जम्मू-कश्मीर : जलवायु परिवर्तन से ‘केसर’ की पैदावार में भारी गिरावट

नई दिल्लीः जलवायु परिवर्तन केसर की खेती पर बुरा असर डाल रहा है। जम्मू-कश्मीर में केसर की पैदावार रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचने की आशंका है। केसर किसानों का अनुमान है कि 2018-19 में केसर की पैदावार 2017-18 से आधी यानी दो टन के करीब रह जाएगी।

केसर किसान संगठन के अध्यक्ष अबुल माजिद वानी कहते हैं, जम्मू-कश्मीर में पैदा केसर डेढ़ से सवा दो लाख रुपये प्रति किलोग्राम की दर पर बिकता है। वित्तीय वर्ष 2012-13 में राज्य में केसर की कुल पैदावार रिकॉर्ड 17.56 टन के करीब दर्ज की गई थी। हालांकि तब से बेमौसम बर्फबारी, मानसून की बेरुखी और अन्य पर्यावरणीय बदलावों के कारण इसमें जबरदस्त गिरावट आई है। 2017-18 में तो यह घटकर चार टन के करीब पहुंच गई।

वानी ने जम्मू-कश्मीर में केसर की पैदावार बढ़ाने के लिए शुरू ‘मिशन सैफ्रन’ से हालात सुधरने की उम्मीद जताई। उन्होंने कहा कि बेहतर गुणवत्ता के बीजों की आपूर्ति और सिंचाई सुविधाओं में सुधार से आने वाले दिनों में प्रति हेक्टेयर पांच से छह किलो केसर पैदा करना मुमकिन होगा। मालूम हो कि ईरान के बाद भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा केसर उत्पादक देश है। यह बात अलग है कि बीते कुछ वर्षों में यहां केसर की खेती के लिए इस्तेमाल भूमि का दायरा काफी सिकुड़ गया है।

शेर-ए-कश्मीर कृषि एवं तकनीक विश्वविद्यालय में शोधकर्ता फारुख लोन की मानें तो 1990 के दशक में कश्मीर में 5800 हेक्टेयर भूमि में केसर की खेती होती थी। मौजूदा समय में यह आंकड़ा घटकर 3800 हेक्टेयर पर पहुंच गया है। बढ़ता शहरीकरण इसकी मुख्य वजह है। लोन ने पुरानी तकनीक पर निर्भरता को भी केसर की पैदावार में कमी के लिए जिम्मेदार ठहराया। उनके मुताबिक कश्मीर में फिलहाल प्रति हेक्टेयर महज 1.25 से दो किलो कैसर पैदा होता है। दुनिया के अन्य हिस्सों में यह आंकड़ा 7 किलो प्रति हेक्टेयर के करीब है।

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