“आर्यसमाज वैज्ञानिक पद्धति से चल कर ही युवा पीढ़ी से अपने सिद्धान्त मनवा सकता है 

गुरुकुल गौतमनगर में आर्यसम्मेलन

आर्यसमाज वैज्ञानिक पद्धति से चल कर ही युवा पीढ़ी से

अपने सिद्धान्त मनवा सकता है : धर्मपाल आर्य

मनमोहन कुमार आर्य, देहरादून।

दिनांक 16-12-2018 को हम लगभग 12.00 बजे गुरुकुल गौतमनगर, दिल्ली के वार्षिकोत्सव पर पहुंचे। उस समय वहां दक्षिण दिल्ली वेद प्रचार मण्डल की ओर से आर्य-सम्मेलन चल रहा था।सम्मेलन का विषय था वेदानुसार यज्ञ से प्रदुषण मुक्ति हमारे कार्यक्रम में पहुंचने पर दिल्ली आर्य प्रतिनिधि सभा, दिल्ली के यशस्वी प्रधान श्री धर्मपाल आर्य जी का यज्ञ पर व्याख्यान सुनने का अवसर प्राप्त हुआ। उन्होंने कहा कि यदि आर्यसमाज को आगे बढ़ना है तो उसे अपने विचारों, मान्यताओं कार्य पद्धति आदि विभिन्न विषयों का सिंहावलोकन करना होगा। यदि आर्यसमाज वैज्ञानिक पद्धति से नहीं चलेगा तो वह वर्तमान भावी युवा पीढ़ी से अपने सिद्धान्त नहीं मनवा सकेगा। श्री धर्मपाल आर्य ने सार्वदेशिक आर्य प्रतिनिधि सभा, दिल्ली द्वारा विगत माह दिल्ली में आयेजित आर्य महासम्मेलन में एक साथ एक ही स्थान पर दस हजार यज्ञ कुण्डों में दस हजार व्यक्तियों द्वारा यज्ञ किये जाने की चर्चा की। उन्होंने कहा कि दस हजार कुण्डों में किया गया यह यज्ञ एक अद्भुद कार्य था। इस यज्ञ को जिन व्यक्तियों ने भी देखा, उसे इस अद्भुद दृश्य को देखकर सुखद आश्चर्य हुआ। उन्होंने कहा कि यज्ञ स्थल पर स्वामी रामदेव जी भी उपस्थित थे। स्वामी रामदेव जी ने इस अवसर पर कहा था कि उन्होंने अपने जीवन में ऐसे सुन्दर प्रभावशाली यज्ञ का दृश्य नहीं देखा। श्री धर्मपाल आर्य ने कहा कि आप सब इस यज्ञ को यूट्यूब पर अवश्य देंखे। यूट्यूब पर आप सर्च में आर्यसभा लिखें तो यह दृश्य आपको देखने को मिल जायेगा।

                आर्यसमाज के नेता श्री धर्मपाल आर्य जी ने कहा कि यज्ञ से अधिक लाभ तभी होता है जब हम देशी गाय के शुद्ध घृत से अग्निहोत्र करते हैं। उन्होंने बताया कि यज्ञ पर जो वैज्ञानिक शोध कराया गया है उससे देशी गाय के घृत से यज्ञ करने पर ही अच्छे परिणाम सामने आते हैं। यदि यज्ञ में देशी गाय के अतिरिक्त अन्य पशुओं के दूघ से बने घृत का प्रयोग करते हैं तो फिर यज्ञ के अच्छे परिणाम नहीं मिलते जो देशी गाय के घृत से प्राप्त होते हैं।

                श्री धर्मपाल आर्य ने आगे कहा कि उन्होंने अपने एक मित्र से बात की जो देशी गाय पालते हैं। उनसे गाय के घृत के मूल्य के विषय में पूछा तो उन्हें बताया गया कि देशी गाय का घृत पन्द्रह सौ रुपये प्रति किलोग्राम पड़ता है। श्री आर्य ने कहा कि यज्ञ देशी गाय के घृत से ही करना चाहिये। जर्सी गाय के घृत से यज्ञ न किया जाये तो अच्छा है। देशी गाय के घृत से यदि यज्ञ करेंगे तो इससे अच्छे परिणाम आयेंगे। वैज्ञानिक देशी गाय के घृत से किये गये यज्ञ से वायु प्रदुषण में लाभ को स्वीकार करते हैं। श्री धर्मपाल आर्य जी ने कहा कि वैद्यक के अनुसार घृत का अर्थ देशी गाय का घी होता है। वैद्यक ग्रन्थों में भैंस के घी को घृत कहकर चिकनाई कहा गया है। अपने व्यक्तव्य को विराम देते हुए उन्होंने कहा कि हमें अपनी मान्यताओं में सुधार की आवश्यकता होने पर सुधार संशोधन अवश्य करना चाहिये। ऐसा करने पर ही हम यज्ञ को प्रतिष्ठित सर्वमान्य कर पायेंगे। श्री धर्मपाल आर्य जी से पूर्व श्री वीरेन्द्र विक्रम जी का व्याख्यान हो चुका था। हमारे पहुंचने से पूर्व इस सम्मेलन में स्वामी धर्मेश्वरानन्द जी का व्याख्यान भी हुआ था।

                आर्य सम्मेलन में श्री विजय गुप्त जी को उनकी सामाजिक सेवाओं के लिए सम्मानित किया गया। सम्मेलन की समाप्ति के बाद कार्यक्रम में उपस्थित सभी लोगों ने भोजन ग्रहण किया जिसका समस्त व्यय श्री विजय गुप्त जी ने प्रदान किया। इस अवसर पर विजय गुप्त जी ने अपनी स्वलिखित कवितायें भी प्रस्तुत कीं जो अत्यन्त प्रभावशाली थीं। इस सम्मान के बाद आयोजन के अध्यक्ष श्री ओम्प्रकाश यजुर्वेदी जी का अध्यक्षीय भाषण हुआ। अध्यक्ष महोदय ने मानसिक प्रदुषण की चर्चा की। उन्होंने कहा कि वायुजल प्रदुषण सहित मानसिक प्रदुषण भी बढ़ता जा रहा है। मानसिक प्रदुषण के परिप्रेक्ष्य में आपने सतोगुण तथा तमों गुण की चर्चा की। उन्होंने कहा कि यज्ञ करने से मानसिक शुद्धता प्राप्त होती है तथा यज्ञ करने वाले मनुष्य के भीतर अच्छे पवित्र विचार आते हैं। यज्ञ करने वाले मनुष्य में ईश्वर व सामाजिक कार्यों के प्रति श्रद्धा व रूचि भी बढ़ती है। श्रद्धा ऐसा गुण है जिससे मनुष्य को ईश्वर की प्राप्ति होती है। श्रद्धपूर्वक यज्ञ करने से ही मनुष्य को लाभ होता है। श्री यजुर्वेदी जी ने कहा कि देशी नस्ल की गाय के शुद्ध घृत से यज्ञ करने से वायु एवं पर्यावरण की शुद्धि होती है। यज्ञ से आवश्यकतानुसार वर्षा होती है। यज्ञ करने से भूमि की शुद्धि भी होती है। यज्ञ करने से निर्मित वायुमण्डल और इसके बाद वर्षा के होने से अन्न व कृषि उपज की शुद्धि भी होती है। यज्ञ करने से हमारा तन, मन, बुद्धि व आत्मा भी शुद्ध होते हैं।

                विद्वान वक्ता श्री ओम्प्रकाश यजुर्वेदी जी ने बताया कि देश समाज को मानसिक शुद्धि की आवश्यकता है। अध्यक्ष महोदय ने यज्ञ प्रार्थना की चर्चा की और कहा कि हम ईश्वर से प्रार्थना करें कि वह हमारे कलुषित भावों को हमसे छुड़ावें। हमें अपने मन-मन्दिर में झाडू लगाने की आवश्यकता है। श्री ओम्प्रकाश जी ने मन की एकाग्रता को लाभप्रद बताया। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों को अध्यापकों की बातें मन को एकाग्र करके ध्यानपूर्वक सुननी चाहियें। उन्होंने यह भी बताया कि परमात्मा कण-कण में व्यापक है और हमारे सभी कर्मों को देखता व जानता है तथा हमारे मन में उठने वाले विचारों को भी जानता है। अपने विचारों को विराम देते हुए उन्होंने कहा कि प्रदुषण से मुक्ति का एक ही उपाययज्ञहै। हम ईश्वर का प्रातः व सायं ध्यान करें व उससे शुभ कर्म करने के लिए शक्ति देने की प्रार्थना करें। हम सब अपने घरों में प्रातः व सायं यज्ञ किया करें। इसके साथ हमें बड़ों का मान-सम्मान भी करना चाहिये। अध्यक्षीय भाषण के पश्चात केन्द्रीय आर्य युवक परिषद्, दिल्ली के यशस्वी प्रधान डा. अनिल आर्य जी ने दक्षिण दिल्ली वेद प्रचार मण्डल के कार्यों की मुक्त कण्ठ से प्रशंसा की और उनका धन्यवाद किया। श्री आर्य ने केन्द्रीय आर्य युवक परिषद के आगामी अनेक कार्योंक्रमों की सूचना भी दी और सबको उन आयोजन में भाग लेने की अपील की। शान्ति पाठ के साथ यह सम्मेलन समाप्त हुआ। इसके बाद ऋषि लंगर हुआ। आयोजन में पधारे शताधिक ऋषि भक्तों ने स्वादिष्ठ भोजन ग्रहण किया। हमें इस सम्मेलन व परिसर में स्वामी प्रणवानन्द सरस्वती जी, स्वामी धर्मेश्वरानन्द सरस्वती, स्वामी श्रद्धानन्द जी-गोमत, श्री रविदेव गुप्त, श्री वेदप्रकाश श्रोत्रिय, श्री धर्मपाल शास्त्री, पं. सत्यपाल पथिक, डा. यज्ञवीर आदि अनेक विद्वानों के दर्शन हुए। हमारा इस आयोजन में पहुंचना सफल रहा। ओ३म् शम्। मनमोहन कुमार आर्य

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