उत्तराखंड की दुविधा

उत्तराखंड में कांग्रेस के विधायकों ने बगावत कर दी है। इस बगावत के लिए कांग्रेसी नेता भाजपा को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। उनका कहना है कि केंद्र की मोदी सरकार को लोकतांत्रिक ढंग से चुनी हुई सरकारें पसंद ही नहीं हैं। इसीलिए वह साम, दाम, दंड, भेद का इस्तेमाल कर रही है। अमित शाह, थैलीशाह बन गए हैं। कांग्रेस के नौ विधायकों को तोड़ने के लिए भाजपा ने नोटों का अंबार लगा दिया है। वे उत्तराखंड में अरुणाचल का नाटक दुबारा खेल रहे हैं। कांग्रेस की आजकल जैसे दुर्गति हो रही है, उसे देखते हुए इस तरह के बयान आना स्वाभाविक ही है।

यहां सबसे पहला सवाल तो यही है कि अरुणाचल और उत्तराखंड, इन दोनों राज्यों में बहता हुआ बगावत का लावा कांग्रेस के दिल्लीनशीन नेताओं की आंखों से ओझल कैसे होता रहा? क्या इसका अर्थ यह नहीं कि कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व अपनी सारी ताकत मोदी की मजाक उड़ाने में लगा रहा है। आठ राज्यों में चल रही उसकी सरकारों पर उसका कोई ध्यान ही नहीं है। अरुणाचल और उत्तराखंड में बगावत एकाएक नहीं भड़की है। मुख्यमंत्रियों के व्यक्तिवादी रवैए के कारण कांग्रेसी विधायक काफी पहले से उखड़े-उखड़े रहते थे। केंद्रीय नेतृत्व ने उन्हें पहले ही क्यों नहीं संभाला?

इसके अलावा उत्तराखंड के मुख्यमंत्री हरीश रावत भी अपनी परेशानी के लिए खुद जिम्मेदार हैं। उन्होंने नारायणदत्त तिवारी और विजय बहुगुणा की राह में कांटें बोने में जरा भी संकोच नहीं किया था। अब बहुगुणा ने पुराना हिसाब चुकता कर दिया है। हालांकि राज्यपाल ने शक्ति-परीक्षण के लिए 28 मार्च तक का समय दे दिया है। हो सकता है कि बहुगुणा मान जाएं, क्योंकि 9-10 विधायकों के दम पर वे मुख्यमंत्री तो नहीं बन सकते। यदि वे नहीं माने तो भाजपा सरकार बना सकती है लेकिन इससे भाजपा को भी क्या फायदा होने वाला है? उसकी सरकार कभी भी गिर सकती है। जो अपनों का नहीं हुआ, वह परायों का क्या होगा? उत्तराखंड में प्रमुख विरेाधी दल होने के नाते इस सारे नाटक में भाजपा चुप कैसे बैठ सकती है लेकिन यदि वह अति सक्रिय दिखाई पड़ी तो इसका असर उसकी छवि पर जरुर पड़ेगा। उत्तराखंड में बागी कांग्रेसियों के कंधों पर खड़े होकर सरकार बनाने से कहीं अच्छा है, राष्ट्रपति शासन लागू करना और चुनाव करवाना।

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