खानाबदोश

banjaraसड़क के किनारे, छोटे-छोटे घरौंदों में

टिमटिमाती रोशनी के सहारे जीते हैं खानाबदोश

 

न समाज का फिक्र न ही सभ्यता की चाह

फकत दो वक़्त की रोटी है इनके जीने की चाह

 

दिन का उजाला हो या रात की तारीकी

सब दिन बराबर है इनकी जिन्दगी

 

कहीं संगतराशी तो कहीं बांस की कलाकारी

बेफिक्र, बेलौस हुनर की दिखाते हैं बाजीगरी

 

इंसान होकर भी इंसानी फितरतों, नफरतों से महरूम

बस लाचारी और बेबसी है इनके जिन्दगी का मजमून

 

सियासत, सरकार और सुविधा की उन्हे नहीं जरूरत

चिलचिलाती धूप में बहते पसीने की खुशबू से तर-बतर जीने की है आदत।।

एम. अफसर खां सागर

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एम. अफसर खां सागर
एम. अफसर खां सागर धानापुर-चन्दौली (उत्तर प्रदेश) के निवासी हैं। इन्होने समाजशास्त्र में परास्नातक के साथ पत्रकारिता में डिप्लोमा किया है। स्वतंत्र पत्रकार , स्तम्भकार व युवा साहित्यकार के रूप में जाने जाते हैं। पिछले पन्द्रह सालों से पत्रकारिता एवं रचना धर्मीता से जुड़े हैं। राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न अखबारों , पत्रिकाओं और वेब पोर्टल के लिए नियमित रूप से लिखते रहते हैं। Mobile- 8081110808 email- mafsarpathan@gmail.com

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