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टैरिफ के बावजूद वर्ष 2026 में भारत की आर्थिक विकास दर छू सकती है नई ऊचाईयां

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दिनांक 1 फरवरी 2026 को वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए केंद्र सरकार द्वारा भारतीय संसद में प्रस्तुत किए जाने वाले बजट के पूर्व वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारत के आर्थिक विकास से सबंधित प्रथम अग्रिम अनुमान के आंकड़े 7 जनवरी 2026 को जारी किए गए है। इस अनुमान के अनुसार वित्तीय वर्ष 2024-25 में सकल घरेलू उत्पाद में 6.5 प्रतिशत की वृद्धि दर हासिल हुई थी जो वित्तीय वर्ष 2025-26 में बढ़कर 7.4 प्रतिशत रहने की सम्भावना व्यक्त की गई है। सकल घरेलू उत्पाद से सम्बंधित प्रथम अग्रिम अनुमान के आंकड़ों के आधार पर ही वर्ष 2026-27 के बजट को अंतिम रूप दिया जा रहा है। आर्थिक विकास से सम्बंधित द्वितीय अग्रिम अनुमान 27 फरवरी 2026 को जारी किए जाने हैं। भारत के सकल घरेलू उत्पाद में भारतीय रिजर्व बैंक का अनुमान भी 7.3 प्रतिशत की वृद्धि का ही है परंतु भारतीय स्टेट बैंक के आर्थिक अनुसंधान विभाग का अनुमान 7.5 प्रतिशत अथवा इससे अधिक का है। भारत की आर्थिक विकास दर विश्व के सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच सबसे अधिक रहने की सम्भावना विश्व बैंक, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, एशियन विकास बैंक (7.2 प्रतिशत), फिच नामक रेटिंग संस्थान (7.4 प्रतिशत) आदि संस्थानों ने भी व्यक्त की है।       भारत के सकल घरेलू उत्पाद में वित्तीय वर्ष 2024-25 में हासिल की गई 6.5 प्रतिशत की वृद्धि से आगे बढ़कर वित्तीय वर्ष 2025-26 में 7.4 प्रतिशत की वृद्धि दर हासिल करने के कुछ मुख्य कारणों में शामिल हैं – (1) केंद्र सरकार के स्थिर उपभोग खर्च (Govt Fixed Consumption Expenditure) में वृद्धि दर जो वित्तीय वर्ष 2024-25 में 2.3 प्रतिशत की रही थी, वह बढ़कर वित्तीय वर्ष 2025-26 में 5.2 प्रतिशत रहने की सम्भावना है; (2) विनिर्माण के क्षेत्र में वृद्धि दर वित्तीय वर्ष 2024-25 में 4.5 प्रतिशत की रही थी जो वित्तीय वर्ष 2025-26 में बढ़कर 7.0 प्रतिशत रहने की सम्भावना है; (3) सकल मान योग (Gross Value Addition) में वृद्धि दर का 6.4 प्रतिशत से बढ़कर 7.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है; (4) सकल स्थिर पूंजी निर्माण (Gross Fixed Capital Formation) में वृद्धि दर 7.1 प्रतिशत से बढ़कर 7.8 प्रतिशत रहने की सम्भावना व्यक्त की गई है; (5) सेवा एवं कृषि क्षेत्र में क्रमश: 9.1 प्रतिशत एवं 3.1 प्रतिशत की सम्भावना व्यक्त की गई है; (6) भारत से विभिन्न उत्पादों के निर्यात में वृद्धि दर का 6.3 प्रतिशत से बढ़कर 6.4 प्रतिशत रहने की सम्भावना होना भी शामिल है। अप्रेल 2025 से नवम्बर 2025 के खंडकाल में राजकोषीय घाटा 9.8 लाख करोड़ का रहा है जो वित्तीय वर्ष 2025-26 के कुल अनुमान का 62.3 प्रतिशत है, अतः बजटीय घाटा भी अभी तक नियंत्रण में ही रहा है। वित्तीय वर्ष 2025-26 में राजकोषीय घाटा 15.69 लाख करोड़ रहने का अनुमान लगाया गया था, जो सकल घरेलू उत्पाद का 4.4 प्रतिशत होगा। इस प्रकार केंद्र सरकार की आय एवं व्यय से सबंधित स्थिति भी पूर्णत: नियंत्रण में है।    वित्तीय वर्ष 2025-26 में भारत के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर के 7.4 प्रतिशत के अनुमान को उत्साहवर्धक माना जाना चाहिए क्योंकि यह वृद्धि दर ट्रम्प द्वारा भारत से अमेरिका को होने वाले विभिन्न वस्तुओं के निर्यात पर लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ के बावजूद रहने वाली है। दरअसल ट्रम्प द्वारा भारत से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर लगाए गए टैरिफ को वित्तीय बाजार में बहुत गम्भीरता से लिया जाकर इसके भारतीय अर्थव्यवस्था पर होने वाले प्रभाव को बहुत बढ़ा चढ़ाकर पेश किया गया है। परंतु, वास्तव में भारत के आर्थिक विकास दर पर इसका प्रभाव लगभग नहीं के बराबर रहा है। इसके पीछे मुख्य कारण अमेरिका को भारत से होने वाले निर्यात की कम मात्रा भी है। वित्तीय वर्ष 2024-25 में भारत से अमेरिका को 7,900 करोड़ अमेरिकी डॉलर के विभिन्न वस्तुओं के निर्यात हुए थे, जबकि भारत का सकल घरेलू उत्पाद 4.29 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर का रहा था। अतः भारत से अमेरिका को होने वाले निर्यात भारत के सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 1.85 प्रतिशत ही रहे हैं। वैसे भी भारत की अर्थव्यवस्था निर्यात आधारित है ही नहीं (चीन की अर्थव्यवस्था निर्यात आधारित है, इसीलिए चीन पर अमेरिकी टैरिफ का प्रभाव अधिक हो सकता है), भारतीय अर्थव्यवस्था मुख्यतः आंतरिक उपभोग पर आधारित है। यदि भारत के नागरिक स्वदेशी उत्पादों का अधिक से अधिक सेवन करते हैं तो ट्रम्प द्वारा भारत से अमेरिका को होने वाले निर्यात पर लगाए गए टैरिफ के भारतीय अर्थव्यवस्था पर होने वाले प्रभाव को शून्य भी किया जा सकता है।  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ द्वारा भी भारतीय समाज को लगातार प्रेरणा दी जा रही है कि वे भारत में निर्मित उत्पादों का ही उपयोग करें ताकि भारत को प्रत्येक क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाया जा सके। संघ ने पंच परिवर्तन  नामक एक कार्यक्रम को प्रारम्भ किया है, जिसमें पांच बिंदु शामिल किए गए हैं – स्वदेशी का उपयोग, नागरिक कर्तव्य, सामाजिक समरसता, पर्यावरण, कुटुंब प्रबोधन। भारत में समस्त नागरिकों का यह कर्तव्य है कि वे सनातन हिंदू संस्कृति के संस्कारों का अनुपालन सुनिश्चित करें। इन संस्कारों में भारत के नागरिकों में “देश प्रथम” के भाव का जागरण भी शामिल है। लोकतंत्र की सफलता और स्थिरता नागरिकों की भागीदारी और कर्तव्यों के प्रति सजगता पर निर्भर करती हैं। जब नागरिक अपने कर्तव्यों के प्रति संवेदनशील होते हैं और उनका ईमानदारी से पालन करते हैं तो समाज में सकारात्मक बदलाव आते हैं और देश की प्रगति होती हैं। समाज की प्रगति, सुरक्षा और समृद्धि के लिए नागरिकों की अपने कर्तव्यों के प्रति संवेदनशीलता तथा कटिबद्धत्ता आवश्यक है। करों का समय पर और सही राशि का भुगतान करना नागरिकों का कर्तव्य है। देश की आर्थिक प्रगति के लिए करों का उचित प्रबंधन आवश्यक है। प्रत्येक नागरिक का यह भी कर्तव्य है कि वह समाज की भलाई के लिए स्वच्छता अभियान, पर्यावरण संरक्षण और सामुदायिक विकास जैसी सामाजिक सेवाओं में भाग लें।  किसी भी देश के नागरिक यदि स्वदेशी उत्पादों को अपनाना प्रारम्भ करते हैं तो इससे देश में उद्योगों को बढ़ावा मिलता है, अन्य देशों में उत्पादित वस्तुओं का आयात कम होता है और देश में ही रोजगार के नए अवसर निर्मित होते हैं। स्वदेशी का मतलब विदेशी सामान इस्तेमाल नहीं करना है परंतु यह कार्य इतना आसान नहीं है क्योंकि आज विश्व के समस्त देश एक वैश्विक गांव में परिवर्तित हो गए हैं, जिसके चलते उत्पादों का एक देश से दूसरे देश में आयात एवं निर्यात बहुत आसान बन पड़ा है। आचार्य श्री विनोबा भावे जी कहते हैं स्वदेशी का अर्थ है आत्मनिर्भरता और अहिंसा। संघ ने इसमें एक बिंदु जोड़ दिया: आत्मनिर्भरता, अहिंसा और सादगी। प्रत्येक भारतीय नागरिक से अपेक्षा की जाती है कि वह मितव्ययिता से जिए ताकि संसाधनों के दुरुपयोग को रोका जा सके। परंतु, इसका आश्य  कंजूसी करना कदापि नहीं है।  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे सामाजिक संगठनों के साथ ही केंद्र सरकार ने भी आर्थिक क्षेत्र में कई प्रयास किए हैं जिसके चलते हाल ही के समय में भारत की आर्थिक विकास दर में वृद्धि दर में लगातार सुधार दिखाई दिया है। विशेष रूप से ट्रम्प प्रशासन द्वारा भारत से अमेरिका को होने वाले विभिन्न उत्पादों के निर्यात पर लगाए गए 50 प्रतिशत के टैरिफ के प्रभाव को लगभग शून्य करने के उद्देश्य से भारत ने विभिन्न देशों के साथ द्विपक्षीय मुक्त व्यापार समझौते सम्पन्न किए हैं, इनमे विशेष रूप से शामिल हैं यूनाइटेड किंगडम, ओमान, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, आदि। यूरोपीयन देशों के साथ भी मुक्त व्यापार समझौता शीघ्र ही सम्पन्न होने जा रहा है। सम्भवत 27 जनवरी 2026 को इस मुक्त व्यापार समझौते पर यूरोपीयन यूनियन एवं भारत द्वारा हस्ताक्षर किए जाएंगे। साथ ही, अमेरिका द्वारा भारतीय उत्पादों के आयात पर लगाए गए 50 प्रतिशत के टैरिफ से प्रभावित होने वाले उत्पादों के लिए भारत ने अन्य देशों के रूप में बाजार तलाश लिए हैं एवं इन देशों को विभिन्न उत्पादों का निर्यात प्रारम्भ हो चुका है जिससे नवम्बर 2025 एवं दिसम्बर 2025 माह में भारत से विभिन्न उत्पादों के निर्यात में वृद्धि दर हासिल की जा सकी है। वैसे, भारत और अमेरिका के बीच भी मुक्त व्यापार समझौते को लगभग अंतिम रूप दिया जा चुका है एवं शीघ्र ही इसकी घोषणा की जा सकती है। इसके बाद तो भारतीय उत्पादों के अमेरिका को होने वाले निर्यात पर लगाए गए 50 प्रतिशत को भी कम अथवा समाप्त किया जा सकता है, इससे अन्य देशों के साथ साथ अमेरिका को भी भारत से होने वाले विभिन्न उत्पादों के निर्यात में और अधिक वृद्धि हासिल की जा सकेगी।       प्रहलाद सबनानी 

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भारत में एक नए उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक का निर्माण हुआ है

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हिंदू सनातन संस्कृति के संस्कारों में समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व के निर्वहन के लिए नागरिकों को जागरूक किए जाने का प्रयास लगातार किया जाता रहा है और पश्चिमी सभ्यता के आधार पर केवल अधिकार के भाव को बढ़ावा नहीं दिया जाता है। हिंदू वेदों एवं पुराणों के अनुसार प्रत्येक राजा का यह प्रथम कर्तव्य है कि वह अपने राज्य में निवास कर रहे नागरिकों की समस्याओं को दूर करने का भरसक प्रयास करे ताकि उसके राज्य में नागरिक सुख शांति से प्रसन्नता पूर्वक निवास कर सकें। पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने “एकात्म मानववाद” के सिद्धांत को विकसित किया था। यह एक ऐसा सिद्धांत है जो व्यक्ति एवं समाज के बीच एक संतुलित सम्बंध स्थापित करने पर जोर देता है। एकात्म मानववाद का उद्देश्य प्रत्येक मानव को गरिमापूर्ण जीवन प्रदान करना है एवं अंत्योदय अर्थात समाज के निचले स्तर पर स्थित व्यक्ति के जीवन में सुधार करना है। विशेष रूप से भारत में आज के परिप्रेक्ष्य में इस सिद्धांत का आश्य यह भी है कि सरकारी योजनाओं का लाभ समाज में अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचाने का लक्ष्य प्रत्येक राजनीतिक दल का होना चाहिए। परंतु, आज की पश्चिमी सभ्यता, जो पूंजीवाद पर आधारित नीतियों पर चलती हुई दिखाई देती है, के अनुसरण में मानव केवल अपने हितों का ध्यान रखता हुआ दिखाई देता हैं एवं अपना केवल भौतिक (आर्थिक) विकास करने हेतु प्रयासरत रहता है और उसमें अपने परिवार एवं समाज के प्रति जिम्मेदारी के भाव का पूर्णत: अभाव दिखाई देता है। अतः विश्व के समस्त देशों द्वारा अपने नागरिकों एवं समाज के प्रति उत्तरदायित्व के निर्वहन को आंकने के उद्देश्य से भारत में उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक का निर्माण किया गया है। नई दिल्ली में दिनांक 20 जनवरी 2026 को उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक (Responsible Nations Index) का लोकार्पण किया गया। यह पहल देशों का मूल्यांकन केवल शक्ति अथवा समृद्धि से नहीं, बल्कि नागरिकों, पर्यावरण एवं वैश्विक समुदाय के प्रति उनके उत्तरदायित्व के निर्वहन के आधार पर करने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है। 21वीं सदी के लिए यह विमर्श समयोचित और आवश्यक है।        उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक को पूर्व राष्ट्रपति श्री रामनाथ कोविंद ने डॉक्टर अम्बेडकर अंतरराष्ट्रीय केंद्र, नई दिल्ली में आयोजित एक भव्य कार्यक्रम में राष्ट्र को समर्पित किया। वैश्विक स्तर पर इस प्रकार का सूचकांक पहली बार बनाया गया है और इसे बनाने में भारत के ही विभिन्न संस्थानों ने अपना योगदान दिया है। इस सूचकांक के माध्यम से यह आंकने का प्रयास किया गया है कि विभिन्न देशों द्वारा अपने नागरिकों के हित में अपने अधिकारों का उत्तरदायित्वपूर्ण प्रयोग किस प्रकार किया जा रहा है (आंतरिक उत्तरदायित्व का निर्वहन), वैश्विक समुदाय के प्रति अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन किस प्रकार किया जा रहा है (बाह्य उत्तरदायित्व का निर्वहन) एवं पर्यावरण को बचाने के लिए अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन किस प्रकार किया जा रहा है (पर्यावरण उत्तरदायित्व का निर्वहन)। उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक 7 आयाम, 15 दृष्टिकोण एवं 58 संकेतकों को शामिल करते हुए निर्मित किया गया है। विश्व के 154 देशों का इस सूचकांक के आधार पर मूल्यांकन किया गया है। सिंगापुर को इस सूचकांक की रैकिंग में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ है, इसके बाद स्विजरलैंड द्वितीय स्थान पर, डेनमार्क तृतीय स्थान पर, साइप्रस चौथे स्थान पर रहे हैं। भारत को 16वां स्थान प्राप्त हुआ है। विश्व के शक्तिशाली देशों का स्थान उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक की सूची में बहुत निचले स्तर पर पाया गया है। अमेरिका 66वें स्थान पर रहा है, जो लिबिया से भी एक पायदान नीचे है। जापान 38वें स्थान पर रहा है। पाकिस्तान 90वें स्थान पर, चीन 68वें स्थान पर एवं अफगानिस्तान 145वें स्थान पर रहा है।  उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक का निर्माण मुख्य रूप से भारतीय प्रबंधन संस्थान (IIM), मुंबई एवं जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, दिल्ली ने मिलकर किया है। इस सूचकांक के निर्माण में 3 वर्षों तक लगातार कार्य किया गया है एवं उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक के निर्माण में विश्व बुद्धिजीवी प्रतिष्ठान का भी सहयोग लिया गया है। उक्त सूचकांक के निर्माण के लिए कुल 154 देशों से विभिन्न मापदंडों पर आधारित वर्ष 2023 तक के सम्बंधित आंकडें इक्ट्ठे किये गए है एवं इन आंकड़ों एवं जानकारी का विश्लेषण करने के उपरांत इस सूचकांक का निर्माण किया गया है। यह आंकड़े एवं जानकारी विश्व बैंक, संयुक्त राष्ट्र संघ, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, विश्व स्वास्थ्य संगठन एवं खाद्य एवं कृषि संस्थान जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थानों से लिए गए है।      आज पूरे विश्व में विभिन्न देशों की आर्थिक प्रगति को सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर से आंका जाता है, यह मॉडल पूंजीवाद पर आधारित है एवं इस मॉडल के अनुसार देश में कृषि, उद्योग एवं सेवा क्षेत्रों में हुए उत्पादन को जोड़कर सकल घरेलू उत्पाद का आंकलन किया जाता है। इस मॉडल में कई प्रकार की कमियां पाई जा रही है। किसी भी देश में पनप रही आर्थिक असमानता, गरीबी रेखा से नीचे जीवन जी रहे नागरिकों की आर्थिक प्रगति, मुद्रा स्फीति, बेरोजगारी एवं वित्तीय समावेशन जैसे विषयों पर उक्त मॉडल के अंतर्गत विचार ही नहीं किया जाता है। अमेरिका सहित विश्व के कई देशों में अब यह मांग की जा रही है कि आर्थिक प्रगति को आंकने के लिए सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि सम्बंधी मॉडल के स्थान पर एक नए मॉडल का निर्माण किया जाना चाहिए।  भारतीय सनातन संस्कृति के अनुसार, किसी भी राष्ट्र में आर्थिक प्रगति तभी सफल मानी जाएगी जब पंक्ति में अंतिम पायदान पर खड़े नागरिक को भी समाज हित में बनाई जा रही आर्थिक नीतियों का लाभ पहुंचे। वर्तमान में, सकल घरेलू उत्पाद के अनुसार आर्थिक प्रगति आंकने के मॉडल में इस प्रकार की व्यवस्था नहीं है इसीलिए कई देशों में गरीब और अधिक गरीब हो रहे है तथा अमीर और अधिक अमीर हो रहे है। नए विकसित किए गए उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक में यह आंकने का प्रयास किया गया है कि शासन प्रणाली किस प्रकार से नैतिक धारणाओं को ध्यान में रखकर अपनी आर्थिक नीतियों का निर्माण कर रही है, राष्ट्र में समावेशी विकास हो रहा है अथवा नहीं एवं राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने दायित्वों के निर्वहन के संदर्भ में सरकार द्वारा किस प्रकार की नीतियां बनाई जा रही हैं। साथ ही, धर्म आधारित सदाचार सम्बंधी भारतीय सभ्यता एवं वैश्विक सुख शांति स्थापित करने के सम्बंध में किस प्रकार देश की नीतियां निर्धारित की जा रही हैं, इस विषय को भी उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक के निर्माण में स्थान दिया गया है। पश्चिमी देशों की अर्थव्यवस्थाएं आर्थिक प्रगति तो तेज गति से करती दिखाई देती हैं और कई पश्चिमी देश आज विकसित देशों की श्रेणी में शामिल भी हो गए हैं। परंतु, इन देशों में मानवतावादी दृष्टिकोण का पूर्णत: अभाव है। पूंजीवाद पर आधारित अर्थव्यवस्थाओं में केवल “मैं” के भाव को स्थान प्राप्त है। “मैं” किस प्रकार आर्थिक प्रगति करुं, इस “मैं” के भाव में परिवार एवं समाज कहीं पीछे छूट जाता है। इससे पश्चिमी देशों में सामाजिक तानाबाना पूर्णत: छिन्न भिन्न हो रहा है। युवा वर्ग अपने माना पिता की देखभाल करने के लिए तैयार ही नहीं हैं। आज अमेरिका में लगभग 6 लाख बुजुर्ग खुले आसमान के नीचे अपना जीवन यापन करने को मजबूर हैं क्योंकि उनके बच्चे उन्हें अकेला छोड़कर केवल अपना आर्थिक विकास करने में संलग्न हैं। इसी प्रकार की कई सामाजिक कुरीतियों ने पश्चिमी देशों में अपने पैर पसार लिए हैं। पश्चिमी सभ्यता के ठीक विपरीत, भारतीय संस्कृति में “मैं” के स्थान पर “हम” के भाव को प्रभावशाली स्थान प्राप्त है। भारतीय सनातन संस्कृति पर आधारित संस्कारों को ध्यान में रखकर ही विभिन्न देशों द्वारा अपने नागरिकों के प्रति उनके उत्तरदायित्व को आंकने का प्रयास उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक के माध्यम से किया गया है। संक्षेप में एक बार पुनः यह बात दोहराई जा सकती है कि उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक विविध देशों का आंकलन पारम्परिक शक्ति अथवा सकल घरेलू उत्पाद केंद्रित मानकों के बजाय उत्तरदायी शासन के आधार पर करता है। यह सूचकांक तीन मूल आयामों पर आधारित है – (1) आंतरिक उत्तरदायित्व अर्थात गरिमा, न्याय और नागरिक कल्याण का आंकलन करता है। (2) पर्यावरणीय उत्तरदायित्व अर्थात प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और जलवायु कार्यवाही का मूल्यांकन करता है। (3) बाह्य अत्तरदायित्व अर्थात शांति, बहुपक्षीय सहयोग और वैश्विक स्थिरता में किसी देश के योगदान को मापता है। यह सूचकांक वैश्विक आंकलन को आर्थिक एवं सैन्य शक्ति के पारम्परिक मानकों से पृथक कर नैतिक शासन, सामाजिक कल्याण, पर्यावरणीय संरक्षण और अंतरराष्ट्रीय उत्तरदायित्व पर केंद्रित करता है। यह सूचकांक मूल्य आधारित और मानव केंद्रित ढांचे को बढ़ावा देता है, जो नैतिक नेतृत्व, सतत विकास और वैश्विक शासन में सुधार सम्बंधी भारत की दृष्टि के अनुरूप है। इस प्रकार भारत ने वैश्विक स्तर पर संभवत: प्रथम सूचकांक जारी किया है। यदि वैश्विक स्तर पर कई देश इस सूचकांक के आधार पर अपने देश के नागरिकों के प्रति अपने उत्तरदायित्व के निर्वहन के आंकलन पर ध्यान देने का प्रयास करेंगे तो निश्चित ही उत्तरदायी राष्ट्र सूचकांक पूरे विश्व में एक क्रांतिकारी सूचकांक के रूप में स्थापित होगा।    प्रहलाद सबनानी 

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आर्थिकी

मनरेगा में सुधार का विरोध अनावश्यक है

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राजेश कुमार पासी मोदी सरकार ने जब से मनरेगा का नाम बदलकर जी रामजी किया है, तब से कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इसका विरोध कर रहे हैं। इसके विरोध में कांग्रेस ने 45 दिन का विरोध आंदोलन शुरू किया था जो कि अभी भी चल रहा है। तेलंगाना, पंजाब और कर्नाटक की विधानसभा  में इसके खिलाफ प्रस्ताव भी पास किया गया है। केरल, बंगाल और तमिलनाडु में भी इसका जबरदस्त विरोध किया जा रहा है। विपक्षी दलों का सबसे पहला विरोध तो मनरेगा का नाम बदलने को लेकर ही है। उनका कहना है कि इस योजना से गाँधीजी का नाम क्यों हटाया गया है। इसके अलावा योजना के स्वरूप में बदलाव का भी विरोध किया जा रहा है जिसमें मोदी सरकार ने योजना को मांग आधारित से बदलकर आपूर्ति आधारित बना दिया है। अब इस योजना पर केंद्र सरकार का नियंत्रण ज्यादा हो गया है. इसके अलावा राज्यों पर भी वित्तीय बोझ डाला गया है। विपक्षी दल इसे राज्यों की स्वायत्तता पर हमला बता रहे हैं और उनका कहना है कि सरकार ने राज्यों पर वित्तीय बोझ लाद दिया है। कुछ राज्यों द्वारा इस योजना को अदालत में भी चुनौती देने की तैयारी की जा रही है। दूसरी तरफ केंद्र सरकार का कहना है कि उसने रोजगार गारंटी को 100 से 125 दिन कर दिया है। पहले इस योजना का सारा खर्च केंद्र सरकार द्वारा वहन किया जाता था, लेकिन अब राज्यों को भी 10-40 फीसदी बोझ सहन करना होगा। केंद्र सरकार का कहना है कि उसने ऐसा इसलिए किया है क्योंकि वो राज्यों की जवाबदेही तय करना चाहती है। केंद्र द्वारा सारा पैसा देने के कारण राज्य योजना पर ध्यान नहीं देते थे। सरकार ने बुवाई/कटाई के 60 दिनों के दौरान रोजगार पर रोक लगा दी है ताकि खेती के लिए मजदूर कम न पड़े। अब इस योजना में हर ग्रामीण परिवार को 125 दिन की वेतन आधारित गारंटी दी गयी है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस योजना को समग्र ग्रामीण विकास के साथ जोड़ा गया है। अब ये योजना सिर्फ पैसा बांटने तक सीमित नहीं रह गई है बल्कि इससे ग्रामीण इलाकों के विकास कार्यों को जोड़ा गया है। इस योजना के बारे में यह आम धारणा है कि इस योजना में सारे काम कागजों में किए जाते हैं, केंद्र सरकार इस धारणा को तोड़ना चाहती है। केंद्र सरकार चाहती है कि इस योजना के अंतर्गत किये गए कार्य धरातल पर दिखने चाहिए। सच तो यह है कि कागजों में काम होने की धारणा इसलिए बनी है क्योंकि इस योजना में किये गए काम धरातल पर दिखाई नहीं देते हैं ।                जब से मोदी सरकार सत्ता में आई है, उसकी हर योजना और कार्यो का विरोध करना विपक्षी दलों की आदत हो गई है। अगर मोदी सरकार ने सिर्फ योजना का नाम बदला होता तो कांग्रेस का विरोध जायज ठहराया जा सकता था लेकिन सरकार ने इस योजना में बड़े बदलाव किए हैं । ऐसा लगता है कि सरकार ने जानबूझकर कर योजना के नाम में बदलाव किया है, ताकि योजना की पहचान उसके साथ जुड़ जाए। कांग्रेस यह तो देख रही है कि केंद्र सरकार ने योजना से गांधी जी का नाम हटा दिया है लेकिन वो यह नहीं देख पा रही है कि अब योजना के साथ भगवान राम का नाम जोड़ दिया गया है। सच तो यह है कि भगवान राम ग्रामीण भारत के रग-रग में बसे हुए हैं, इसलिए मोदी सरकार ने इस योजना में राम का नाम जोड़ा है। कांग्रेस और दूसरे विपक्षी दलों को बताना चाहिए कि मोदी सरकार ने जो बदलाव किए हैं, क्या वो नहीं किये जाने चाहिए थे । ये योजना यूपीए सरकार द्वारा शुरू की गई थी, क्या आज कांग्रेस इस योजना में हुए भ्रष्टाचार की जिम्मेदारी ले सकती है। क्या कांग्रेस बता सकती है कि हज़ारो करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद इस योजना में किये गए विकास कार्य धरातल पर क्यों दिखाई नहीं देते।  यूपीए सरकार के दौरान इस योजना के कार्यान्वयन में इतनी खामियां थी कि इसमें सुधार जरूरी हो गए थे। मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद इस योजना में बड़े बदलाव किए थे, क्योंकि भ्रष्टाचार के कारण जनता के पैसे की बर्बादी हो रही थी। इस योजना के बारे में कहा जाता था कि पहले गड्ढे किये जाते हैं और फिर उन्हें भरा जाता है। कुछ समय पहले 55 जिलों में की जांच में 300 करोड़ के घोटाले इस योजना में सामने आए हैं। इससे पता चलता है कि इस योजना का पैसा अनावश्यक कार्यो पर खर्च किया जा रहा था। ग्रामीण विकास मंत्रालय का कहना है कि इस योजना का संचालन ही ऐसा है कि इसमें भ्रष्टाचार होता है। यही कारण है कि इस योजना में किये जाने वाले काम किसी को दिखाई नहीं देते। इस योजना के अंतर्गत किये जाने वाले कामों के निरीक्षण की कोई व्यवस्था नहीं है, जिसके कारण पैसों की बंदरबांट होती है। मोदी सरकार का तो कहना है कि इस योजना में सुधार बहुत पहले किया जाना चाहिए था। इससे सवाल तो मोदी सरकार पर भी उठता है कि उसने इस सुधार के लिए इतना वक्त क्यों लिया । कांग्रेस को बताना चाहिए कि उसने इस योजना में निरीक्षण की व्यवस्था क्यों नहीं की थी जिसके कारण जनता के लाखों करोड़ रुपये खर्च होने के बावजूद किसी की कोई जवाबदेही नहीं है।                  ये योजना  गरीबों के साथ जुड़ी हुई है, क्योंकि इससे उन्हें रोजगार दिया जाता है जिससे उनका घर चलता है। इस योजना का विरोध करने वालों को गरीब विरोधी करार दिया जाता है, शायद इसलिए इसमें सुधार करने में इतनी देर लगाई गई है। कांग्रेस भी यही विमर्श चला रही है कि मोदी सरकार गरीब विरोधी है, इसलिए योजना में बदलाव किया गया है। इस योजना में फर्जीवाड़े की एक खबर सामने आई है कि इस योजना में पंजीकृत पांच लाख मजदूरों की उम्र 80 साल से ज्यादा थी । मनरेगा में इन श्रमिकों से  कठिन परिश्रम वाले काम कराए गए थे, जिसमें गड्ढे खोदना, तालाबों, पोखरों और कच्ची सड़कों का निर्माण करना शामिल हैं। 80 साल से ज्यादा उम्र वाले लोगों के लिए फावड़ा उठाकर ये काम करना असम्भव है । इससे साबित होता है कि इन श्रमिकों के नाम पर सरकारी पैसे की लूट की गई है। ग्रामीण विकास मंत्रालय की जांच में सामने आया है कि इनमें से कई लोगों की कार्य क्षमता खत्म हो चुकी थी और कुछ लोगों की तो मृत्यु भी हो चुकी है। देशभर में मनरेगा योजना के अंतर्गत 6.5 करोड़ लोग पंजीकृत है जिसमें से एक करोड़ लोगों की उम्र 61 साल से ज्यादा है।  इसका मतलब है कि लगभग 15 प्रतिशत लोग इस लायक नहीं हैं कि उनसे कठिन परिश्रम का काम कराया जा सके । आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, पंजाब, गोआ, पुडुचेरी, लद्धाख,मणिपुर जैसे राज्यों में 61 से 80 साल वाले श्रमिकों की संख्या 20 प्रतिशत से अधिक है। जहां तक 80 साल से ज्यादा उम्र वाले श्रमिकों की बात है तो इसमें आंध्रप्रदेश में 1,22,902, तेलंगाना में 1,22,121, तमिलनाडु में 58,976 और राजस्थान में 36,119 श्रमिक पंजीकृत हैं। वैसे इसमें हैरानी नहीं होनी चाहिये क्योंकि जब इस योजना में मरे हुए लोग काम कर सकते हैं तो 80 साल वाले क्यों नहीं कर सकते। ये हालत तब है, जब मोदी सरकार ने भुगतान को बैंक खातों और आधार से जोड़ दिया है। ऐसे में सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है, जब सारा भुगतान नकद में किया जा रहा था, तब इस योजना की क्या हालत होगी । सच तो यह है कि इस योजना में काम करने के लिए युवा अपनी बारी का इंतजार करते थे तो योजना का बड़ा हिस्सा बुजुर्गों के नाम पर हजम कर लिया जाता था। गरीबों के नाम पर देश के पैसे की बर्बादी का इससे बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है। देखा जाए तो कांग्रेस का दूसरा नाम ही भ्रष्टाचार है, जिसकी हर योजना देश का पैसा लूटने का साधन थी । इस योजना में जबरदस्त लूट मचाई गयी है । कांग्रेस को योजना में बदलाव का विरोध करने की जगह ये बताना चाहिए कि इस लूट में उसकी जेब में कितना पैसा गया है । जब योजना का कार्यान्यवन करने की क्षमता कांग्रेस सरकार के पास नहीं थी तो उसने ऐसी योजना लागू ही क्यों की थी। क्या यह माना जाए कि ये योजना सरकारी धन को लूटने के लिए ही लायी गयी थी।                मोदी सरकार ने योजना का नाम बदलने के साथ-साथ जो बदलाव किए हैं, वो बहुत जरूरी हैं।  हज़ारो करोड़ रुपये खर्च होने के बाद जमीन पर कोई काम न दिखना ही भ्रष्टाचार का सबूत है। जनता ने देश चलाने की जिम्मेदारी मोदी सरकार को दी हुई है और ये सरकार पिछले 11 सालों से लगातार काम कर रही है। 11 सालों के शासन के बावजूद मोदी की लोकप्रियता घटने की जगह बढ़ रही है, इसका मतलब है कि जनता मोदी पर विश्वास करती है और उनके काम से खुश है। जनता यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार और नाकामियों को अभी तक नहीं भूली है, इसलिए कांग्रेस केंद्र के साथ-साथ राज्यों की सत्ता से भी बाहर हो गई है। विपक्ष होने के नाते कांग्रेस द्वारा सरकार का विरोध करना सही है लेकिन विरोध के लिए विरोध नहीं होना चाहिए। मनरेगा में बदलाव के विरोध के कारण इसकी खामियां उजागर हो रही हैं। जहां कांग्रेस इस योजना में बदलाव के विरोध से सरकार को घेरना चाहती है तो दूसरी तरफ इस योजना की खामियां सामने आने से कांग्रेस खुद कठघरे में खड़ी हो गई है। जनता को रोजगार देना सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन इसके साथ-साथ सरकार की जिम्मेदारी यह भी है कि पैसे का इस्तेमाल सही तरीके से हो। कांग्रेस को विरोध करने के लिए सही मुद्दे चुनने चाहिए ताकि जनता में उसकी विश्वसनीयता बढ़े ।  राजेश कुमार पासी

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आर्थिकी

विश्व आर्थिक मंच पर भारतीय ट्रेड कूटनीति के मायने

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कमलेश पांडेय दावोस में चली विश्व आर्थिक मंच (WEF) की बैठक में भारत ने अपनी मजबूत कूटनीतिक और आर्थिक उपस्थिति दर्ज कराई है। यहां पर भारतीय ट्रेड कूटनीति ने जो पॉलिसी नैरेटिव सेट किए और ग्लोबल इमेज विकसित किया, वह यहां कई मायने में अहम है। सबसे बड़ी बात तो यह कि यहां पर भारत ने वैश्विक निवेशकों के सामने खुद को चीन का वैकल्पिक हब के रूप में प्रस्तुत किया और विकसित भारत होने का स्थायी नजरिया पेश किया। दरअसल, इस अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत ने जिस आर्थिक स्थिरता, वैश्विक लोकतंत्र और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना पर बल दिया, उससे वैश्विक नीति-निर्धारण में इंडिया की भूमिका और अधिक मजबूत हुई। जब संयुक्त राष्ट्र संघ की कीमत पर अमेरिका नई विश्व व्यवस्था को बढ़ावा देने हेतु एक से बढ़कर एक जोखिम भरे दांव चल रहा हो, उस दौर में भी भारत की यह अहम उपस्थिति बहुत कुछ चुगली करती है क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत को उभरती हुई वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करने के मोदी सरकार के इरादे स्पष्ट हैं जिसे भरपूर दुनियावी समर्थन भी मिल रहा है। इसके अहम आर्थिक व कूटनीतिक मायने हैं। देखा जाए तो इस महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय बैठक में भारत के विभिन्न केंद्रीय मंत्रियों, कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों और प्रमुख उद्योगपतियों के बड़े प्रतिनिधिमंडल ने जिस तैयारी के साथ शिरकत की और निजी वैश्विक निवेश आकर्षित करने पर जोर दिया, उसका रणनीतिक महत्व है। इस दौरान देखा गया कि दावोस में भारत का प्रतिनिधिमंडल रेल, आईटी, ऊर्जा और उद्योग जैसे मंत्रालयों के मंत्रियों के साथ महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश, असम, मध्य प्रदेश, तेलंगाना और झारखंड जैसे राज्यों के मुख्यमंत्रियों तक फैला हुआ था जबकि रिलायंस, टाटा, महिंद्रा, इंफोसिस जैसे अंतर्राष्ट्रीय कॉरपोरेट दिग्गजों की भागीदारी ने निजी क्षेत्र में भारत की अहम ताकत दिखाई।  इससे नानाविध लाभ मिला और निवेश समझौते हुए, जैसे महाराष्ट्र के लिए हजारों करोड़ के एमओयू पर हस्ताक्षर होना। इससे दावोस में भारत पर चर्चा का केंद्र बना रहा। चर्चा भी वह कि क्या भारत मैन्युफैक्चरिंग और निवेश का नया हब बन सकता है, खासकर दिन ब दिन बदलते भू-राजनीतिक तनावों के बीच। सबसे खास बात यह कि वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (WEF) के अध्यक्ष ने भारत को सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बताते हुए पीएम मोदी के सुधारों और ग्लोबल साउथ की आवाज की भरपूर सराहना की। इससे भारत-ईयू व्यापार समझौते पर भी सकारात्मक इनपुट के संकेत मिले। इस तरह से देखा जाए तो दावोस (WEF 2026) की मौजूदा बैठक से भारत को सीधे‑सीधे दो तरह के बड़े फायदे मिलते दिखाई दे रहे हैं– पहला, निवेश व व्यापार के ठोस मौके, और दूसरा, भारत की छवि व कूटनीतिक प्रभाव में बढ़त। वहीं, निवेश और जॉब के बेशुमार मौके मिलने की बात अलग है। कहना न होगा कि भारत का पवेलियन और अलग‑अलग राज्य (खासतौर पर उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र आदि) दावोस में निवेश आकर्षित करने के लिए आक्रामक तरीके से रोडशो, मीटिंग और एमओयू साइन कर रहे हैं, जिनका फोकस मैन्युफैक्चरिंग, हरित ऊर्जा, डेटा सेंटर व डिजिटल इकोनॉमी पर है।  दरअसल पिछले सालों के ट्रेंड के आधार पर दावोस प्लेटफॉर्म से भारत को अरबों डॉलर के निवेश आश्वासन मिलते रहे हैं, जो बाद में प्लांट, इंफ्रास्ट्रक्चर और स्टार्टअप फंडिंग के रूप में नौकरियां और उत्पादन क्षमता बढ़ाते हैं। वहीं इस बार की खास बात यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दावोस में भारतीय बड़े उद्योगपतियों और कॉरपोरेट लीडर्स के साथ विशेष बैठक कर रहे हैं, जिसे संभावित भारत‑अमेरिका व्यापार समझौते की दिशा में सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। यदि यहां किसी प्रकार की रूपरेखा या राजनीतिक सहमति बनती है तो आगे चलकर टैरिफ, मार्केट एक्सेस और टेक्नोलॉजी/डिफेंस कोऑपरेशन में भारत के लिए बेहतर शर्तें निकल सकती हैं। विश्व आर्थिक मंच (WEF) पर भारत को “सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था”, ग्लोबल ग्रोथ में लगभग 20 प्रतिशत योगदान देने की क्षमता वाला देश और ग्लोबल साउथ की मजबूत आवाज़ के रूप में प्रोजेक्ट किया जा रहा है। इससे भारत की पॉलिसी नैरेटिव मजबूत हुई है और देश के ग्लोबल इमेज में उत्तरोत्तर सुधार होते रहने के संकेत मिले हैं। ऐसा इसलिए कि अश्विनी वैष्णव जैसे नरेंद्र मोदी के कुशल मंत्री वहाँ अगले 5 साल के लिए 6–8% ग्रोथ, 2047 तक प्रति व्यक्ति आय 5 गुना करने, ईज ऑफ डूइंग बिज़नेस, लेबर रिफॉर्म और डिजिटल पब्लिक इंफ्रा (UPI आदि) जैसे एजेंडा को सफलता पूर्वक पेश कर रहे हैं, जिससे विदेशी निवेशकों का भारत पर भरोसा बढ़ता है। उनकी कोशिशों से भारत के राज्यों को भी भरपूर लाभ मिलने वाले हैं। उदाहरण के तौर पर प्रधानमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र राज्य उत्तर प्रदेश जैसे राज्य अपने इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट, डिफेंस कॉरिडोर, डेटा सेंटर व मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर को ग्लोबल प्लेयर्स के सामने रख कर अलग से निवेश आकर्षित कर रहे हैं, जिससे क्षेत्रीय स्तर पर इंडस्ट्रियलाइजेशन की संभावनाएं बढ़ती हैं। वहां देखा गया कि दावोस का “इंडिया पवेलियन” अब डील‑मेकिंग का हब बन चुका है, जहाँ राज्य सरकारें और केंद्र सरकार संयुक्त रूप से “टीम इंडिया” के रूप में प्रेज़ेंट हो रही हैं। इससे दुनिया को स्पष्ट संदेश जाता है कि भारत में नीतिगत स्थिरता और कोऑर्डिनेशन की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर है। आर्थिक विश्लेषकों का कहना है कि भले ही दावोस से सीधे सीधे किसी को सब्सिडी या स्कीम नहीं मिलती है, लेकिन वहां तय हुए निवेश, व्यापार समझौते, और पॉलिसी भरोसे का असर मीडियम टर्म में नौकरियों, इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट, बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के रूप में स्पष्ट दिखता है। यहां पर यदि भारत निवेश का भरोसेमंद सेंटर बनता प्रतीत होता है तो मैन्युफैक्चरिंग/ग्रीन एनर्जी/डिजिटल सेक्टर में बड़े प्रोजेक्ट आते हैं, जिसका असर वेतन, लोकल इकोनॉमी, टैक्स रेवेन्यू और कल्याणकारी व्यय पर पड़ेगा, जो अंततः आम नागरिक तक पहुँचेगा। यही वजह है कि दावोस की हालिया विश्व आर्थिक मंच (WEF) 2026 बैठक में भारत ने निवेश आकर्षण और आत्मनिर्भरता पर केंद्रित प्रमुख पहलों की घोषणा की, जिसमें निजी क्षेत्र की बड़ी योजनाएं शामिल रहीं। ये घोषणाएं महाराष्ट्र, असम और झारखंड जैसे राज्यों में ऊर्जा, मैन्युफैक्चरिंग और डिजिटल इंफ्रा पर फोकस करती हैं। यदि उपलब्धियों की बात करें तो अडानी ग्रुप ने एविएशन, क्लीन एनर्जी, डिजिटल इंफ्रा और एडवांस मैन्युफैक्चरिंग में 6 लाख करोड़ रुपये (लगभग 6.6 बिलियन डॉलर) के निवेश का ऐलान किया। इसमें असम में 2700 मेगावाट सौर क्षमता, महाराष्ट्र में धारावी पुनर्विकास, नवी मुंबई एयरपोर्ट लॉजिस्टिक्स, 3000 मेगावाट ग्रीन डेटा सेंटर, 8700 मेगावाट पंप्ड स्टोरेज और सेमीकंडक्टर फैब शामिल हैं। यह 7-10 वर्षों का प्लान रोजगार सृजन और ऊर्जा संक्रमण को बढ़ावा देगा। वहीं, झारखंड में टाटा स्टील ने ग्रीन स्टील प्रोजेक्ट्स के लिए 11,000 करोड़ रुपये निवेश की प्रतिबद्धता जताई जबकि महाराष्ट्र ने रायगढ़-पेण ग्रोथ सेंटर की घोषणा की, जो 1 लाख करोड़ के निवेश का केंद्र बनेगा। देखा जाए तो दावोस में वैश्विक साझेदारियां मजबूत हुईं हैं। यहीं पर भारत-यूरोपीय संघ के बीच व्यापार समझौते पर सकारात्मक प्रगति हुई, जिसे ईयू प्रमुख ने “मदर ऑफ ऑल डील्स” कहा। वहीं, केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने एआई (AI) समिट होस्ट करने की घोषणा की जो भारत के वैश्विक तकनीकी नेतृत्व को मजबूत करेगी। वहीं ये पहलें भारत को मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में स्थापित करने पर जोर देती हैं। कुलमिलाकर दावोस बैठक से भारत को प्राप्त निवेश प्रतिबद्धताएँ निम्नलिखित हैं जो मुख्य रूप से मैन्युफैक्चरिंग, हरित ऊर्जा, डेटा सेंटर और डिजिटल इकोनॉमी पर केंद्रित हैं, जो लाखों नौकरियाँ पैदा करने की क्षमता रखती हैं। इनसे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के माध्यम से 5-10 लाख नौकरियाँ बनने का अनुमान है, खासकर उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे बड़े व अहम राज्यों में। पिछले दावोस चक्रों के आधार पर 20 लाख करोड़ रुपये के निवेश से औसतन 5-8 लाख प्रत्यक्ष नौकरियाँ (फैक्ट्री वर्कर, इंजीनियर) और दोगुने अप्रत्यक्ष रोजगार (लॉजिस्टिक्स, सर्विसेज) उत्पन्न होते हैं। हरित ऊर्जा व डेटा सेंटर प्रोजेक्ट्स से विशेष रूप से 2-3 लाख हाई-स्किल्ड जॉब्स (टेक्नीशियन, एनालिस्ट) बनेंगी। पहला, मैन्युफैक्चरिंग: फैक्ट्री ऑपरेटर, स्किल्ड वेल्डर, क्वालिटी कंट्रोलर- 3 लाख+ जॉब्स, मुख्यतः स्किल्ड/सेमी-स्किल्ड श्रमिक। दूसरा, हरित ऊर्जा: सोलर इंस्टॉलर, विंड टरबाइन टेक्नीशियन, प्रोजेक्ट मैनेजर – 1-2 लाख जॉब्स, फोकस इंजीनियरिंग व सस्टेनेबिलिटी स्किल्स पर। तीसरा, डेटा सेंटर/डिजिटल: सर्वर एडमिन, डेटा एनालिस्ट, साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट– 1 लाख+ हाई-पे जॉब्स, आईटी/सॉफ्टवेयर बैकग्राउंड वालों के लिए। जहां तक इसके क्षेत्रीय प्रभाव की बात है तो उत्तर प्रदेश के डिफेंस कॉरिडोर व डेटा सेंटर से स्थानीय स्तर पर 2 लाख+ जॉब्स, जिसमें 40% महिलाओं/युवाओं के लिए आरक्षित हो सकती हैं। वहीं, महाराष्ट्र व गुजरात जैसे राज्य इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग से अतिरिक्त 1-2 लाख रोजगार जोड़ेंगे। इन जॉब्स में 60% स्किल्ड (ITI/डिप्लोमा) की जरूरत होगी, इसलिए ITI व अप्रेंटिसशिप ट्रेनिंग पर फोकस बढ़ेगा। देरी से बचने के लिए एमओयू लागू करने पर सबकुछ निर्भर करेगा अन्यथा सिर्फ 50-70% ही मटेरियलाइज होंगी। कमलेश पांडेय

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