मूवी रिव्यू:’मनमर्जियां’ फिल्म गहरे स्तर पर सोचने को मजबूर करता है

नई दिल्लीः हिंदी फिल्मों में अक्सर बेतुके ढंग से ग्लोरिफाई किये जानेवाले प्यार शब्द के आगे अंग्रेजी का अक्षर ‘एफ’ जोड़कर फिल्म बेबाकी से कहती है कि प्यार और सेक्स एक दूसरे के पूरक हैं और लड़की-लड़के के प्यार में सेक्स किस कदर अहम रोल अदा करता है- किसी को चाहने से लेकर किसी को पाने तक और फिर उसे कभी नहीं छोड़ने तक।

हिंदी सिनेमा की सबसे पावरफुल फीमेल किरदारों में से एक रूमी (तापसी पन्नू) का जीने और मन में जो आता है, उसे करने का उसका अंदाज इतना अलग है कि उसे देखकर लगता है कि हीरो की नजर से सबकुछ दिखाने की लत लगाये बैठे हमारे सिनेमाई कल्चर में हीरोइन के नजरिये को अक्सर इतने पुरजोर तरीके से पर्दे पर पेश क्यों नहीं किया जाता है?

रूमी का किरदार हमें खुद से बार बार ये सवाल पूछने पर मजबूर करता है कि अपने ही प्यार की ख्वाहिशों के बोझ से लदी कोई लड़की अपने ही तरीके से क्यों नहीं जी सकती है? क्यों वो डिसाइड नहीं कर सकती है कि उसे किससे प्यार करना है, शादी करनी भी या नहीं? जिस लड़के से वो प्यार करती है, उससे बिना शर्मिंदगी महसूस किये कितनी बार, कब, कहां सेक्स करना है?

रूमी एक गुस्सैल मगर खुद के लिए सोचनेवाली कोई आम लड़की नहीं है.रूमी उन लड़कियों में से जो अपने लिये सही-गलत फैसलों के लिए खुद को जिम्मेदार मानती है और खुद के साथ कुछ गलत हो न जाये, इसके लिए लड़ती है, खुद के लिए खड़ी होती है, समाज के दकियानूसी ख्यालों से परहेज करती है, बॉयफ्रेंड को सही रास्ते पर लाने के लिए उसे गरियाती है, उसे अपनी जिंदगी से बाहर फेंकने के लिए उसपर हाथ तक उठाती है।

%d bloggers like this: