ए. आई. बेस्ड सिस्टम से ही संभव भारतीय रेल का तकनीकि विकास

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● रेल एक्सीडेंट होते है,जिसमें प्रमुख है ट्रैक का अनियमित मेंटेनेंस जिसके कारण ट्रैक पर आए क्रैक,फ्रैक्चर,वियर जैसी समस्या आती है और अंत में यही एक्सीडेंट के कारण बनते है। अभी भी भारतीय रेल के पास अपने ट्रैक को रेगुलर,रियल टाइम मॉनिटरिंग करने वाला प्रणाली की कमी है।

राजीव रंजन

भारतीयों के लिए परिवहन के क्षेत्र में अमूल्य योगदान देने वाला भारतीय रेल,वर्तमान समय में विश्व के चौथे सबसे बड़े रेल नेटवर्क और एशिया में दूसरे स्थान पर आता है। इसके बावजूद भारतीय रेल यात्रियों की सुरक्षा पर कोई खास ध्यान नहीं दे रही है। आज विज्ञान और प्रावैधिकी इतना विकसित हो चुका है कि हमने चन्द्रमा के साउथ पोल पर अपना चंद्रयान भेज कर विश्व पटल पर अपना नाम अंकित कर चुके है। लेकिन रेल के लगातार हो रहे एक्सीडेंट,डिरेलमेंट,दो ट्रैन के आपसी टक्कर जैसी चुनौतियां अभी भी कायम है,जिसका नतीजा यह है कि हजारों जाने गवाने पड़ते है। और कइएक को रेल से यात्रा करने में भय लगता है। यह सही है कि भारतीय रेल के अनुसार कवच प्रणाली को लाया गया है जिससे जब भी कोई दो ट्रैन एक ही ट्रैक पर आती है तो कुछ दूर पहले से ही लोको पायलट को अलार्म,सिग्नल और आवश्यकता पड़ने पर इमरजेंसी ब्रेक की सुविधा उपलब्ध कराता है। सरकार के द्वारा शून्य दुर्घटना’ के लक्ष्य को प्राप्त करने में रेलवे की मदद के लिए स्वदेशी रूप से विकसित स्वचालित ट्रेन सुरक्षा,ए. टी.पी. प्रणाली का निर्माण किया गया। एटीपी को ही  कवच नाम दिया गया है। कवच को इस तरह से बनाया गया है कि यह उस स्थिति में एक ट्रेन को ऑटोमेटिक रूप से रोक देगी, जब उसे निर्धारित दूरी के भीतर उसी लाइन पर दूसरी ट्रेन के होने की जानकारी मिलेगी। इस डिजिटल प्रणाली के कारण मानवी त्रुटियों जैसे कि लाल सिग्नल को नजरअंदाज करने या किसी अन्य खराबी पर ट्रेन अपने आप रुक जाएगी। ‘कवच’ प्रणाली में हाई फ्रीक्वेंसी के रेडियो कम्युनिकेशन का उपयोग किया जाता है। भारतीय रेल की माने तो कवच 160 किलोमीटर प्रति घंटे तक की गति के लिए अप्रूव किया गया है। यानी यदि कोई दो ट्रैन 160 किमी तक के स्पीड से एक ही ट्रैक पर आ जाती है तब भी यह प्रणाली कारगर साबित होगा।ऐसा भारतीय रेल का कहना है। रेलवे के आंकड़े के अनुसार 1500 किमी तक में कवच प्रणाली लगाया जा चुका है और 3000 किमी तक के क्षेत्र में यह लगाया जाएगा। भारतीय रेल का रेल रूट 65000 किमी से भी अधिक है। यानी आने वाले 3-4 साल तक तो कवच प्रणाली को कारगर कहना सही नहीं है। यह प्रणाली महंगा तो है ही साथ में इसे ग्राउंड पर लाने में काफी समय लगने वाला है। यह प्रणाली केवल दो ट्रेनों को आपसी टक्कर से बचा पाने में संभव होगा वो भी आने वाले दिनों में। रेल एक्सीडेंट के केवल यही कारण नहीं है और भी ऐसे कारण है जिसके कारण रेल एक्सीडेंट होते है,जिसमें प्रमुख है ट्रैक का अनियमित मेंटेनेंस जिसके कारण ट्रैक पर आए क्रैक,फ्रैक्चर,वियर जैसी समस्या आती है और अंत में यही एक्सीडेंट के कारण बनते है। अभी भी भारतीय रेल के पास अपने ट्रैक को रेगुलर,रियल टाइम मॉनिटरिंग करने वाला प्रणाली की कमी है जिसके कारण ट्रैक पर ऑब्जेक्ट का पता कर पाना,ट्रैक में क्रैक जैसी चीजों के बारे में रेलवे को पता नहीं चल पाता है।

क्या है इसका समाधान

भारतीय रेलवे में रेल एक्सीडेंट्स में ज्यादातर कारण क्रैक,ऑब्जेक्ट ऑन रेल पाया गया है। ट्रैक को देखने के लिए रेलवे मैन्युअल ट्राली कार का प्रयोग कर रही है लेकिन इससे ट्रैक का सही से मॉनिटरिंग नहीं हो पा रहा है,महीनें दो महीनें में एक बाद यह कार अपने रूट में आती है और चेक करती है लेकिन इससे भी ट्रैक के इंटरनल फाल्ट के बारे में पता नहीं चल पाता है। आज के इस दौर में अगर ट्रैक का रेगुलर मेंटेनेस करना है तो हमें सेंसर,रिले बेस्ड सिस्टम को ट्राली कार में समाहित करना होगा,जो आधुनिक तकनीक से लेस हो और नियमित ट्रैक मॉनिटरिंग के लिए इसे ट्रैक पर चलाया जाए। इसके डाटा को मॉनिटरिंग के लिए मेंटेनेंस टीम होना चाहिए जो हमेशा उत्पन समस्या जैसे क्रैक का पता चलता है तो उसे तुरंत ठीक करें। यानी हमें एडवांस्ड ट्राली कार की जरुरत है। हालाँकि ट्रैक के सेफ्टी के लिए भारतीय रेलवे ने लाइडर सिस्टम के लिए 3200 करोड़ रूपये का टेंडर निकाला है। जिसे शुरुआत में 1000 ट्रेनों में लगाया जायेगा जिससे ट्रैक का 3डी इमेज सेंसर के द्वारा मिल सके और फाल्ट का पता लगाया जा सके। भारतीय रेल को आने वाले समय में ऐसे ही आधुनिक तकनीक से लैस सिस्टम की जरुरत है जो भारतीय रेल को सुरक्षित रख सकें और हमारें जीवन को भी। कई देशों में ऑटोमेटिक ट्रैक इंस्पेक्शन टेक्नोलॉजी की सहायता से पटरियों की जांच की जाती है। पश्चिमी देशों में ट्रेनों में पॉजिटिव ट्रेन कंट्रोल जैसे एडवांस सिग्नलिंग सिस्टम लगे होते हैं। अगर भारतीय रेलवे भी इस तरह की एडवांस सिग्नलिंग सिस्टम को हमारे यहां लागू करे तो यह टेक्नोलॉजी ट्रेनों की संभावित टक्कर को रोकने के लिए ऑटोमेटिक ब्रेक लगा सकती है,यही प्रणाली कवच में भी है लेकिन यह अभी उतना दक्ष नहीं है। भारतीय रेल में हर दिन लाखों लोग सफर करते हैं. इसका नेटवर्क दुनिया में चौथे नंबर पर आता है। ऐसे में रेलवे में सफर करने वाले लोगों की सुरक्षा को देखते हुए इसे नई टेक्नोलॉजी की मदद से आधुनिक बनाना बेहद जरूरी है। आपको बता दे की यूरोपीय देश जर्मनी रेलवे के लिए अपने अच्छे सुरक्षा मानकों और लेटेस्ट टेक्नोलॉजी के लिए जाना जाता है।

टेस्ट ट्रैक एक सार्थक कदम

जापान और यूनाइटेड किंगडम,अमेरिका, रूस और पोलैंड जैसे देशों में दो-तीन टेस्ट ट्रैक की व्यवस्था है।इसी को देखते हुए रेलवे के रिसर्च विंग अनुसंधान अभिकल्प और मानक संगठन या आरडीएसओ ने डेडिकेटेड टेस्ट ट्रैक को दो चरणों में बनाने की मंजूरी दी है। पहले चरण को दिसंबर 2018 में और दूसरे चरण को नवंबर 2021 में मंजूरी मिली है। इस परियोजना को दिसंबर 2025 तक पूरा कर लेने की बात की जा रही है। हालाँकि इसमें अभी कुछ और वक्त लगेगा। इस परियोजना की कुल अनुमानित लागत करीब 820 करोड़ रुपये है।

ए आई बेस्ड तकनीक पर भारतीय रेल ज्यादा ध्यान दे रही है।

नवंबर माह में आयोजित हुई रेल प्रदर्शनी में आरडीएसओ के महानिदेशक का कहना है कि एआई बेस्ड टेक्नोलॉजी पर भारतीय रेल का बहुत ज्यादा फोकस कर रहा है। सर्दी में फॉग की समस्या अभी भी बनी हुई है।सेफ्टी की चुनौती को हमने ओवर कम कर लिया है। हमने लोकोमोटिव में एक ऐसा डिवाइस लगाया है जिससे अगला सिग्नल कहां पर स्थित है, कितनी दूरी पर है, उसका हमेशा ड्राइवर को हर सिग्नल का फोरकास्ट उस डिवाइस में आ जाता है। इससे पता लग जाता है और लोको पायलट चौकन्ना हो जाता है। दुर्घटना से पहले ही हमें संकेत मिल जाए इस तरह की टेक्नोलॉजी विकसित कर रहे हैं।

लेखक के बारे में – इंजीनियरिंग बैकग्राउंड से सम्बन्ध रखते है। स्मार्ट इंडिया हैकाथॉन में रेलवे के प्रोजेक्ट पर काम कर रहे है।

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