ग्रामीण प्रौद्योगिकी के पुरोधा देवेंद्र कुमार गुप्ता की जन्मशताब्दी वर्ष पर विशेष
कुमार सिद्धार्थ
भारत की ग्राम्य परंपरा और आधुनिक विज्ञान के बीच सेतु बनाने वाले गांधीवादी चिंतक डॉ. देवेंद्र कुमार गुप्ता का जीवन विज्ञान, समाज और सेवा का अद्वितीय उदाहरण है। गांधीवादी चिंतन से प्रेरित होकर उन्होंने विज्ञान और तकनीक को गांव की आजीविका, आत्मनिर्भरता और गरिमा से जोड़ा। उन्होंने यह दिखाया कि जब विज्ञान मानवीय संवेदना और सेवा से जुड़ता है, तब वह केवल तकनीकी उपलब्धि नहीं रहता, बल्कि सामाजिक परिवर्तन और आत्मनिर्भरता का साधन बन जाता है।
प्रारंभ से ही उनकी रुचि प्रयोग और नवाचार में थी। बी.एस-सी. की पढ़ाई के बाद उन्होंने कानपुर स्थित हरकोर्ट बटलर टेक्नोलॉजिकल इंस्टीट्यूट से ऑयल एंड पेंट टेक्नोलॉजी का प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम पूरा किया। शिक्षा पूरी करने के बाद 1946 में वर्धा के अखिल भारतीय ग्रामोद्योग संघ से जुड़े, जहां उन्हें तेल उद्योग और प्रयोगशाला की जिम्मेदारी सौंपी गई। यहीं से उनके जीवन का वह अध्याय शुरू हुआ, जिसमें प्रयोग, ग्राम सेवा और गांधीवादी विचारधारा एक-दूसरे से घुलमिल गए। उन्होंने भूसी और मूंगफली खली के खाद्य उपयोग पर शोध किया और ग्रामीण तेल उद्योग को आधुनिक और उपयोगी बनाने के कई उपाय किए। यह गांधीजी की उस सोच का विस्तार था, जिसमें कहा गया था कि संसाधनों का अधिकतम और लोककल्याणकारी उपयोग ही असली विज्ञान है।
महात्मा गांधी की प्रेरणा के साथ आचार्य विनोबा भावे के विचार भी उनके जीवन में गहराई से उतरे। भूमिहीन किसानों और गरीबों के साथ रहते हुए उन्होंने विनोबा के भूमिदान आंदोलन और सर्वोदय कार्यों में सक्रिय भागीदारी निभाई। विनोबा मानते थे कि समाज तभी बदल सकता है जब विज्ञान और आध्यात्म एक साथ चलें। डॉ. देवेंद्र भाई का मानना था कि गांव की समस्याओं का हल गांव की जमीन पर ही खोजा जाना चाहिए और यह तभी संभव है जब विज्ञान को स्थानीय परिस्थितियों और जरूरतों के अनुसार ढाला जाए। यही दृष्टि उन्हें गांधीवादी आंदोलन का सक्रिय कार्यकर्ता बनाती है।
युवा अवस्था के प्रारंभिक दिनों में विनोबा भावे के आव्हान पर देंवेंद्र भाई ने मध्यप्रदेश के इंदौर स्थित माचला गांव को अपनी कर्म भूमि बनाया। लगभग एक दशक तक माचला गांव में भूमिहीनों के साथ मिलकर सहकारी समिति, ग्रामीण प्रौद्योगिकी से जुडे अनेक कार्यों को संपादित किया। कुष्ठ रोगियों की सेवा के साथ माचला को खादी और ग्रामोद्योग के प्रशिक्षण केंद्र स्थापित हुआ। उस वक्त विनोबा भावे के तीन ‘इंद्र’ कहे जाने वाले देवेंद्र गुप्ता, महेंद्र कुमार और नरेंद्र दुबे की तिकडी ने गांधी विचार के इन अभिक्रमों को उंचाईयां दीं।

देवेंद्र भाई ने ठक्कर बापा के जीवन से सेवा और करुणा का पाठ सीखा। ठक्कर बापा ने अस्पृश्यता उन्मूलन और आदिवासी कल्याण को अपने जीवन का लक्ष्य बनाया था। डॉ. देंवेंद्र कुमार ने उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए ग्रामीण समाज की सबसे वंचित और कमजोर आबादी के लिए तकनीक विकसित की। डॉ. गुप्ता ने धुएँ रहित चूल्हा, गोबर गैस संयंत्र, सौर वाष्पीकरण तकनीक, हस्तनिर्मित कागज उद्योग और मधुमक्खी पालन जैसे नवाचार किए। उनकी हर तकनीक ग्रामीण गरीब, महिला और कमजोर वर्ग की सुविधा और गरिमा बढ़ाने के लिए थी।
1965 में वे केंद्रीय गांधी स्मारक निधि के राष्ट्रीय सचिव बने और उन्होंने गांधी जन्मशताब्दी समारोह का आयोजन किया और नीति-निर्माताओं तथा गांधीवादी आंदोलन के बीच पुल का कार्य किया। परंतु उनका सबसे बड़ा योगदान 1976 में हुआ जब उन्होंने सभी जिम्मेदारियाँ छोड़कर “साइंस फॉर विलेजेस” केंद्र की स्थापना की। इस संस्था ने ग्रामीण प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में नई इबारत लिखी। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों, विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग तथा अंतरराष्ट्रीय विचारकों- ई.एफ. शूमाकर और इवान इलिच के सहयोग से उन्होंने ग्रामीण विकास की नीतियों में विज्ञान को गांव के हित में मोड़ा।
“साइंस फॉर विलेजेस” के अंतर्गत वैज्ञानिकों, अभियंताओं, कारीगरों और कार्यकर्ताओं की एक टीम बनी, जिसने ग्रामीण सिंचाई, आवास, ऊर्जा, स्वच्छता, कृषि उपकरण, ग्रामोद्योग और महिला-उन्मुख तकनीकों पर काम किया। यह प्रयोग केवल तकनीकी खोज नहीं थे, बल्कि वे ग्रामीण जीवन को सशक्त बनाने के साधन बने। 1986 से 1989 तक गांधीग्राम ग्रामीण संस्थान के कुलपति रहते हुए उन्होंने शिक्षा और शोध को भी ग्रामीण वास्तविकताओं से जोड़ा। साथ ही, दो दशक तक ‘साइंस फॉर विलेजेस’ पत्रिका का संपादन करते हुए उन्होंने ग्रामीण विज्ञान और तकनीक को जन-जन तक पहुँचाने का प्रयास किया।
डॉ. देवेंद्र भाई की दृष्टि में गांधी का ग्राम स्वराज, विनोबा का सर्वोदय और ठक्कर बापा की सेवा— तीन धाराएँ विज्ञान से जुड़कर साकार हो सकती थीं। यही कारण था कि उन्होंने ग्रामीण सिंचाई, आवास, स्वच्छता, ऊर्जा, कृषि उपकरण और महिलाओं की जरूरतों के लिए ऐसी तकनीकें विकसित कीं जो सस्ती, सरल और स्थानीय संसाधनों पर आधारित थीं। 1998 में उन्हें जमनालाल बजाज पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जो केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि गांधी-विनोबा-ठक्कर की परंपरा की मान्यता थी।
आज जब भारत “आत्मनिर्भर भारत” और सतत विकास की दिशा में आगे बढ़ रहा है, तो डॉ. गुप्ता की सोच और भी प्रासंगिक हो उठती है। उनके प्रयोग हमें यह सिखाते हैं कि गांधी का स्वराज, विनोबा का सर्वोदय और ठक्कर बापा की सेवा की धारा विज्ञान और तकनीक के साथ जुड़कर ही साकार हो सकती है। ग्रामीण प्रौद्योगिकी केवल उत्पादन या तकनीकी सुधार का विषय नहीं है, बल्कि यह सामाजिक न्याय, पर्यावरणीय संतुलन और आत्मनिर्भरता का आधार है। आज की जरूरत है कि उनकी तरह विज्ञान को शहरों और प्रयोगशालाओं से निकालकर गांव की गलियों, खेतों और कुटीर उद्योगों तक पहुँचाया जाए। सौर ऊर्जा, बायोगैस, नवीकरणीय संसाधनों का उपयोग, स्वच्छ जल की उपलब्धता, स्थानीय सामग्री से आवास निर्माण और महिला-केन्द्रित तकनीकें—इन सबमें डॉ. कुमार की दृष्टि हमारा मार्गदर्शन कर सकती है।
डॉ. देवेंद्र कुमार गुप्ता ने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि विज्ञान केवल तब सार्थक है जब वह समाज के कमजोर तबके को सशक्त बनाए और गांवों की आत्मा को मजबूत करे। गांधी की आत्मा, विनोबा की करुणा और ठक्कर बापा की सेवा—इन तीनों का वैज्ञानिक रूपांतरण डॉ. गुप्ता के कार्यों में झलकता है। उनकी सोच और कर्म आज भी ग्रामीण विकास की राह पर चलने वालों के लिए प्रेरणा है। भारत के गांवों को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाने का सपना तभी पूरा होगा जब हम उनके विचारों और प्रयोगों से सीख लेकर उन्हें आज की जरूरतों के अनुरूप लागू करें।
कुमार सिद्धार्थ, स्वतंत्र पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता, 29, संवाद नगर, नवलखा, इंदौर 452001