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download (4)बीजेपी नेतृत्व ने केशव मौर्य को यूपी भाजपा अध्यक्ष पद पर बिठाकर पिछड़े वोट बैंक में सेंध लगाने की पुरजोर तैयारी की है। ऐसा करके पार्टी ने अपनी रणनीति का भी खुलासा कर दिया है। वह साफ तौर से पिछड़ो को साथ लेकर चलने की कोशिश करेगी ताकि वह वह मायावती के परम्परागत वोट बैंक में सेंध लगा सके। बसपा का कैडर वोट अगर बीजेपी की ओर झुकता है तो भाजपा के लिए यूपी की सत्ता तक पहुंचना मुश्किल नहीं होगा लेकिन मायावती का यूपी की एक राजनीति में एक अपना अलग ही वजूद है और उनके कितने प्रतिशत वोट मौर्या काट पायेगी यह कहना अभी जल्दबाजी होगा। मौर्य कुशवाहा समुदाय से आते हैं, जिसकी करीब 8 फीसदी यूपी में मौजूदगी है। मौर्या के द्वारा भाजपा कुर्मी, कोइरी व बनिया समुदाय को भी अपने पाले में करने की सोच रही है। देखा जाये तो वर्तमान में यूपी में भाजपा की स्थिति बहुत संतोषजनक नहीं है। उसे तीसरे नंबर की पार्टी का दर्जा हासिल है। पार्टी की स्थिति में सुधार करना और उसके परंपरागत वोट बैंक को बनाये रखना मौर्या का लक्ष्य होगा। भले ही 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के चलते भाजपा ने यूपी में 80 में से 73 सीटों पर जीत हासिल कर ली थी लेकिन मौर्या 2014 वाला प्रदर्शन 2017 विधानसभा में भी दोहरा पायेगे ऐसा कहना अभी अतिश्योक्ति होगी। केशव मौर्य, जिनका स्वयं का राजनीतिक सफर काफी दिलचस्प है वह 2012 में बीजेपी के विधायक बने, 2014 में सांसद और अब यूपी के अध्यक्ष पद की गद्दी पर सीधे आसीन हो गये। केशव मौर्य का आगे का सफर काफी पथरीला है जहां पर उनके सामने मायावती, मुलायम और अखिलेश जैसे कद्दावर नेताओं से है। वैसे देखा जाये तो भाजपा की वर्तमान में पूरे देश में उतनी मजबूत स्थिति में है जैसी 2014 में थी। उस समय मोदी लहर के चलते भाजपा ने यूपी से अप्रत्याशित सीटें जीत ली थी लेकिन वर्तमान में स्थितियां कठिन है। लोकसभा चुनाव के बाद से भाजपा की स्थितियों में लगातार परिवर्तन देखने को मिला। भाजपा के चुनाव से पहले किये गये कई वादे हवा-हवाई साबित हो गये। महंगाई असमान पर पहुंच गई है। मोदी सरकार की कई बाते अब जुमलेबाजी की जगह लेने लगी। दिल्ली और बिहार की गद्दी पर भाजपा का बैठना का स्वप्न पूरा नहीं हो सका। मोदी की लोकप्रियता में भले ही कोई कमी ना आये हो लेकिन ये लोकप्रियता वोट बैंक में तब्दील नहीं हो पा रही है। ऐसे में यूपी में भाजपा हिन्दुत्व के मुद्दे के सहारे अपनी वैतरणी पार करना चाहेगी। मौर्या वैसे भी संघी है और उनके आक्रमक भाषण इस काम को बखूबी अंजाम दे देंगे। सत्ता पर आसीन होने के लिए बीजेपी के लिए अगड़े-पिछड़े दोनों का समर्थन भी जरूरी होगा और ऐसे में जातीय संतुलन बनाने के लिए बीजेपी सीएम उम्मीदवार के लिए किसी सवर्ण का नाम घोषित कर सकती है।

देवेन्द्र शर्मा

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