दहशत के कारण परिंदों ने भी बस्तर आना छोर दिया

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जगदलपुर,। माओवाद प्रभावित दक्षिण बस्तर में गोला-बारूद विस्फोट की गंध से ने इस क्षेत्र को अलविदा कह दिया है। बारूद का असर इतना व्यापक है कि राष्टीय पक्षी मोर तथा अन्य पक्षियों की चहचहाहट भी अब यहां सुनाई नहीं पड़ती।इस क्षेत्र के तालाबों में जहां कभी का जमावड़ा रहता था वहां आज वीरानी है। पिछले तीन-चार सालों से ने यहां रूख करना बंद कर दिया है। बीजापुर जिले के भोपालपटनम, बीजापुर, गुदमा और कुटरू में आज भी विशाल तालाब मौजूद हैं। दक्षिण बस्तर क्षेत्र में जहां जमींदारी थी वहां आज भी विशाल तालाब मौजूद है। इन इलाकों में विदेशी मेहमान पक्षी सैकड़ों प्रवासी पक्षी इन दिनों तिब्बत,मगोलिया, सायबेरिया और भारत के विभिन्न राज्यों से यहां आकर मछली एवं हरी घास को अपना भोजन बनाते थे। एक समय सीमा के बाद वे वापस चले जाते थे। पिछले तीन-चार सालों से मेहमान पक्षियों का आना बंद हो गया है। कभी मोर इस इलाके में बहुतायात में पाए जाते थे। घने जंगल होने के कारण अन्य पक्षियों का भी यहां बसेरा था। अब न तो मोर नजर आते है और न ही अन्य पक्षियों की चहचहाहट भी सुनाई पड़ती है। इसकी मुख्य वजह यहां की फिजां में फैली बारूद की गंध है। बस्तर प्रकृति बचाव समिति के संस्थापक शरद वर्मा और बस्तर पर्यटन समिति के अध्यक्ष डॉ. सतीश ने बताया कि दक्षिण बस्तर क्षेत्र में प्रवासी पक्षी और भारतीय पक्षियों का डेरा रहता था। इसे देखने पर्यटक भी पहुंच जाते थे। अब गोला बारूद और दहशत के बीच न पक्षी रहे न पर्यटक।बीजापुर जिले में स्थित इन्द्रावती राष्टï्रीय उद्यान में केन्द्र सरकार ने पक्षियों को बचाने के लिए निर्देश जारी किए पर दहशत के चलते कोई भी वन अधिकारी इन क्षेत्रों में नहीं पहुंच रहे हैं। इधर एक पुलिस अधिकारी ने बताया कि मुठभेड़ और विस्फोट के दौरान पुलिस को जहां नुकसान होता है, वही आसपास के पक्षी भी मारे जाते हैं। उन्होंने बताया कि माओवादी तालाब और हैंडपंपों के आसपास टिफिन बम लगाकर रखते हैं। अधिकांश जगहों पर इसका असर जानवरों और पक्षियों पर पड़ रहा है। पक्षी विशेषज्ञ पशु चिकित्सा अधिकारी बीके शर्मा ने बताया कि बारूद की गंध इतनी तेज होती है कि पक्षी तत्काल ही मर जाते है। जो पक्षी विस्फोट क्षेत्र से अधिक दूरी पर रहते हैं उन्हें बारूद का असर धीरे-धीरे होता है और इस तरह बारूद की गंध पूरे जंगल में फैल जाती है।

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