जी7 देश वैश्विक तापमान को 1.5°C तक सीमित करने को हुए एकमत

दो डिग्री सेल्सियस तक वैश्विक तापमान को सीमित करने के अपने पिछले लक्ष्य के मुक़ाबले एक बेहद महत्वकांक्षी लक्ष्य पर सहमत होते हुए G7 देशों के पर्यावरण मंत्रियों ने सहमति व्यक्त की है कि वे वैश्विक तापमान में वृद्धि को 1.5°C तक सीमित करने के अनुरूप अपने जलवायु लक्ष्य तय करेंगे।
इन मंत्रियों ने 2021 के अंत तक गरीब देशों में कोयले से चलने वाले बिजली स्टेशनों के प्रत्यक्ष वित्त पोषण को रोकने के लिए भी सहमति व्यक्त की है। यह निर्णय गरीब देशों में कोयला बिजली में निवेश करने वाले बैंकों को एक स्पष्ट संदेश भी भेजेगा।
इस निर्णय में वन्य जीवन को बढ़ावा देने और कार्बन उत्सर्जन को सोखने में मदद करने के लिए 2030 तक प्रकृति के लिए 30% भूमि की सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण प्रतिबद्धता भी है। यूके, यूएस, कनाडा, जापान, फ्रांस, इटली और जर्मनी के पर्यावरण मंत्रियों ने G7 की इस बैठक में वर्चुअली भाग लिया और इस बैठक ने जून में कॉर्नवाल में होने वाली इन नेताओं की सभा के लिए भूमिका बना दी है।
इस ऑनलाइन बैठक का नेतृत्व यूके ने किया, और एक सरकारी सूत्र ने बीबीसी न्यूज़ को बताया कि “हम परिणामों से बहुत उत्साहित हैं।”
इस बैठक में जो निर्णय लिए गए हैं, वे नवंबर में ग्लासगो में होने वाली महत्वपूर्ण वैश्विक जलवायु शिखर सम्मेलन, जिसे COP26 कहा जाता है, की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर होंगे।
ऐसा प्रतीत होता है कि यह मंत्री अमीर देशों के ऊर्जा थिंक टैंक, आईईए, की हालिया रिपोर्ट से काफी प्रभावित थे।
आईईए के अध्ययन में कहा गया है कि अगर दुनिया सदी के मध्य तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन तक पहुंचना चाहती है, तो अब से कोई नया कोयला, तेल या गैस विकास नहीं हो सकता है। G7 मंत्रियों ने सहमति व्यक्त की कि भारत और इंडोनेशिया जैसी तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं को स्वच्छ प्रौद्योगिकी प्राप्त करने में मदद करने के लिए बहुत अधिक नकदी की आवश्यकता है। इस फैसले को 4 जून को जी7 वित्त मंत्रियों की बैठक में आगे बढ़ाया जाएगा।
इस बैठक के अंत में मंत्रियों द्वारा जारी विज्ञप्ति में कहा गया है: “हम कार्बन-गहन अंतरराष्ट्रीय जीवाश्म ईंधन ऊर्जा के लिए नए प्रत्यक्ष सरकारी समर्थन को समाप्त कर देंगे।” इसका सीधा मतलब कोयला और तेल से है और आईईए के अध्ययन के निष्कर्ष के अनुरूप है।
इस मंत्री समूह के फ़ैसले का प्रभाव या नतीजा ये होगा कि जापान, जो कि एक प्रमुख वैश्विक कोयला निवेशक के रूप में पहचाना जाता था, वो अब कोयले में निवेश नहीं करेगा और सिर्फ चीन ही विश्व में कोयले के अंतिम प्रमुख समर्थक के रूप में अलग-थलग दिखाई देगा।
एक नज़र अगर इस बैठक में लिए फैसलों पर डालें तो वो निम्लिखित हैं-
-सरकार की नीतियां 1.5 C के आधार पर होंगी और इसके लिए अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं को प्रेरित करने के लिए कमिटेड होंगे ।

  • ‘2020 के दशक में एम्मीशन में गहरी कमी के लिए प्रतिबद्ध, 2030 के दशक में कोयले के इस्तेमाल से दूरी बनाना और अपनी बिजली परियोजनाओं को डीकार्बोनाइज करने के लिए प्रतिबद्ध होंगे ।
    -2021 के अंत तक थर्मल कोयला बिजली उत्पादन के लिए अंतरराष्ट्रीय सरकारी समर्थन बंद किया जाए।
  • तापमान को 1.5 C पहुंच के भीतर रखने के लिए फॉसिल फ्यूल के लिए नए अंतरराष्ट्रीय सरकारी समर्थन को रोकें।
    -सार्वजनिक वित्त को 2020 में पेरिस समझौते के 1.5 C के लक्ष्य के साथ आधारित करें और सभी बहुपक्षीय विकास बैंकों (यानी विश्व बैंक) से “इस प्रयास में शामिल होने के लिए” कहें।
  • COP 26 से भी पहले विकासशील देशों को नई जलवायु वित्त सहायता प्रदान करें ।
  • 2030 तक प्रकृति की वापसी के लिए वैश्विक लक्ष्य पर सहमति करें और विश्व स्तर पर कारोबार वाली वस्तुओं में वनों की कटाई को कम करने के लिए नीतियां और कानून पेश करना।
    इस बैठक का अगर विश्लेष्ण किया जाये तो साफ़ होता है कि फ़िलहाल कोयले के इस्तेमाल का समर्थन विशेष रूप से ज़्यादा है और अगर इस इस्तेमाल को बंद कर दिया जाता है तो इसका मतलब है कि कोरिया और जापान विदेशी कोयला आयात समर्थन छोड़ देंगे। सिर्फ चीन ही दक्षिण पूर्व एशिया में विदेशी कोयले के अंतिम प्रमुख फंडर के रूप में अलग थलग पड़ जायेगा। बैठक के बाद जारी प्रेस विज्ञप्ति में साफ़ कहा गया है कि “कोयले में लगातार होने वाला अंतर्राष्ट्रीय निवेश अब बंद होना चाहिए और 2021 के अंत तक बेरोकटोक अंतरराष्ट्रीय थर्मल कोयला बिजली उत्पादन के लिए नए प्रत्यक्ष सरकारी समर्थन का पूरी तरह अंत होना चाहिए और इस दिशा में ठोस कदम उठाने के लिए कमिटेड होना होगा।”
    अपनी प्रतिक्रिया देते हुए जेनिफर टोलमैन, वरिष्ठ नीति सलाहकार, E3G ने कहा, “यह बैठक 1.5 डिग्री को अपनी पहुंच में रखने के लिए एक इंजन की तरह काम करेगा और एक परिवर्तन की नींव रखेगा। स्वास्थ्य और ऋण संकट का सामना करते हुए हरित क्रांति का समर्थन करने वाले गैर जी 7 देशों का समर्थन इस प्रस्ताव में न केवल उल्लेखनीय वृद्धि करेगा बल्कि कोयले तथा सभी इंटरनेशनल फॉसिल फ्यूल निवेशों के लिए सार्वजनिक वित्त को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के रूप में जून G7 शिखर सम्मेलन एक स्पष्ट परीक्षा के रूप में साबित होगा।”
    आगे, लुका बर्गमास्ची, सह-संस्थापक, ईसीसीओ (रोम स्थित थिंक टैंक) ने कहा, “मीटिंग का नतीजा है कि जलवायु और प्रकृति के लिए प्रमुख पश्चिमी महाशक्तियों के सहयोग के कारण ये परिवर्तन रीसेट और फिर से लॉन्च किया जा रहा है। यह COP 26 के प्रति सकारात्मक प्रभाव की शुरुआत हो सकती है। G7 जलवायु मंत्री सुन रहे हैं, अब सभी G 20 देशों को भी ऐसा करने की आवश्यकता है। यह अगली G7 वित्त और नेताओं की बैठकों से पहले एक महत्वपूर्ण कदम है।”
    अपनी प्रतिक्रिया देते हुए बर्निस ली, अनुसंधान निदेशक, फ्यूचर्स; संस्थापक निदेशक, हॉफमैन सेंटर फॉर सस्टेनेबल रिसोर्स इकोनॉमी ने कहा, “यह G7 घोषणा चीन को अकेले विदेशी कोयला बिजली संयंत्रों के एकमात्र फंडर के रूप में छोड़ देती है। बीजिंग पहले ही संकेत दे चुका है कि वह बांग्लादेश में कोयला फंडिंग छोड़ रहा है, और मुझे लगता है कि यह उसकी निर्यात वित्त रणनीति पर और सवाल उठाएगा। क्या चीन वास्तव में क्या किसी उद्योग के लिए आखिरी पायदान पर खड़ा होना है?”
    लंदन स्थित वैश्विक ऊर्जा थिंक टैंक, एम्बर, के वरिष्ठ बिजली विश्लेषक
    डेव जोन्स के अनुसार, “अधिकांश G7 देशों ने पहले ही 2030 के लिए प्रतिज्ञा कर रखी है, और जब इसकी शुरूआत हुई है तो इनके लिए योजनाएं भी बनीं हैं इसलिए इस निष्कर्ष पर पहुंचने की ये संभावनाऐं भी बहुत ज़्यादा है: कोयला बिजली पावर प्लांट्स को चरणबद्ध तरीके से खत्म करना पहला आवश्यक कदम है, और इसके तुरंत बाद गैस पावर को भी चरणबद्ध तरीके से खत्म करने की आवश्यकता है ताकि पूरे बिजली क्षेत्र को 2035 तक डीकार्बोनाइज किया जा सके।”
    आगे, जॉर्जीना शेंडलर, सीनियर इंटरनेशनल पॉलिसी ऑफिसर, रॉयल सोसाइटी फॉर द प्रोटेक्शन ऑफ बर्ड्स (यूके एनजीओ) ने इस बैठक के नतीजों को सराहते हुए कहा, “प्रकृति और जलवायु के लिए विश्व स्तर पर दो महत्वपूर्ण वार्ताओं से पहले हमें G7 से इस महत्वाकांक्षा के एक मजबूत संकेत की आवश्यकता थी । G7 के पास प्रकृति और जलवायु पर सकारात्मक कार्रवाई करने के लिए (न्यूनतम के रूप में) दो चीजें करने का एक महत्वपूर्ण अवसर है: 2030 तक प्रकृति के होने वाले नुकसान की भरपाई करने के वैश्विक लक्ष्य पर जोर देना और विश्व स्तर पर कारोबार करने वाली वस्तुओं में वनों की कटाई को रोकने और फुटप्रिंट को कम करने के लिए नीतियों और कानूनों को पेश करना।
    इंग्लैंड ने हाल ही में वन्यजीवों की गिरावट को रोकने के कानून के लिए 2030 का लक्ष्य रखने पर सहमति व्यक्त की है – यह एक अभूतपूर्व शुरुआत हो सकती है, और अन्य देशों को भी कानून में इसी तरह की प्रतिबद्धताओं को रखने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। प्रकृति की बहाली को सुरक्षित करने के लिए हमारी 30% भूमि और समुद्र को बचाना एक बहुत ही अच्छा साधन है, लेकिन ये केवल एक साधन है पूरा समाधान नहीं है, और बायोडायवर्सिटी का बढ़ता नुकसान अपने आप नहीं बदलेगा। इस साल प्रकृति पर ग्लोबल समझौते को साकार करने के लिए हमें गरीब देशों को कोविड और पर्यावरणीय नुकसान से बाहर निकलने में मदद करने के लिए धन और अन्य वित्तीय साधनों की मदद देनी होगी।”
    अंत में टियरफंड में एडवोकेसी एंड इन्फ्लुएंसिंग के निदेशक, रूथ वैलेरियो, ने कहा, “G7 राष्ट्र दुनिया में सबसे अधिक प्रदूषण फैलाने वालों देशों में से हैं और उनके एनर्जी निर्णय पहले से ही उन समुदायों में काफी समस्या पैदा कर रहे हैं जहां टियरफंड काम करता है। कोयले के इस्तेमाल को धीरे धीरे समाप्त करने के कमिटमेंट की सख्त जरूरत है, अगर हम ग्लोबल हीटिंग को 1.5 ℃ से नीचे रखना चाहते हैं तो G7 देशों को अब सभी फॉसिल फ्यूल के समर्थन को बंद करने की जरूरत है और उन लोगों पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव कम से कम हो जिन्होंने पर्यावरण को कम प्रभावित किया है।”

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