वेतन वृद्धि और वामपंथी सांसदों का विधवा विलाप

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-विजय कुमार

पिछले दिनों जब सांसदों ने वेतन वृद्धि के लिए शोर किया, तो प्रायः सभी दलों के सांसद इस बहती गंगा में हाथ धोने को आतुर दिखे। अपवाद रहे कुछ वामपंथी सांसद। इससे उनकी ऐसी छवि बनी, मानो वे गरीबों के बड़े हमदर्द हैं; पर इसके पीछे का सच क्या है, यह जान लेने से उनका पाखंड उजागर हो जाएगा।

असल में वामपंथी सांसदों और विधायकों को अपना पूरा वेतन पार्टी कोष में देना अनिवार्य है। उन्हें इसी शर्त पर सांसद या विधायक बनने का टिकट दिया जाता है। इसके पीछे यह 60 साल पुरानी सोच है कि वे हर काम दल के निर्देशानुसार, दल के लिए ही करेंगे, अतः उनके यातायात, भोजन, आवास आदि का प्रबन्ध दल करेगा; पर इन्हें मिलने वाले भत्तों पर दल का कोई अधिकार नहीं होता।

60 साल पहले जनप्रतिनिधियों के वेतन और भत्ते बहुत कम थे। जीवन शैली साधारण थी, महंगाई और दिखावा भी नहीं था; पर अब बढ़िया वेतन और उससे कई गुने भत्ते इन्हें मिलते हैं। वामपंथी सांसद वेतन वृद्धि का विरोध कर वाहवाही बटोर लेते हैं, चूंकि वह पैसा उनकी जेब में आता ही नहीं है; पर वे भत्तों के बारे में चुप रहते हैं, चूंकि वह उनका निजी पैसा होता है। पार्टी भी इसके बारे में उनसे पूछताछ नहीं करती।

अब शायद आप भी वामपंथी सांसदों द्वारा वेतन वृद्धि के विरोध में किये जाने वाले विधवा विलाप का रहस्य समझ गये होंगे।

हम कितने मूर्ख हैं ?

पाकिस्तान इस समय भीषण बाढ़ के संकट से जूझ रहा है। भारत ने मानवता के नाते उसे अरबों रुपये की सहायता दी है; पर उसका दिल कितना काला है, यह इसी से पता लगता है कि उसने एक सप्ताह तक भारत से राशि नहीं ली। अब उसने इस शर्त पर इसे स्वीकार किया है कि यह पहले संयुक्त राष्ट्र के कोष में जाएगी और फिर वह इसे पाकिस्तान के राहत कार्यों में खर्च करेगा।

सचमुच हम कितने मूर्ख हैं। पाकिस्तान हमारा शत्रु देश है। वह हर समय भारत को परेशान करने का प्रयास करता है। 1947, 65, 71 और 99 में वह हमारे विरुद्ध खुला युद्ध कर चुका है। एक समय पंजाब में खालिस्तानी उभार के पीछे वही था। कश्मीर समस्या को खाद-पानी वही दे रहा है। वह अपने यहां हिन्दुओं को क्रमशः समाप्त कर रहा है। बाढ़ में फंसे हिन्दुओं को गोमांस खिला रहा है। घुसपैठ का उसका नियमित कार्यक्रम जारी ही है; और हम मूर्ख फिर भी उसे पैसे दे रहे हैं।

यही काम गांधी ने किया था। पाकिस्तान कश्मीर पर कब्जा करने के लिए सेना भेज रहा था और गांधी महोदय उसे 55 करोड़ रु0 दिलाने के लिए अनशन पर बैठे थे। इसी से नाथूराम गोडसे विचलित हो गया और….।

वस्तुतः हमारे पास यह सुअवसर था कि हम उस पर हमला कर अपना कश्मीर वापस ले लेते। शेष पाकिस्तान के भी दो-तीन टुकड़े कर उसे सदा के लिए अपंग बना देते, जिससे वह फिर कभी भारत की ओर आंख तिरछी करने का साहस न कर सके; पर हाय रे मुस्लिम वोटों की लालसा, तू कैसे-कैसे नाच नचाती है ?

कोई कह सकता है कि दुख के समय तो पड़ोसी की सहायता करना मानवता है। बात ठीक है; पर यह भी ध्यान रखना चाहिए कि मानवता का व्यवहार मानवों के साथ किया जाता है, पशुओं या शत्रुओं के साथ नहीं।

यहां महाभारत का प्रसंग याद करना उचित होगा। जब कर्ण के रथ का पहिया धरती में धंस गया और वह उसे ठीक करने के लिए नीचे उतरा, तो श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कहा कि इस दुष्ट को दंड देने का यही उचित समय है। इस पर कर्ण युद्ध धर्म की दुहाई देने लगा। वह बताने लगा कि जब विपक्षी के हाथ में शस्त्र न हों, जब वह किसी संकट में फंसा हो, तब उससे युद्ध नहीं किया जाता।

इस पर श्रीकृष्ण ने कहा – कर्ण, जब पांडवों को छलपूर्वक जुए में हराया गया था, तब तुम्हारा धर्म कहां था; जब द्रोपदी को भरी सभा में निर्वसन किया जा रहा था, तब तुम्हारा धर्म कहां था; जब अभिमन्यु को कई महारथियों ने घेर कर मारा था, तब तुम्हारा धर्म कहां था ? आज जब तुम स्वयं घिर गये हो, तो धर्म की दुहाई दे रहे हो।

ऐसे ही माहौल को देखकर कभी दुष्यन्त कुमार ने लिखा था –

कैसे मंजर सामने आने लगे हैं, गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं।

वे सलीबों के करीब आये तो हमको, कायदे-कानून समझाने लगे हैं।।

श्रीकृष्ण की खरी-खरी सुनकर कर्ण क्या कहता, उसने सिर झुका लिया; और फिर अर्जुन के अगले ही बाण से उसका सिर धड़ से अलग हो गया।

महाभारत का यह प्रसंग हमें बहुत कुछ सिखाता है; पर जो अपनी गलती को सुधार ले, वह मूर्ख कैसा; और हम ठहरे जन्मजात मूर्ख।

शठे शाठ्यम समाचरेत्

ममता बनर्जी बंगाल में सत्ता पाने को इतनी आतुर हैं कि उन्होंने अपनी बुद्धि और विवेक सब गिरवी रख दिया है। ज्ञानेश्वरी रेल दुर्घटना के आरोपी उमाकांत महतो और उससे पूर्व आंध्र के एक कुख्यात नक्सली आजाद की पुलिस मुठभेड़ में हुई मृत्यु पर भी वे प्रश्न उठा रही हैं। आश्चर्य तो यह है कि प्रणव मुखर्जी जैसा जिम्मेदार व्यक्ति भी उनकी हां में हां मिला रहा है।

ये दोनों क्रूर नक्सली चाहे जैसे मारे गये हांे; वे मुठभेड़ में मरे हों या सुरक्षा बलों ने उन्हें पकड़कर पास से गोली मारी हो, यह हर दृष्टि से उचित है। हमारे शास्त्र हमें शठे शाठ्यम समाचरेत् (जैसे को तैसा) का पाठ पढ़ाते हैं। अर्थात दुष्ट के साथ दुष्टता का ही व्यवहार उचित है।

जो नक्सली, कम्युनिस्ट, माओवादी या मजहबी आतंकवादी निरपराध लोगों को निशाना बना रहे हैं, उन्हें मारने को हत्या नहीं, वध कहते हैं। कंस ने हजारों निरपराध ब्रजवासियों की हत्या की; पर श्रीकृष्ण ने कंस का वध किया। रावण ने हजारों ऋषियों की हत्या की; पर श्रीराम ने उसका वध किया। हत्या सदा अनुचित है और वध सदा उचित। हत्यारे को दंड दिया जाता है, जबकि वध करने वाले को पुरस्कार; और वध के लिए साम, दाम, दंड, भेद जैसे सब तरीके भारतीय शास्त्रों ने उचित बताये हैं।

श्रीराम का जीवन यदि देखें, तो उन्होंने छिपकर बाली का वध किया। उन्होंने विभीषण के माध्यम से रावण के आंतरिक भेद जानकर फिर उसका वध किया। हनुमान ने अहिरावण को पाताल में जाकर मारा। क्योंकि रावण अधर्मी था; और अधर्मी को अधर्मपूर्वक मारना गलत नहीं है। महाभारत युद्ध में भी श्रीकृष्ण ने भीष्म, द्रोणाचार्य, कर्ण, जयद्रथ, दुर्योधन जैसे महारथियों को ऐसे ही छल से मरवाया; पर पूरा देश इन दोनों को अपराधी नहीं, भगवान मानता है।

इसलिए जिन वीर सुरक्षाकर्मियों ने आजाद, महतो या उन जैसे किसी भी आतंकी का वध किया हो, उन्हें पुरस्कृत किया जाना चाहिए। यदि शासन न करे, तो जनता उनका सम्मान करे। केवल आतंकी ही क्यों, उनके लिए साधन और समर्थक जुटाने वाले लेखक, पत्रकार, वकील, आतंकाधिकारवादी, साधुवेश आदि को भी यदि इसी तरह जहन्नुम पहुंचा दिया जाए, तो बहुत शीघ्र आतंकवाद की कमर टूट जाएगी।

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