स्वामी दयानन्द जी की गान विद्या में मर्मज्ञता के कुछ उदाहरण

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मनमोहन कुमार आर्य

गान वा संगीत विद्या का आरम्भ सामवेद से माना जाता है। स्वामी दयानन्द जी चार वेदों के शीर्षस्थ विद्वान थे। वह वेदों को समग्रता से जानते थे। उनके जीवन की कुछ घटनायें उपलब्ध होती हैं जो उन्हें साम-गान एवं गान विद्या का मर्मज्ञ विद्वान सिद्ध करती हैं। आर्यजगत के विद्वान आचार्य विपाश जी की प्रेरणा व सहयोग से हमने ऋषि की गान विद्या की कुछ घटनाओं का संग्रह किया है जिसे हम इस लेख के माध्यम से प्रस्तुत कर रहे है।

 

पहली घटना जयपुर की प्रस्तुत कर रहे हैं जो ऋषि भक्त डा. रामप्रकाश के सम्पादन में प्रकाशित ‘दण्डी जी की जीवनी’ में पुस्तक के पृष्ठ ‘ज’ से ‘झ’ तक दी गई है।

 

डा. रामप्रकाश जी लिखते हैं ‘‘एक अनसुलझे प्रसंग के सुलझाव का संकेत भी (दण्डी जी के शिष्य पं. मुकुन्द देव जी लिखित जीवनी की) पाण्डुलिपि में मिलता है। हिन्दी के सुविख्यात लेखक आचार्य चतुरसेन शास्त्री की स्मृति में प्रकाशित ‘सुगन्धित संस्मरण’ में उनके अभिन्न मित्र एवं जयपुर में सहपाठी रहे कैप्टन सूर्यप्रताप का ‘आर्यसमाज का एक अधिवेशन’ शीर्षक से लिखा लेख एक ऐसा तथ्य उजागर करता है जिसकी चर्चा महर्षि दयानन्द के किसी भी जीवनी लेखक ने आज तक नहीं की। सूर्यप्रताप लिखते हैं कि जयपुर पण्डितों के साथ शास्त्रार्थों में स्वामी दयानन्द का ऐसा सिक्का बैठ गया कि महाराज रामसिंह ने स्वामी जी को अपने दरबार में सम्मनित किया। महाराजा ने उन्हें अपनी दाईं ओर बैठाया और एक भारत-विख्यात उस्ताद खां साहब का संगीत हुआ। सभी ने खूब दाद दी पर स्वामी जी निश्चल बैठे रहे। उस्ताद के पूछने पर स्वामी जी ने कहा –‘अच्छा गाते हो परन्तु यह जो राग तुम ने गाया, (राग का नाम लेकर) उसके अमुक स्थान पर अवरोह में जो स्वर जोड़ा है, वह कंठ से नहीं उदर से निकलना चाहिए। इस दोष से राग कुछ मार खा गया।’ यह सुनकर खां साहब स्तम्भित रह गए। महर्षि के चरणों में सिर नवा कर कहा, ‘‘महात्मन्! मुझे खटकता अवश्य था, परन्तु किससे पूछता। मेरे गुरु जी का तो वर्षों पूर्व स्वर्गवास हो गया, शेष जो कलाकार हैं वे मुझ से सीखने वालों में हैं, उनमें यह योग्यता कहां? आज स्वामी महात्मा के दर्शन हुए, खुदा का मुझ पर फजल हो गया।”

 

महाराजा रामसिंह और सभी दरबारी चकित थे कि संगीत का भी स्वामी को इतना श्रेष्ठ ज्ञान है।

 

किस गुरु से पाया था स्वामी जी ने संगीत का यह ज्ञान? किसी भी जीवनी लेखक ने स्वामी जी के साम-गान के अतिरिक्त गायन विद्या की सुविज्ञता की चर्चा नहीं की। प्रायः माना जाता है कि जयपुर में स्वामी जी की महाराजा रामसिंह से भेंट ही नहीं हो पाई थी। इधर मुकुन्ददेव पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने दण्डी जी को सितारवादन एवं संगीत में निपुण बताया है (पृष्ठ 113)। क्या स्वामी दयानन्द ने गायन विद्या का ज्ञान भी दण्डी जी से ही तो प्राप्त नहीं किया था?’’

 

स्वामी जी द्वारा साम-गान करने का एक उदाहरण उनकी अलीगढ़ यात्रा में मिलता है। स्वामी जी अलीगढ़ पौष सुदी 6 विक्रमी संवत् 1930 को छलेसर से आये थे। विवरण इस प्रकार है ‘एक दिन ठाकुर मुकुन्दसिंह जी की प्रार्थना से महाराज ने साम-गान सुनाया। उसे सुनकर उधोसिंह जी आदि सभी सज्जन अत्यन्त आनन्दित हुए। सब यही कहते थे कि ऐसा मधुर स्वर और अद्भुत गान, हमने पहले कभी नहीं सुना।’ पाठक अनुमान कर सकते हैं कि ऋषि के साम-गान का श्रोताओं पर जादू का सा प्रभाव हुआ होगा और उन्होंने आनन्द सागर में डुबकी लगाई होगी। इस स्थिति को जनाने के लिए यह कहा गया है कि उधोसिंह जी आदि सभी सज्जन अत्यन्त आनन्दित हुए। इससे यह भी अनुमान किया जा सकता है कि वह इस गान के श्रवण-आनन्द से कुछ लोग तो बेसुध से हो गये भी कहे जा सकते हैं।

 

जनवरी, 1873 में स्वामी जी कलकत्ता के ‘प्रमोदकानन’ में ठहरे हुए थे। पं. देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय जी रचित महर्षि जीवन चरित के पृष्ठ 220 पर ‘गानविद्या के आचार्य की अनभिज्ञता’ शीर्षक से लिखा है कि एक दिन प्रमोदकानन में राजा सौरेन्द्र मोहन ठाकुर गये। अपरारन्ह के चार बजे का समय था, स्वामी जी आगन्तुक जनों से बात-चीत कर रहे थे। राजा महोदय ने अपने एक सेवक को स्वामीजी के पास भेजा। उसने स्वामी जी से कहा कि आपको राजा साहब बुलाते हैं। स्वामीजी ने उत्तर दिया कि इस समय मैं और लोगों से बात-चीत कर रहा हूं, इसलिए उन्हें छोड़कर उठना ठीक नहीं है। यह सुनकर राजा महोदय स्वयं ही स्वामीजी के पास आ बैठे। (राजा साहब गान-विद्या के आचार्य समझे जाते थे और वास्तव में वे इस कला में थे भी बहुत निपुण। उन्होंने इस कला पर कई ग्रन्थ भी लिखे हैं, जिनका सर्वत्र बड़ा मान है।) राजा साहब ने स्वामीजी से ‘स्वर’ की उत्पत्ति पर प्रश्न किये। स्वामीजी ने उनके उत्तर दिये, परन्तु वे राजा साहब की समझ में न आये। स्वामीजी ने कुछ विरक्ति प्रकट की और राजा महाशय क्रोध में भरकर उठकर चले गये।

 

पं. लेखराम जी ने ‘महर्षि दयानन्द सरस्वती का जीवन चरित्र’ में ऋषि की पंजाब के झेलम नगर की यात्रा का वर्णन करते हुए लिखा है कि ‘स्वामी जी सायं समय व्याख्यान दिया करते थे। व्याख्यान से प्रथम उच्च स्वर से वेदमंत्रों का गान करते हुए (खड़े होकर) प्रार्थना करते थे। उनका वेदोच्चारण अत्यन्त चित्ताकर्षक हुआ करता था।’ इस उदाहरण में स्वामी जी वेदमन्त्रों का उच्च स्वर से गान करते थे वा गान करते हुए प्रार्थना करते थे। अतः ऋषि को वेदमंत्रों के गान अर्थात् मन्त्रों के विकृति पाठ सहित उनका सस्वर पाठ करने का पूर्ण ज्ञान था, ऐसा विदित होता है।

 

आर्य विद्वान प्रा. राजेन्द्र जिज्ञासु जी ने ‘अमीं भजन सुधा’ पुस्तक का सम्पादन किया है। इस पुस्तक में उन्होंने भक्तराज अमींचन्द जी की जीवन झांकी एवं प्रस्तावना दी है। उसमें उन्होंनें अमींचन्द जी के बारे में लिखा है कि उन्होंने पंजाब के गुजरात में ऋषि के दर्शन किये और ऋषि दरबार में भजन गाये थे। वहां ऋषि जी ने कहा, ‘‘है तो हीरा, परन्तु कीचड़ में पड़ा है।” इससे यह विदित हो रहा है कि भक्त अमींचन्द ने भजन गाये, ऋषि ने उनके भजनों वा उनकी गान विद्या के आधार पर उनका मूल्यांकन किया और उन्हें ‘हीरा’ कहकर सम्बोधित भी किया। यह हीरा शब्द अतिश्योक्ति नहीं है अपितु उपयुक्त उपमा प्रतीत होती है। ऋषि दयानन्द जी ने साथ ही यह भी कह डाला कि तुम कीचड़ में पड़े हो। इस घटना से भी ऋषि के गान विद्या की जानकारी व उनके गान विद्या में मर्मज्ञ होने का ज्ञान होता है। ऋषि के इसी ज्ञान की देन थे आर्यसमाज के उच्च कोटि के प्रथम गीतकार वा भजनोपदेशक ऋषिभक्त अमींचन्द जी।

 

स्वामी दयानन्द जी ने संस्कार विधि के सामान्य प्रकरण में पूर्णाहुति के मन्त्रों के बाद मंगलकार्य शीर्षक देकर लिखा है कि ‘अर्थात् गर्भाधानादि से संन्यास-संस्कार पर्यन्त पूर्वोक्त (कार्य) और निम्नलिखित सामवेदोक्त महावामदेव्यगाम अवश्य करें। स्वामी जी ने इससे सम्बन्धित 6 मन्त्र भी दियें हैं। सम्भवतः इन्हीं मन्त्रों का गान स्वामी जी ने साम-गान के अन्तर्गत अलीगढ़ की सभा में प्रस्तुत किया होगा।

 

यह बता दें कि 23 सितम्बर, 2017 को सायं वैदिक साधन आश्रम तपोवन देहरादून के शरदुत्सव पर भजन संध्या का आयोजन आर्यसमाज के भजन सम्राट पं. सत्यपाल पथिक जी की अध्यक्षता में हुआ था। अपने अध्यक्षीय भाषण में पथिक जी ने अलीगढ़ में ऋषि दयानन्द द्वारा ठाकुर मुकुन्दसिंह जी की प्रार्थना पर किये गये सामगान का वर्णन किया था। इसे हमने 24 सितम्बर, 2017 के अपने एक लेख में प्रस्तुत किया जिस पर टिप्पणी करते हुए आर्य विद्वान आचार्य विपाश जी ने लिखा ‘‘दो स्थानों पर स्वामी जी की संगीत-मर्मज्ञता और सिद्ध हुई है–जयपुर दरबार और कलकत्ता दौरे में। इन प्रकरणों को भी पढ़कर यहां लिख दीजिए, लोगों का भला होगा। और भी प्रकरण हैं। आर्यसमाज में एक लेख और एक पुस्तिका इस पर बहुत अच्छे छपे हैं–सामगान पर।” इसके बाद आपने सूचित किया कि पं. देवेन्द्रनाथ मुखोपाध्याय रचित महर्षि दयानन्द चरित में पृष्ठ 220 पर कलकत्ता दौरे का प्रसंग है। आर्य विद्वान श्री भावेश मेरजा जी ने सूचित किया कि ‘जयपुर का प्रसंग प्रो. रामप्रकाश जी सम्पादित ‘‘दण्डी जी की जीवनी” की उनके द्वारा लिखित ‘‘प्रस्तावना” में पृ. (ज) पर वर्णित है। मैंने संभवतः 2016 के आरम्भ में फेसबुक पर इसे उद्धृत कर पोस्ट की थी।” एक प्रवर आर्य विद्वान ने श्री आचार्य विपाश जी के विचारों पर टिप्पणी करते हुए लिखा कि ‘देवेन्द्रनाथ जी संगृहीत जीवनी के पृष्ठ 220 पर राजा सौरेन्द्र मोहन ठाकुर द्वारा पूछे गए स्वर की उत्पत्ति विषयक एक प्रश्न का महर्षि दयानन्द जी द्वारा उत्तर देने का वर्णन है। किसी वेदमन्त्र गान का वहां उल्लेख नहीं है।’ इसके उत्तर में श्री आचार्य विपाश जी ने सूचित किया कि ‘वहाँ स्वर से तात्पर्य गानविद्या के स्वर से ही है। राजा साहेब गानविद्या के ही आचार्य थे। अभी भी इस विषय पर उनकी महंगी किताबे उपलब्ध हैं। वेदमन्त्र-गान का तो मैने कहा भी नही था। हां, महर्षि ने बनेड़ा के राजकुमारो का सस्वर वेदपाठ सुनकर प्रसन्नता अवश्य व्यक्त की थी। दो प्रकरण और है जिनसे ज्ञात होता है कि उन्होने गानविद्या का ज्ञान प्राप्त किया था।’ इस उत्तर से सन्तुष्ट होकर भावेश जी ने लिखा ‘ठीक लिखा आपने विपाश जी।’

 

आचार्य विपाश जी ने अपनी पूर्व संक्षिप्त टिप्पणियों से संबंधित कुछ अतिरिक्त विवरण भी दिया है। उनकी टिप्पणियां इस प्रकार हैं। 1- “सामगान पर उक्त लेख और पुस्तिका मेरे अभिन्न डॉ. वेदप्रकाश विद्यार्थी के पास दिल्ली में हैं। उनसे लेकर सारा संदर्भ भेज दूँगा।” 2- “स्वामी विरजानंद जी संगीत-विद्या के भी पंडित थे, सितारवादन में पूर्णतया निपुण थे। ऋषि ने अवश्य ही आनुषांगिक रूप में यह ज्ञान उन महा विद्वान् गुरु से परिमार्जित/अर्जित किया होगा । जब ऋषि जी उत्तराखंड में थे, तो एक शव का विच्छेद कर उन्होंने हठयोग में वर्णित शरीरस्थ चक्रादि की परीक्षा की। अपने पास स्थित ग्रंथ से उन अंगों का मिलान करने पर असत्य पाया तो जिन ग्रंथों को नदी में बहाया उनमें संगीत शास्त्र का भी ग्रंथ था।” एवं 3- “उक्त लेख के लेखक पंडित भगवद्दत्त वेदालंकार तथा पुस्तिका के संगीताचार्य ताराशंकर राकेश थे, आचार्य विश्वश्रवा के आग्रह पर उन्होंने दिल्ली में हुए महायज्ञ के अवसर पर पुस्तिका लिखी थी।” हम आचार्य विपाश जी से प्रार्थना करते हैं कि वह सामगान पर पं. भगवद्दत्त जी के लेख व संगीताचार्य ताराशंकर राकेश जी पुस्तिका हमें पीडीएफ या जेपीजी में उपलब्ध करा दें जिससे उसके प्रकाशन पर किसी प्रकाशक से सम्पर्क कर सकें। यदि फोटो स्टेट उपलब्ध करायेंगे तो अधिक सुविधाजनक होगा। सादर।

 

यदि यह लेख व संकलन किसी पाठक को प्रिय लगता है तो हम आपने पुरुषार्थ को सफल समझेंगे। ओ३म् शम्।

 

 

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