कल कहीं बहुत देर न हो जाये!

अतीत में आततायी विधर्मी आक्रमणकारियों ने हिन्दुस्तान को जमकर लूटा खसोटा ही नहीं वरन् हिन्दुस्तान की सनातनी संस्कृति पर भी जमकर प्रहार किये।
नि:संदेह यह सनातन संस्कृति की अति विशिष्टताओं एवं गहरी जड़ों का ही परिणाम रहा कि पहले मुस्लिम शासकों एवं बाद में अंग्रेज शासकों द्वारा बहुतेरे कुटिल एवं संघातक प्रहारों/प्रयासों के बावजूद न तो सनातन धर्म पराजित हो सका और न ही हिन्दुत्व का पराभव।
हालांकि यह भी सत्य है कि कभी पूरी दुनिया में आदिकालीन वैदिक धर्म व सनातन संस्कृति का ही बोलबाला था। कालांतर में यहूदी व पारसी सम्प्रदाय वैदिक धर्म से ही उपजे थे। इस्लामिक देश बनने के पहले ईरान को फ ारस कहा जाता था और वह अग्नि पूजक पारसियों का देश था। पूरी दुनिया को पता है कि इस्लाम के उदय के पूर्व अरब में हिन्दू देवी देवताओं की मूर्तियां स्थापित थी। क्या यह सत्य नहीं है कि इस्लाम के प्रवर्तक मोहम्मद साहब के पिता स्वयं मूर्ति पूजक नहीं थे। यह भी किसी को बताने की जरूरत है कि मक्का में आज भी शिवलिंग है और उसकी पूजा हेतु कुआं वर्तमान में (जमजम) के रूप में मौजूद है।
तात्पर्य यह है कि इस्लाम के उदय के बाद दुनिया में आज जो ५७ इस्लामिक देश मौजूद है वे सभी के सभी सनातन धर्मी ही थे। इस सत्य को नकारा नहीं जा सकता कि वैदिक धर्म को सर्वाधिक क्षति बौद्ध सम्प्रदाय ने ही पहुंचायी। बौद्ध सम्प्रदाय के प्रवर्तक गौतम बौद्ध के शांति करूणा अहिंसा का ही नतीजा रहा कि सम्राट अशोक ने हथियार धर दिये जिसका फ ायदा बाद में विदेशी आक्रांताओं ने उठाया और एक के बाद एक आक्रमण करके हिन्दुस्तान की धरती को लहूलुहान तो किया ही देश की सम्पत्ति व धर्म को भी भारी चोट पहुंचायी।
यही नहीं देश में मूर्ति पूजा बौद्ध धर्म की देन है। वैदिक धर्म में मूर्ति अथवा मूर्ति पूजा का कोई विधान था ही नहीं। बौद्ध धर्म के बढ़ते प्रभाव से सनातन धर्म को जीवनदान तब मिला जब ७८८ ई०पू० आदि शंकाराचार्य का अवतरण हुआ। महज ३२ वर्ष की आयु में उन्होने देश की सनातन संस्कृति/धर्म की रक्षा हेतु देश के चार कोनों में चार शंकराचार्य पीठों की स्थापना ही नहीं की वरन् देश में १२ ज्योर्तिलिंग भी स्थापित किये।
पूरे देश में भ्रमण कर उन्होने अद्वितीय ज्ञान से सनातन धर्म की पुर्नस्थापना में जो योगदान दिया उसी का नतीजा रहा कि देश में सनातन संस्कृति/धर्म की पुर्नस्थापना हुई और बौद्ध सम्प्रदाय का तेजी से पतन हुआ।
अब सवाल उठता है कि कहां एक आदि शंकराचार्य जिन्होने तेजी से पैर पसारते बौद्ध सम्प्रदाय के सापेक्ष सनातन धर्म को पुन: न केवल खड़ा किया वरन् उसकी प्रतिष्ठा/गरिमा को भी पुर्नस्थापित किया वहीं आज चार मूल शंकराचार्य एवं अनेक स्वयं भू शंकराचार्यो की फ ौज भी सनातन धर्म की रक्षा नहीं कर पा रही है तो आखिर क्यों?
सीधी सी बात है कि जहां इस्लाम व ईसाई धर्म के ध्वजवाहक अपने-अपने धर्मो के प्रचार-प्रसार हेतु कोई कोरकसर नहीं छोड़ रहे है वहीं हमारे महान धर्म के ध्वजवाहक माने जाने वाले शंकराचार्यो के आम सनातनी हिन्दुओं को दर्शन तक सुलभ नहीं है। क्या शकराचार्यो की फ ौज बता सकती है कि उन्होने अपने-अपने कार्यकाल में सनातन धर्म की रक्षा, प्रचार-प्रसार हेतु क्या योगदान दिया है। क्या वे बता सकते हंै कि २१वीं सदी में हिन्दू समाज में कोढ़ की तरह व्याप्त ऊंच-नीच, जाति-पात का भेदभाव खत्म करने हेतु उन्होने क्या, कितने और कैसे प्रयास किये।
फ ौरी उत्तर तो यही मिलता है कि सनातन धर्म के हमारे उक्त ध्वजवाहक माने जाने वाले शंकराचार्यो ने सनातन धर्म की रक्षा एवं प्रचार-प्रसार हेतु ऐसा कुछ भी नहीं किया है जिस पर सनातनी हिन्दुओं को गर्व की अनुभूति हो सके। यदि ऐसा हुआ होता तो आज हिन्दुस्तान का एक भी सनातनी हिन्दू धर्म परिवर्तन तो न ही करता।
क्या ये कम दुर्भाग्यपूर्ण नहीं है कि इधर लगातार धर्मपरिवर्तन की घटनायें घटने के बाद भी किसी शंकराचार्य ने मुंह तक नहीं खोला है। ऐसी परिस्थिति में वर्तमान शंकराचार्यो की उदासीनता से साफ हो जाता है कि वे हिन्दू समाज में अपनी गरिमा/महिमा बनाये रखने के प्रति जरा भी सचेत नहीं है। वो समय दूर नहीं है जब सभी शंकराचार्य केवल शोभा की वस्तु रह जायेगें।
माना कि कालांतर में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद, शिवसेना, बजरंग दल जैसे अनेक हिन्दुओं के हितेषी संगठन खड़े हुये और उन्होने समय-समय पर अपनी उपयोगिता भी सिद्ध की पर वे सनातन धर्म के सफ ल रक्षक न सिद्ध हो सके।
आज यदि देश के कई राज्यों में इस्लाम व ईसाई सम्प्रदायों का तेजी से विस्तार हुआ है व हो रहा है। आज यदि उन राज्यों में हिन्दू तेजी से मुसलमान अथवा ईसाई बने हैं अथवा बनने को बाध्य हुये है तो क्या यह हिन्दू संगठनों की नाकामी नहीं मानी जायेगी? अब भी समय है ये संगठन अपनी उपादेयता पर गहन चिंतन,मनन करें और तदानुसार आगे बढ़े वरना इन्हे हिन्दू समाज का प्रतिनिधि बने रहने का कोई हक नहीं रह जायेगा।

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