पद्मश्री के सच्चे हकदार थे शरीफ चाचा

शादाब जफर शादाब

25,000 से ज्यादा लावारिस लाशों को दफना व दाह संस्कार कर चुके शरीफ़ चाचा…. भारत सरकार ने साल 2020 के लिए पद्म पुरस्कार से सम्मानित होने वाले नामों की घोषणा कर दी है. इस वर्ष 7 लोगों को पद्म विभूषण, 16 को पद्म भूषण और 118 लोगों को पद्मश्री सम्मान से नवाजा जाएगा. इस लिस्ट में शामिल कुछ नामों मैं जिस नाम की सब से ज्यादा चर्चा हो रही है. इनमें से एक नाम है मोहम्मद शरीफ का. आइए जानते हैं आखिरी कौन हैं मोहम्मद शरीफ़ जिन्हें केंद्र सरकार ने पद्मश्री से सम्मानित करने का फैसला किया है.मोहम्मद शरीफ अयोध्या मै हमेशा से प्यार और सम्मान मिलता रहा है और उन्हें प्यार से लोग शरीफ चाचा के नाम से बुलाते हैं। लेकिन शनिवार को हुई पद्मश्री पुरस्कारों की घोषणा ने रातों रात उनकी प्रतिष्ठा और बढ़ा दी है। शरीफ चाचा कई वर्षो से अयोध्या में लावारिश लाशों को दफनाते या दाह-संस्कार करते रहे हैं। उन्होंने अब तक 25,000 से ज्यादा शवों को दफनाया/दाह संस्कार किया है।पेशे से साइकिल मिस्त्री मोहम्मद शरीफ हर रोज लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करने के लिए कब्रिस्तान और श्मशान का चक्कर लगाया करते हैं।अगर कभी वह वहां नहीं पहुंच पाते तो श्मशान स्थल या कब्रिस्तान के निगरानीकर्ता लावारिश लाश होने पर उन्हें सूचित कर देते हैं। उन्होंने सिर्फ मुसलमानों व हिंदुओं की लाशों को दफनाया व दाह-संस्कार ही नहीं किया है, बल्कि सिखों व ईसाइयों के भी अंतिम संस्कार किए हैं।अयोध्या (फैज़ाबाद) के शरीफ चाचा जो पिछले 25 सालों से फैज़ाबाद और आसपास के इलाक़ों में मिलने वाली छत-विछत, सड़ी-गली लावारिस लाशों को उनके धर्म व रीति रिवाज से साथ अंतिम संस्कार करते चले आ रहे हैं। 25 वर्षो में बहुत सी कठिनाइयों का सामना भी करना पड़ा लेकिन शरीफ चाचा ने इंसानियत को जीवित रखने का यह सिलसिला बदस्तूर जारी रखा। मशहूर अभिनेता आमिर खान ने अपने सत्यमेव जयते कार्यक्रम के माध्यम से मो० शरीफ खान ऊर्फ़ शरीफ चाचा की कहानी बयान कर चुके हैं। 28 वर्ष पहले इनका बेटा जो फार्मा प्रोफेशन से जुड़ा हुआ था बगल के सुल्तानपुर डिस्ट्रिक में किसी काम से गया था लेकिन पूरे एक महीने बीत जाने के बाद भी बेटा घर वापस नही आया। यह वही समय था जब बाबरी-मस्जिद और रामजन्म भूमि विवाद अपने चरम पर था। देशभर में फैले उन्माद के बीच शरीफ चाचा के बेटे की किसी ने हत्या कर के शव रेलवे ट्रैक के किनारे फेंक दिया। करीब एक महीने बाद बेटे की लाश मिली तो वो वह पूरी तरह सड़ चुकी थी। जिस का अंतिम संस्कार लावारिसों की तरह हुआ था। रईस की मौत की सूचना उन्हें करीब एक माह बाद मिली थी। रईस की पहचान उनकी शर्ट पर लगे टेलर के टैग से हुई थी। टैग से पुलिस ने टेलर की खोज की और कपड़े से शरीफ चचा ने मृतक की पहचान अपने बेटे के रूप में की। जवान बेटे की मौत ने पूरे परिवार को झकझोर कर रख दिया। पत्नी को सदमा लगा। तभी उन्होंने यह कसम खाई कि अयोध्या की धरती पर किसी शव का अंतिम संस्कार लावारिसों की तरह नहीं होगा। जवान बेटे की मौत और पिता के होते हुए लावारिस तौर पत अंतिम संस्कार शरीफ खान को सोचने पर मजबूर कर दिया। बेटे की लाश को सुपुर्देखाक करने के बाद उन्होंने यह ठान लिया की अब अयोध्या और आसपास के इलाक़े में जहाँ तक उनकी कोशिश होगी कोई भी लावारिस लाश यूँ ही लावारिस की तरहां नहीं पड़ी रहेगी। 27 वर्ष पूर्व जब उन्होंने लावारिस शवों का अंतिम संस्कार करना शुरू किया तो लोगों ने उन्हें पागल समझा। पहले वो अपने पास एक ठेला रखता थे, जिस पर लावारिस शवों को रखकर श्मशान घाट अथवा कब्रिस्तान ले जाते थे। साइकिल की मरम्मत से जो पैसे बचाते थे, उसी से शवों का अंतिम संस्कार करतें थे पर तब भी लोग उन का मजाक उड़ाते थे। जब कुछ वर्ष बीत गये तो लोगों में संवेदना जगी और लोगों ने उन की भावनाओं की भी कद्र की। आज अशोक रिक्शा वाले हैं, जो शवों को श्मशान घाट अथवा कब्रिस्तान ले जाने में उन की बिना पैसा लिये उन की मदद करते है और हमेशा मदद के लिए तैयार रहते हैं।  ऐसे महान देश के सच्चे सपूत को मेरा सलाम , बहुत बहुत मुबारकबाद शरीफ चाचा 

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