विविध

दलित दूल्हे घोड़ी पर बैठने के अधिकार से वंचित क्यों?

 बाबूलाल नागा

   आधुनिक भारत में भी जातिगत भेदभाव की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका अंदाजा राजस्थान से आई ताजा घटना से लगाया जा सकता है। यह किसी एक गांव या जिले की कहानी नहीं बल्कि उस बीमार मानसिकता का आईना है, जो आज भी बराबरी को स्वीकार करने को तैयार नहीं है।

   पिछले दिनों 29 अप्रैल को उदयपुर जिले के डबोक थाना क्षेत्र के हरियाव गांव में पूजा मेघवाल की बिंदौली को गांव के कुछ असामाजिक तत्वों ने न केवल रोका बल्कि दुल्हन बनीं पूजा को घोड़ी से उतार दिया। बिंदौली में शामिल लोगों पर हमला किया गया, तलवारें लहराई गईं, जातिसूचक गालियां दी गईं और आगे बढ़ने पर खून-खराबे की धमकी तक दी गई—सिर्फ इसलिए कि उसने “हद पार” कर दी थी। उसकी हद क्या थी? घोड़ी पर बैठना।

   यह कोई अकेली घटना नहीं है। पिछले वर्षों में भी ऐसे कई मामले सामने आए हैं। अजमेर के विजय रैगर की बारात इसलिए चर्चा में रही क्योंकि उन्हें अपनी ही शादी में घोड़ी पर बैठने के लिए 200 पुलिसकर्मियों की सुरक्षा लेनी पड़ी। इसी तरह 19 फरवरी 2025 को जालोर में एक दलित दूल्हे को सिर्फ इसलिए पीटा गया क्योंकि वह घोड़ी पर बैठकर शादी करने जा रहा था। हालात इतने बिगड़े कि जिले के पुलिस अधीक्षक को खुद मौके पर पहुंचकर सुरक्षा में फेरे करवाने पड़े। 15 फरवरी 2025 को झुंझुनूं के गोविंदासपुरा गांव में दलित दूल्हे की बिंदौरी 4 थानों की पुलिस और 60 जवानों की सुरक्षा में निकाली गई। इससे पहले फरवरी 2022 में जयपुर के जयसिंहपुरा गांव में एक दलित आईपीएस अधिकारी की शादी में भी पूरे गांव को पुलिस छावनी बनाना पड़ा। अप्रैल 2021 में उदयपुर के गोगुंदा क्षेत्र में एक दलित पुलिस कांस्टेबल दूल्हे को घोड़ी चढ़ाने के लिए पुलिस जाब्ता तैनात करना पड़ा, जबकि नवंबर 2021 में उदयपुर के सालेरा खुर्द गांव में दलित दूल्हे को बिंदौरी के दौरान पथराव कर जबरन घोड़ी से उतार दिया गया।

    आंकड़े भी इस कड़वी सच्चाई की पुष्टि करते हैं। केंद्र सरकार की 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, 2022 में राजस्थान में दलितों के खिलाफ 8,651 मामले दर्ज किए गए—जो देश में दूसरे नंबर पर है। दलित दूल्हों को घोड़ी से उतारने की 81 प्रतिशत घटनाएं जांच में सही पाई गईं, जबकि दलित अत्याचार के 49.24 प्रतिशत मामलों की भी पुष्टि हुई।

   साल दर साल यह समस्या बनी हुई है। 2012 से 2023 तक हर वर्ष ऐसे मामले सामने आए जहां दलित युवाओं का अपनी शादी में घोड़ी पर बैठने का सपना जातिवादी मानसिकता के कारण तोड़ दिया गया। 2012 में 2, 2013 में 4 और 2014 में सर्वाधिक 20 मामलों में दलित दूल्हों को रोका गया। इसके बाद 2015 में 18, 2016 में 16, 2017 में 16, 2018 में 9, 2019 में 7, 2020 में 7, 2021 में 9 और 2023 में 16 मामलों में दूल्हों को घोड़ी पर चढ़ने नहीं दिया गया। यानी हर साल दर्जनों दूल्हों को उनके इस बुनियादी सामाजिक अधिकार से वंचित किया जाता रहा है। सोचिए—2026 में भी यह “हक” छीना जा रहा है।

   सबसे बड़ा सवाल यह है कि एक सामाजिक परंपरा—घोड़ी पर बैठकर बारात निकालना—किसी समुदाय की “इज्जत” या “नाक” का सवाल कैसे बन जाती है? क्या घोड़ी पर बैठना किसी एक वर्ग का विशेषाधिकार है? क्या आज भी समाज का एक हिस्सा यह तय करेगा कि दूसरा हिस्सा कैसे जिए?

अब सवाल सरकार से भी है और समाज से भी—कब तक दलित दूल्हे अपनी ही शादी में डर के साए में जिएंगे?  कब तक खुशियां पुलिस सुरक्षा में मनानी पड़ेंगी? और कब तक “ऊंच-नीच” के नाम पर इंसानियत को कुचला जाता रहेगा? सवाल सीधा है—क्या इस देश में घोड़ी पर बैठना भी जाति देखकर तय होगा?

   यह सिर्फ एक रस्म का सवाल नहीं है। यह स्वाभिमान का सवाल है, बराबरी का सवाल है, इंसान होने के अधिकार का सवाल है। क्योंकि जब एक दलित दूल्हे को घोड़ी से उतारा जाता है, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति का अपमान नहीं होता—यह बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर के उस सपने का अपमान है, जिसमें हर नागरिक को बराबरी का अधिकार मिला। यह उस संविधान का भी अपमान है, जो कागज पर तो सबको समान बताता है, लेकिन जमीन पर कुछ लोग खुद को “ऊपर” मानकर दूसरों को नीचे धकेलते रहते हैं।

   कानून इस भेदभाव को स्पष्ट रूप से अपराध मानता है। अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम में 2015 के संशोधन के बाद किसी दलित को घोड़ी पर बैठने से रोकना दंडनीय अपराध है। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर कानून का प्रभाव कमजोर नजर आता है।

   यह केवल कानून का सवाल नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का प्रश्न है। जब तक समाज में बराबरी, सम्मान और संवैधानिक मूल्यों की समझ मजबूत नहीं होगी, तब तक ऐसे अत्याचार रुकना मुश्किल है।

   अब समय आ गया है कि सरकार कानून का सख्ती से पालन सुनिश्चित करे और समाज अपने भीतर झांके—उसे तय करना होगा कि वह समानता की ओर बढ़ना चाहता है या भेदभाव की उसी पुरानी अंधेरी गली में भटकता रहना चाहता है।( युवराज फीचर्स )

बाबूलाल नागा