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    खबर आई है कि उनका दम घुट रहा है…

    सुना है कि धुंध ने दिल्‍ली में डेरा जमा लिया है। ये कैसी धुंध है जो  एक कसमसाती ठंड के आगमन की सूचना लेकर नहीं आती बल्‍कि  एक ज़हर की चादर हमारे अस्‍तित्‍व पर जमा करती चली आती है।

    इस धुंध ने आदमी की उस ख्‍वाइश को तिनका-तिनका कर दिया है  जो अपने हर काम और अपनी हर उपलब्‍धि को ”दिल्‍ली” ले जाने में  लगा रहता है। सचमुच अब दिल्‍ली दूर भले ही ना लगे, मगर दिल्‍ली  से दूर रहने में ही ज्‍यादा भलाई है।

    पिछले दो-तीन दिनों से दिल्‍ली पूरे विश्‍व के पटल पर चर्चा का विषय  बनी हुई है। यूं चर्चा का विषय तो स्‍मॉग है जो दिल्‍ली-एनसीआर की  बड़ी आबादी को तिल-तिल करके मार रहा है मगर वजह तो और भी  हैं जो दिल्‍ली को ज़हरीला बना रही हैं जिनमें मुख्‍य है देशभर से आई  आबादी का दिल्‍ली-एनसीआर क्षेत्र में विस्‍फोटक रूप में आकर बसना।  यहां सेर में सवासेर नहीं, बल्‍कि सेर में दस सेर समा रहा है। यानि  सब-कुछ जब कई गुना बढ़ रहा है तो स्‍मॉग कम कैसे हो सकता है।

    कुल मिलाकर बात ये है कि सब जानते हैं ये समस्‍या कोई आज की  नहीं है, इसकी जड़ तो उस मूल अवधारणा में छुपी है जो हर  दिल्‍लीवासी (चाहे वह झुग्‍गीवासी ही क्‍यों ना बन गया हो) को  अतिविशिष्‍ट बनाती है। इसी सोच ने दिल्‍ली को नरक बनाकर रख  दिया है। हम सभी ये भी जानते हैं कि इस अतिविशिष्‍टता ने दिल्‍ली  को स्‍मॉग का शहर बनाने के साथ-साथ क्राइम सिटी भी बनाया है।

    ‘सर्वसुख…? सर्वसुलभ…?’ की मृगतृष्‍णा ने दिल्‍ली को आज इस  नारकीय स्‍थिति में ला खड़ा किया है कि वह आकर्षित करने की  बजाय सुरसा के मुंह की भांति भयावह नज़र आती है जो अपनी  ज़मीन पर आने वाले हर वाशिंदे को निगलने को आतुर है।

    जहां तक बात है स्‍मॉग की, तो स्‍मॉग कोई सिर्फ दिल्‍ली की समस्‍या  नहीं है, इस मौसम में लगभग हर शहर इस समस्‍या से दो-चार होता  है मगर चूंकि नेशनल मीडिया दिल्‍ली में बैठा है और एक एक खबर  पर वो 24 घंटे चीखने की कुव्‍वत रखता है सो स्‍मॉग की ”चपेट” में  आ जाती है दिल्‍ली, और आननफानन में एनजीटी से लेकर सुप्रीम  कोर्ट तक अतिसक्रिय हो जाते हैं। बाजार में ‘एअरप्‍यूरीफायर’ और  ‘मास्‍क’ के ब्रांड मॉल्स से लेकर फुटपाथों तक सजा दिए जाते हैं।

    हकीकतन दिल्‍ली की हवा में ज़हर की ये समस्‍या पलायन से उपजी  है, समस्‍या हर किसी के दौड़ने और दौड़कर लक्ष्‍य पाने की आपाधापी  से उपजी है, समस्‍या हर किसी के भीतर पैदा हुए बेशुमार लालच से  उपजी है, समस्‍या गांवों के खाली होने से और शहरों में भीड़ के  पहाड़ों से उपजी है, समस्‍या उस सोच से भी उभरी है जो दिल्‍ली वाला  बनने के लिए अपने जीवन, अपने रिश्‍तों, अपने बच्‍चों, अपने सुकून  को दांव पर लगा देती है मगर उसे बदले में हासिल होता है ज़हरीली  सांसों का उपहार।

    यूं रस्‍मी तौर पर स्‍मॉग चर्चा में है और अगले कुछ दिनों तक रहने  भी वाली है, इस ज़हरीली धुंध के कारण-निवारण ढूढ़े जाऐंगे, हर बार  की तरह इस बार भी सर्दी के पूर्ण आगमन से पूर्व ये तमाशा चलता  है…चलता रहेगा।

    लीजिए इसी हमारी ‘धुंध’ यानि दिल्‍ली की ‘स्‍मॉग’ पर मेरा एक शेर –

    कोई हमें मारने को आए क्‍यूं भला
    हम खुद अपने ताबूतों को नीलाम किए बैठे हैं।

    — अलकनंदा सिंह

    अलकनंदा सिंह
    मैं, अलकनंदा जो अभी सिर्फ शब्‍दनाम है, पिता का दिया ये नाम है स्वच्‍छता का...निर्मलता ...सहजता...सुन्दरता...प्रवाह...पवित्रता और गति की भावनाओं के संगम का।।। इन सात शब्‍दों के संगमों वाली यह सरिता मुझे निरंतरता बनाये रखने की हिदायत देती है वहीं पाकीज़गी से रिश्तों को बनाने और उसे निभाने की प्रेरणा भी देती है। बस यही है अलकनंदा...और ऐसी ही हूं मैं भी।

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