अमित कुमार अम्बष्ट ” आमिली.”
महंगाई भत्ते को लेकर पश्चिम बंगाल सरकार के अंतर्गत आने वाले सरकारी कर्मचारियों के एक वर्ग ने 26 फरवरी को सड़कों पर उतरकर विरोध प्रदर्शन किया, कर्मचारियों की मंशा पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के आवास के नजदीक हजरा पार्क पर पहुंच कर घेराव के बाद आपनी मांगों को रखना था लेकिन पुलिस प्रशासन ने उन्हें उक्त पार्क तक पहुंचने ही नहीं दिया. अपने ही कर्माचारियों का ऐसा विरोध और फिर पुलिस प्रशासन का उस आंदोलन के दमन से कर्मचारियों का बड़ा वर्ग पश्चिम बंगाल सरकार से नाराज है. ऐसे में इस आंदोलन के कारण कर्मचारियों एवं पश्चिम बंगाल सरकार, दोनों पक्षों का विश्लेषण जरूरी हो जाता है l
ऐसे में यह समझने की जरूरत है कि महंगाई भत्ता क्या है और क्यों महत्वपूर्ण है? पिछले कुछ वर्षों से पश्चिम बंगाल में सरकारी कर्मचारियों और राज्य सरकार के बीच महंगाई भत्ता विवाद क्या है ? , विवाद की जड़ क्या है ? , कर्मचारियों की दलीलें क्या हैं ? सरकार का पक्ष क्या है और इस आंदोलन के मायने क्या हैं?
महंगाई भत्ता मूल वेतन का वह प्रतिशत है जो कर्मचारियों को बढ़ती महंगाई के प्रभाव से बचाने के लिए दिया जाता है। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के आधार पर समय-समय पर इसमें संशोधन किया जाता है। केंद्र सरकार अपने कर्मचारियों के लिए हर छह महीने में महंगाई भत्ते की दर तय करती है, और सामान्यतः राज्य सरकारें भी उसी अनुपात में या उसके आसपास संशोधन करती हैं। महंगाई भत्ता केवल अतिरिक्त आय नहीं है; यह कर्मचारियों की क्रय-शक्ति बनाए रखने का साधन है। जब खाद्य पदार्थों, ईंधन, आवास, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की लागत बढ़ती है तो महंगाई भत्ता कर्मचारियों को आर्थिक संतुलन बनाए रखने में मदद करता है। इसीलिए जब महंगाई भत्ता में लंबा अंतर या बकाया रह जाता है तो असंतोष स्वाभाविक है।
अगर विवाद की बुनियादी पृष्ठभूमि का अवलोकन करें तो पातें हैं कि केंद्र और राज्य के बीच महंगाई भत्ता अंतर विवाद का मुख्य कारण यह है कि केंद्र सरकार के कर्मचारियों को जो महंगाई भत्ता मिल रहा है, उसकी तुलना में पश्चिम बंगाल के राज्य कर्मचारियों को काफी कम प्रतिशत पर महंगाई भत्ता मिल रहा है। केंद्र सरकार के कर्मचारियों के पश्चिम बंगाल के कर्मचारियों के महंगाई भत्ता में 40 प्रतिशत का अंतर है। कर्मचारियों का आरोप है कि यह अंतर कई वर्षों से बना हुआ है और राज्य सरकार धीरे-धीरे वृद्धि कर रही है जिससे अंतर पूरी तरह समाप्त नहीं हो पा रहा।
कर्मचारी संगठनों का कहना है कि समान कार्य के लिए समान वेतन और भत्ता मिलना चाहिए। वे तर्क देते हैं कि जब केंद्रीय कर्मचारियों को एक निश्चित दर पर महंगाई भत्ता मिल रहा है तो राज्य कर्मचारियों को भी उसी दर से लाभ मिलना चाहिए। उनका यह भी कहना है कि महंगाई भत्ता कोई ‘अनुग्रह’ नहीं बल्कि वैधानिक अधिकार है। इसलिए कह सकते हैं कि हालिया रैली में कोलकाता की सड़कों पर हजारों सरकारी कर्मचारियों का जुटना केवल एक सामान्य विरोध नहीं था। इसमें विभिन्न विभागों—शिक्षा, स्वास्थ्य, प्रशासनिक सेवाएं, लोक निर्माण, सिंचाई, नगर विकास—के कर्मचारी शामिल थे। प्रदर्शनकारियों ने बैनर और तख्तियों के साथ स्पष्ट संदेश दिया: “लंबित महंगाई भत्ता तुरंत जारी करो” और “भेदभाव बंद करो।”
रैली का स्वर अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण रहा लेकिन नारों और भाषणों में गहरी नाराजगी झलकती रही। कर्मचारी संगठनों के नेताओं ने आरोप लगाया कि सरकार न्यायालय के निर्देशों के बावजूद भुगतान में देरी कर रही है। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि मांगें पूरी नहीं हुईं तो आंदोलन और व्यापक रूप ले सकता है।
ऐसे में राज्य सरकार का तर्क है कि उसकी वित्तीय स्थिति केंद्र सरकार जैसी सुदृढ़ नहीं है। कर संग्रह, राजस्व घाटा, सामाजिक योजनाओं पर व्यय और ऋण बोझ जैसी चुनौतियाँ राज्य के बजट को प्रभावित करती हैं। सरकार का कहना है कि वह चरणबद्ध तरीके से महंगाई भत्ता बढ़ा रही है और कर्मचारियों के हितों की अनदेखी नहीं की जा रही। सरकार यह भी संकेत देती रही है कि यदि एकमुश्त बड़े पैमाने पर बकाया महंगाई भत्ता का भुगतान किया जाता है तो विकास परियोजनाओं और सामाजिक कल्याण योजनाओं पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे में वित्तीय संतुलन बनाए रखना आवश्यक है हालांकि इस बाबत उच्चतम न्यायालय ने अहम फैसला दिया है. उच्चतम न्यायालय ने पश्चिम बंगाल सरकार को 2008 से 2019 तक का बकाया महंगाई भत्ता कर्मचारियों को देने का आदेश दिया है। इसमें यह भी कहा गया कि राज्य सरकार को महंगाई भत्ता की गणना ऑल इंडिया कंज्यूमर प्राइस इंडेक्स (AICPI) के अनुसार करनी चाहिए जैसा कि नियमों में तय है।
भुगतान की प्रक्रिया तय करने के लिए उच्चतम न्यायालय कोर्ट ने एक उच्च-स्तरीय कमेटी भी गठित की है जिसमें पूर्व न्यायाधीशों को शामिल किया गया है। इस कमेटी का काम महंगाई भत्ता के बकाये की गणना और किस्तों में भुगतान की समय-सीमा तय करना है। उच्चतम न्यायालय ने पहली किश्त के रूप में बकाये का 25% हिस्सा 6 मार्च, 2026 तक देने का निर्देश दिया है और बाकी की राशि किस्तों में निर्धारित समय पर देने का प्रावधान रखा है तथा उच्चतम न्यायालय में इस केस की अगली सुनवाई 15 अप्रैल 2026 को होनी है l ऐसे में देखना होगा कि पश्चिम बंगाल सरकार अब इससे कैसे निपटती है क्योंकि पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव सर पर है और चूंकि यह मुद्दा बड़े कर्मचारी वर्ग से जुड़ा है, इसलिए इसका राजनीतिक महत्व भी कम नहीं है। विपक्षी दल सरकार पर कर्मचारी-विरोधी रवैया अपनाने का आरोप लगाते रहे हैं। चुनावी माहौल में महंगाई भत्ता का मुद्दा और भी संवेदनशील हो जाता है। कर्मचारी न केवल मतदाता होते हैं, बल्कि वे सामाजिक रूप से प्रभावशाली वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनकी नाराजगी या संतुष्टि का राजनीतिक परिणामों पर असर पड़ सकता है ।.ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि सरकार चुनाव से पहले कैसे इस मुद्दे पर आगे बढ़ती है l ( युवराज फीचर्स )
अमित कुमार अम्बष्ट ” आमिली.”