मीडिया का बदलता रूप एवं प्रभाव

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हिन्दी शब्द ‘माध्यम’ से अंग्रेजी में ‘मीडियम’ और मीडिया बना। एक जगह की बात या घटना को दूसरी जगह पहुंचाने में जो व्यक्ति या उपकरण माध्यम बनता है, वही मीडिया है। सृष्टि के जन्मकाल से ही किसी न किसी रूप में मीडिया का अस्तित्व रहा है और आगे भी रहेगा। इस सृष्टि में नारद जी… Read more »

न्यूज वल्र्ड  के सोमालिया – यूथोपिया … !!

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तारकेश कुमार ओझा सच पूछा जाए तो देश – दुनिया को खबरों की खिड़की से झांक कर देखने की शुरूआत 80 के दशक में दूरदर्शन के जमाने से हुआ था। महज 20 मिनट के समाचार बुलेटिन में दुनिया समेट दी जाती थी। अंतर राष्ट्रीय खबरों में ईरान – इराक का जिक्र केवल युद्ध और बमबारी… Read more »

टीआरपी की ख़बरों का मिडिया’

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मनोज कुमार जब समाज की तरफ से आवाज आती है कि मीडिया से विश्वास कम हो रहा है या कि मीडिया अविश्वसनीय हो चली है तो सच मानिए ऐसा लगता कि किसी ने नश्चत चुभो दिया है. एक प्रतिबद्ध पत्रकार के नाते मीडिया की विश्वसनीयता पर ऐसे सवाल मुझ जैसे हजारों लोगों को परेशान करते… Read more »

 आधार की सुरक्षा और सदुपयोग हम सब का उत्तरदायित्व

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आधार से जुड़ी दो खबरें सुर्खियां बटोर रही हैं। एक खबर है कि आधार लिंकिंग के कारण देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों में मौजूद 80 हजार फर्जी शिक्षकों का पता चला है। दूसरी खबर एक अंग्रेजी समाचार पत्र के हवाले से आई है जिसके अनुसार ऐसे हैकर्स मौजूद हैं जो नाम मात्र की रकम… Read more »

साहित्य प्रकाशन बनाम सोशल मीडिया का प्रभाव

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डॉ.अर्पण जैन ‘अविचल’   एक दौर था, जब साहित्य प्रकाशन के लिए रचनाकार प्रकाशकों के दर पर अपने सृजन के साथ जाते थे या फिर प्रकाशक प्रतिभाओं को ढूँढने के लिए हिन्दुस्तान की सड़के नापते थे, परंतु विगत एक दशक से भाषा की उन्नति और प्रतिभा की खोज का सरलीकरण सोशल मीडिया के माध्यम से… Read more »

सोशल मीडिया : जगत सा अराजक या अराजकता का जगत

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क्या सोशल मीडिया अत्यंत बुद्धिमत्तापूर्वक निर्मित किसी ऐसे मानव रचित चक्रवात या भूकम्प की तरह है जिसके केंद्र का पता लगाना संभव नहीं है? पता नहीं क्यों सोशल मीडिया को देखकर एडम स्मिथ के प्राकृतिक न्याय पर आदर्श बाजारवादी अर्थव्यवस्था के मॉडल की याद आती है जो आत्मनियंत्रण के द्वारा संचालित होने का दावा करता… Read more »

पत्रकारिता: संकट में छिपा अवसर

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पत्रकारिता वर्तमान में साहित्य की सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण, प्रभावकारी एवं संभावनाओं से भरी विधा है। यदि आपमें मानव जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने की अभिलाषा है तो साहित्य की उपलब्ध विधाओं में तो इससे बेहतर कोई विकल्प नहीं दिखता। साहित्य की अन्य विधाओं की संरचना ही इस प्रकार की है कि लाक्षणिकता  और संकेतात्मकता उनकी आधारभूत… Read more »

पत्रकारिता में भी ‘राष्ट्र सबसे पहले’ जरूरी

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– लोकेन्द्र सिंह मौजूदा दौर में समाचार माध्यमों की वैचारिक धाराएं स्पष्ट दिखाई दे रही हैं। देश के इतिहास में यह पहली बार है, जब आम समाज यह बात कर रहा है कि फलां चैनल/अखबार कांग्रेस का है, वामपंथियों का है और फलां चैनल/अखबार भाजपा-आरएसएस की विचारधारा का है। समाचार माध्यमों को लेकर आम समाज का इस प्रकार… Read more »

निजता-हनन के कानून

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प्रमोद भार्गव व्हाट्सप की नई गोपनीय नीति से निजता के हनन के मामले में सुप्रीम कोर्ट से केंद्र सरकार ने कहा कि निजी जानकारियों की सुरक्षा जीवन के अधिकार के दायरे में आता है। लिहाजा निजी डाटा को व्यावसायिक फायदे के लिए इस्तेमाल करना गलत है। निजी जानकारी जीवन के अधिकार का ही एक पहलू… Read more »

पत्रकारिता की विश्वसनीयता : भरोसे का वज़न करता समाज 

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मनोज कुमार इन दिनों भरोसा तराजू पर है. उसका सौदा-सुलह हो रहा है. तराजू पर रखकर उसका वजन नापा जा रहा है. भरोस कम है या ज्यादा, इस पर विमर्श चल रहा है. यह सच है कि तराजू का काम है तौलना और उसके पलड़े पर जो भी रखोगे, वह तौल कर बता देगा लेकिन… Read more »