है ज्ञान औ अज्ञान में  !

(मधुगीति १८०८२७ ब)

रचयिता: गोपाल बघेल ‘मधु’

है ज्ञान औ अज्ञान में,

बस भेद एक अनुभूति का;

एक फ़ासला है कर्म का,

अनुभूत भव की द्रष्टि का !

लख परख औ अनुभव किए,

जो लक्ष हृदयंगम किए;

परिणिति क्रिया की पा सके,

फल प्राप्ति परिलक्षित किए !

जो मिला वह कुछ भिन्न था,

सोचा था वह वैसा न था;

कुछ अन्यथा उर लग रहा,

पर प्रतीति सुर दे रहा !

आभोग का सागर अगध,

उपलब्धि की गागर गहन;

जिमि ब्रह्म में मिल फुरके मन,

जग बोध करता सहज क्षण !

जो अजाने को जानता,

उसका जगत पहचानता;

‘मधु’ के रचयिता रासता,

उनकी प्रभा सब भासता !

 

 

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