दिल्ली दंगों के दौरान तमाम भड़काऊ गतिविधियों के कारण जेल की सलाखों में बंद उमर खालिद को लेकर हाल ही में अमेरिका के एक शहर न्यूयॉर्कके महापौर बने जोहरान ममदानी द्वारा चिट्ठी लिखकर यह कहना कि हम आपके बारे में सोच रहे हैं बेहद आपत्तिजनक है।
भारत की संप्रभुता, कानून-व्यवस्था और न्यायिक प्रक्रिया किसी भी बाहरी राजनीतिक नैरेटिव की मोहताज नहीं है। ऐसे में यह खबर चिंताजनक है कि उमर खालिद—जिन पर आपराधिक साजिश, दंगा, गैर-कानूनी सभा तथा गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत गंभीर आरोप हैं और जिनका मामला भारतीय अदालतों में विचाराधीन है—को लेकर अमेरिका में एक राजनीतिक हस्ती ममदानी द्वारा सहानुभूति भरा पत्र लिखा गया है, जिसमें कहा गया कि “हम तुम्हारे बारे में सोच रहे हैं।”
पहला प्रश्न यही उठता है कि किसी विदेशी जनप्रतिनिधि को भारत के आंतरिक, न्यायिक रूप से लंबित मामलों में भावनात्मक हस्तक्षेप की आवश्यकता क्यों महसूस होती है? यह पत्र मानवीय संवेदना के आवरण में एक राजनीतिक संकेत देता है—ऐसा संकेत जो भारत की अदालतों की स्वतंत्रता और जांच एजेंसियों की वैधानिक भूमिका पर अप्रत्यक्ष दबाव बनाने जैसा प्रतीत होता है।
यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि उमर खालिद पर लगे आरोपों का निर्णय अदालतें साक्ष्यों और कानून के आधार पर करती हैं, न कि अंतरराष्ट्रीय पत्राचार या राजनीतिक संदेशों के प्रभाव से। किसी भी लोकतंत्र में न्याय का रास्ता न्यायालयों से होकर गुजरता है—न कि सोशल या अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक समर्थन से। ऐसे पत्र न्यायिक प्रक्रिया को “राजनीतिक कैदी” जैसे सरलीकृत फ्रेम में ढालने की कोशिश करते हैं, जो न केवल भ्रामक है बल्कि भारत की विधिक प्रणाली का अपमान भी है।
दूसरा, यह रवैया चयनात्मक सहानुभूति का उदाहरण है। यदि वास्तव में मानवाधिकारों की चिंता है, तो दंगों में मारे गए निर्दोष नागरिकों, घायल पुलिसकर्मियों और प्रभावित परिवारों के लिए भी वही संवेदना क्यों नहीं? कानून का राज पीड़ित और आरोपी—दोनों के अधिकारों का संतुलन साधता है। किसी एक पक्ष को महिमामंडित करना उस संतुलन को बिगाड़ता है।
तीसरा, अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ऐसे कदम अक्सर घरेलू राजनीति की खपत के लिए उठाए जाते हैं। प्रतीकात्मक पत्राचार सुर्खियां तो बटोर सकता है, पर यह न तो पीड़ितों को न्याय दिलाता है और न ही किसी लंबित मुकदमे का समाधान। उलटे, यह राष्ट्रों के बीच अनावश्यक तनाव और अविश्वास को जन्म देता है।
भारत एक सशक्त लोकतंत्र है, जहां न्यायपालिका स्वतंत्र है और कानून सबके लिए समान। विदेशी राजनीतिक हस्तियों से अपेक्षा है कि वे इस वास्तविकता का सम्मान करें। भारत को उपदेश देने या भावनात्मक दबाव बनाने के बजाय, बेहतर होगा कि वे अपने-अपने देशों में न्याय, शांति और सामाजिक सौहार्द को मजबूत करने पर ध्यान दें।
अंततः, न्याय का पैमाना अदालतें तय करेंगी—पत्र नहीं। विदेशी सहानुभूति का यह प्रदर्शन निंदनीय है और इसे भारत की न्यायिक प्रक्रिया में हस्तक्षेप के रूप में ही देखा जाना चाहिए।