडेशन, मथुरा, संरक्षक स्थानीय सांसद, हेमा मालिनी, द्वारा लेखन के क्षेत्र में उनके विशेष योगदान...

प्रधानमंत्री मोदी के जन्मदिन पर उन पर केंद्रित नई पुस्तक ‘लॉर्ड ऑफ रिकॉर्ड्स’ पर विशेष छूट

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन के अवसर पर प्रभात प्रकाशन उन पर लिखी एक नई पुस्तक लेकर आ रहा है। इस पुस्तक का नाम है...

समन्वय बैठक में सीमाओं की सुरक्षा को लेकर मंथन करेगा संघ

पुष्कर में 07 सितंबर से शुरू होगी बैठक, 200 प्रतिभागी होंगे उपस्थित महिलाओं से संबंधित व्यापक सर्वेक्षण की रिपोर्ट के निष्कर्षों के आधार पर महिला...

भारत-रुस: नई ऊंचाईयां

डॉ. वेदप्रताप वैदिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यह रुस-यात्रा भारतीय प्रधानमंत्रियों की पिछली कई यात्राओं के मुकाबले कहीं अधिक सार्थक रही है। उसका पहला प्रमाण...

कड़वे सच का विश्वसनीय दस्तावेज ‘तीखे तेवर’

लेखक ने जो कुछ कहा है, वह पूरी वैचारिक ऊर्जा के साथ कहा है, जिसके कारण चिंतन की निष्पक्षता एवं स्वतंत्रता का ग्रंथ के हर...

साहित्य

अमीर ग़रीब

मिलता नहीं चैनो सुकून रईसों के मकानों में, दम घुटता है क्यों ऊँचे - बंगले आशियानों में। अमीरों में छुपे दर्दों की झलक देखी है...

जब मन की मेरी बात सुने मेरे सँवरिया !

जब मन की मेरी बात सुने मेरे सँवरिया; आनन्द गंग बहे चले मेरे प्रहरिया ! लहरों में घुमा प्रस्तर तर आए नज़रिया; बृ़क्षों की व्यथा...

सोचो मत ऐसा कुछ भी नहीं !

सोचो मत ऐसा कुछ भी नहीं अपनी दृष्टि का फेर सभी; पाषाण औ पौधे पूर्ण सुधी, ना हीन भाव उर धारो जी ! तुम ब्रह्म...

कितने ही दर्द सर्द मिले !

कितने ही दर्द सर्द मिले, सुरमयी दुनियाँ; उर में थीं कितनी व्याधि रखी, विरहिन बुधिया ! सुधियों की बरातों में बही, ध्यान कब रही; ज्ञानों...

नए मोटर व्हीकल एक्ट से मेरा देश परेशान

- ललित गर्ग - नया बना मोटर व्हीकल एक्ट देश को राहत पहुंचाने की बजाय परेशानी का सबब बन रहा है। अनेकों विरोधाभासों एवं विसंगतियों...

राज हर कोई करना है जग चह रहा !

राज हर कोई करना है जग चह रहा, राज उनके समझना कहाँ वश रहा; राज उनके कहाँ वो है रहना चहा, साज उनके बजा वह कहाँ पा रहा ! ढ़पली अपनी पै कोई राग हर गा रहा, भाव जैसा है उर सुर वो दे पा रहा; ताब आके सुनाए कोई जा रहा, सुनके सृष्टा सुमन मात्र मुसका रहा ! पद के पंकिल अहं कोई फँसा जा रहा, उनके पद का मर्म कब वो लख पा रहा; बाल बन खेल लखते मुरारी रहे, दुष्टता की वे सारी बयारें सहे ! सृष्टि सारी इशारे से जिनके चले,  सहज होके वे जगती पै क्रीड़ा करे; जीव गति जान कर तारे उनको चले, कर विनष्टि वे आत्मा में अमृत ढ़ले !  हर निमिष कर्म करके वे प्रतिपालते, धर्म अपना धरे वे प्रकृति साधते; ‘मधु’ है उनका समझ कोई कब पा रहा, अपनी जिह्वा से चख स्वाद बतला रहा !  ✍🏻 गोपाल बघेल ‘मधु’