आदिवासी युवतियों की ओढ़नियों के पल्लू पर कशीदाकारी से लिखे नाम और मोबाइल नम्बर

आदिवासी युवतियों की ओढ़नियों के पल्लू पर कशीदाकारी से लिखे नाम और मोबाइल नम्बर
आदिवासी युवतियों की ओढ़नियों के पल्लू पर कशीदाकारी से लिखे नाम और मोबाइल नम्बर

मोबाइल क्रांति के दौर ने केवल शहरों को ही नहीं बल्कि आदिवासी क्षेत्रों तक को अनोखे रूप में प्रभावित किया है। जहां शिक्षा के प्रचार-प्रसार का उजास नहीं हुआ है वहां भी अक्षर ज्ञान की जगह मोबाइल के अंक-ज्ञान की दुंदुभी सुनाई दे रही है।

उदयपुर से 80 किलोमीटर दूर आदिवासियों के कोटडा क्षेत्र के ठेठ गांवों में सभी युवतियांे के पास अभी तक मोबाइल फोन की दस्तक तो सुलभ नहीं हुई है, लेकिन उनकी ओढ़नियों के पल्लू पर अपने प्रियजनों के मोबाइल नम्बरों की कशीदाकारी अवश्य मिलेगी। कोटडा के तेजा का वास गांव में महिलाओं की ओढ़नियों पर काढ़े गए ऐसे नम्बर देखकर सहसा ही चकित हुए बिना नहीं रहा जा सकता।

ग्राम सरपंच अणन्दाराम गरासिया ने बताया कि जिन महिलाओं के पास मोबाइल फोन नहीं है वे उनके नम्बर तो याद नहीं रख सकती। ऐसे में जिनसे बात करनी होती है, उनके नम्बर दिखाकर महिलाएं आसानी से बात कर लेती हैं और ये नंबर उनकी ओढ़नियों में काढे गए होते हैं।

अणन्दाराम ने बताया कि तेजा का वास में कुल जनसंख्या 7500 है। इनमें महिलाओं-युवतियों की संख्या करीब 4000 हैं जिनमें से लगभग 20 प्रतिशत महिलाओं के पास मोबाइल फोन हैं। लेकिन वे भी अपनी ओढनी पर फैशन के तौर पर मोबाइल नम्बरों की कढाई कराती हैं। एक जगह पांच युवतियों का समूह मिला। उनसे जब पूछा गया कि पल्लू पर काढ़े गए नामों में क्या प्रेमीजनों के नाम भी होते हैं। इस पर सभी खिलखिलाकर एक-दूसरे को देखने लगीं और वहां से चली गईं।

आंगनबाडी कार्यकर्ता सविता गरासिया ने बताया कि प्रियजनों के नामों में अधिकांश तो घर के मुखिया का नाम ही मिलेगा। जो बालाएं शादीशुदा हैं उनके पतियों के नाम बड़े करीने से कढाई किये मिलते हैं। हूगरी बाई की ओढ़नी पर चार-पांच नाम देखने को मिले। पूछने पर लम्बी मुस्कान के साथ वह बोली ‘‘वे मेरी खास सहेलियों के नम्बर हैं जिनसे दिन में एक बार तो बात कर ही लेती हूं। ’’

( Source – PTI )

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