किसान आंदोलन: के विपक्ष को सियासत का मौका नहीं देना चाहता था पीएमओ

नई दिल्लीः किसान क्रांति यात्रा के समापन के दिन हुए हंगामे के बाद पीएमओ इस मामले में सक्रिय हो गया था। पीएमओ इस यात्रा के बहाने विपक्ष को सियासत का कोई मौका नहीं देना चाहता था। पीएमओ की ओर से निर्देश जारी हो चुके थे कि हर हाल में इस किसान क्रांति यात्रा का समापन रात में ही होना है और किसी तरह का कोई विवाद भी नहीं चाहिए। इसके बाद भाकियू से संपर्क वाले तमाम नेताओं को सक्रिय कर दिया गया था। यात्रा के समापन में पश्चिम के ही एक नेता की अहम भूमिका रही, जो टिकैत बंधुओं और पीएमओ के संपर्क में लगातार बना हुआ था। पीएमओ के निर्देश पर ही इस नेता को विशेष जिम्मेदारी दी गई थी।

किसान क्रांति यात्रा के दिल्ली बार्डर पहुंचते ही टकराव के हालात बन गए थे। एक अक्तूबर की रात में वार्ता विफल हो जाने के बाद यह तय हो गया था कि अब टकराव होगा, क्योंकि न किसान झुकने को तैयार थे और न ही किसानों की मांगें सरकार मान रही थी। दो अक्तूबर को गांधी जयंती के दिन किसानों के हंगामे के तूल पकड़ने और इस प्रकरण में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी, रालोद के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौधरी अजित सिंह समेत देश भर के तमाम नेताओं को सक्रिय होता देख भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की बेचैनी बढ़ गई थी। माना जा रहा था कि यह नेता बुधवार सुबह से किसानों के बीच होंगे, जिससे बड़े सियासी संग्राम के हालात बन सकते थे।

वरिष्ठ राजनीतिक सूत्रों से मिल रही जानकारी के अनुसार पीएमओ नहीं चाहता था कि यह आंदोलन जारी रहे और बुधवार सुबह तक यह किसान दिल्ली में डटें। भाजपा को चिंता थी कि यदि यह किसान बार्डर पर जुटे रहते हैं तो फिर इनका यह आंदोलन लंबा चलेगा और इसमें पूरा विपक्ष एकजुट होकर किसानों के साथ होगा। इसको रोकने के निर्देश दिए गए कि हर हाल में यह किसान क्रांति यात्रा रात में ही समाप्त करनी है। इसके लिए पीएमओ के निर्देश पर भाकियू के संपर्क वाले तमाम नेताओं को सक्रिय किया गया और भाकियू के गढ़ के ही एक वरिष्ठ भाजपा जनप्रतिनिधि को इसकी जिम्मेदारी सौंपी गई। वह टिकैत बंधुओं के भी संपर्क में थे और भाजपा और केन्द्र सरकार के शीर्ष नेतृत्व के भी। उनके व अन्य नेताओं की मध्यस्थता के बाद ही केन्द्र सरकार किसानों को समझाने में कामयाब हो सकी और देर रात में ही किसानों के आंदोलन को समाप्त कर किसानों को वापस भेजा गया।

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